मार्च 03, 2012

शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या

आठ मार्च ये सुबह चूल्हों के आगे आँख फोडती, धुंए में खांसती औरतों के लिए भी उस जाती हुई ठण्ड में जल्दी जाग मैदान निपटने की जद्दोजेहद से शुरू होगी. भले कच्ची-पक्की दीवारों पर लिखा हो, 'मेरी शादी हो उस घर में शौचालय हो जिस घर में .' पर उससे फ़रक क्या पड़ने वाला है..लिखा है लिखा रहने दो..जहाँ लड़की वालों के लिए लड़के वालों के परिवार से जुड़ना ही इतना महत्त्वपूर्ण हो कि शादी दोनों भाईओं में से किसी के भी साथ हो उन्हें कोई समस्या नहीं, वहां आप क्या ये उम्मीद करेंगे के, लड़की दीवारे पढ़-पढ़ अपने ससुराल को चुन सकती है..वो कहेगी भी तो कोई नहीं सुनेगा..

पर ऐसा भी नहीं है कि समाज रुका रहेगा..उसमे गतिशीलता तब आएगी जब शादी के बाद उस लड़की को अपने नए नवेले दुल्हे के साथ अहमदाबाद पंजाब दिल्ली आना होगा. यह आना भले पुरुष के प्रयोजनवादी तर्क से उपजा हो और उसे बतौर घर की पहरेदारी और चूल्हा चौका संभालने के लिए वहाँ साथ चलने को कहा गया है पर स्त्री पक्ष भी जल्दी से जल्दी इन प्रवासी कमाऊ पहुना[1] के साथ अपनी बेटी बिदा कर देना चाहता है..कि कहीं पुरुष के पैर न बिचला[2] जाएँ..इसकी 'घर के खाने' से लेकर 'घर की बीवी' तक आर्थिक-सामजिक-यौनिक व्याख्याएं हैं.

शुरू-शुरू में पुरानी दिल्ली से खाचाखच भरी 729-425-347 में उसका जी मचलेगा और सिर खिड़की के बाहर निकल उलटी करने लगेगा..खानपुर के उस एक कमरे की चहारदिवारी में दम घुटने को ही होगा कि मकान मालकिन नयी बहु को अपने फहलारे[3] घर में बुला लेगी. बैठेगी बतियेगी. कुछ घर की कुछ सहर की कुछ उसके गुस्सैल पति की कुछ अपने बच्चों की. उसे वो सारे आश्वासन देगी जो कभी उसके ऐसे ही दिल्ली आने पर उसकी सास ने उसे दिए होंगे..खुली खिड़की खुली छत खुला मैदान उसे यहाँ नहीं मिलेगा.

पूरा दिन घर की उदास दुपहरियां लेते लेते मायके की याद में कब तक काटे. महीने दो महीने बाद आसपास किसी दिद्दा किसी भाभी किसी अम्मा के साथ अपने हिस्से के सुख दुःख हाथ की महंदी, पैर के महावर के बाद सब्जी के दाम से शुरू होकर पानी की किचकिच में अपनी कोट्हिन माता वाले कुँए की याद बदस्तूर आने लगेगी. मरद ऐसा नहीं है की नहीं समझता है. कभी-कभी ऐसे दिन भी आते हैं जब किसी अपने जैसे सिलेमाहाल दोनों फिलिम देखने जाते है जहाँ इंटरवल में पचीस रूपये का मक्का खरीदने को वह बेवकूफी करार देती है. लालकिला- क़ुतुब मीनार उन पहली जगहों में से होती है जहाँ पड़ोस की भाभी जाने को तो कहती हैं पर अंतिम समय पर कोई बहाना बना मना कर देती हैं.

उसका मरद चार छेह साल यहाँ रहकर ढल चुका है. उसकी आदत में मच्छरदानी लगाकर सोना ही नहीं कभी शनिवार इतवार चढ़ा लेने की आदत भी जुड़ गयी है. जिनसे उसने कर्जे ले रखे हैं जिन्हें दे रखे हैं या कमेटियां डाल रक्खी हैं वही उसके साथ पीने वालों में हैं..कभी पड़ोस से कोई कटोरी चल कर आएगी और अपने नखरैल बच्चे के लिए अरहर की दाल लिए वापस लौटेगी. पर कुछ दिन पति के समझाने के बाद महंगाई के चलते ये सिलसिला बंद..पर शराब शायद अर्थशास्त्र से संचालित नहीं होती, इसलिए जामों के टकराने दौर वैसे ही चलते रहेंगे..

होने वाला बच्चा दिल्ली के किसी सरकारी हस्पताल में इसलिए होता है क्योकि छुट्टी नहीं मिली और यहाँ अपना हर्जा कर कौन उन्हें घर छोड़ने जाये इसी उलझन में बात टलती रही और उस रात मकान मालकिन के बेटे की गाडी न होती तो कितनी समस्या हो जाती..बच्चे बड़े होते हैं नीचे गली के बच्चों के साथ. कभी कंचे कभी किरकेट. वो इस्कूल की दिवार में लगे कम्पूटर भी थोड़ा बहुत सीख गए हैं. सात साल के होते-होते वो गली से पहली क्लास में पहुँचते हैं. बिलकुल नयी दुनिया है. और उस गतिशीलता में एक और पीढ़ी उन्ही वर्गीकरणों में अपनी भूमिकाएँ तलाशने के लिए तय्यार होने लगती है.

मतलब एक स्त्री के अपने मयके से निकल शहर आने की परिघटना उन सारी क्रियाओं प्रक्रियाओं को अपने में समेटे हुए है जो शहर को शहर बनाये रखती है. उन ढांचों में उसका आना परिवर्तन तो है पर कालान्तर में वह उसी को मजबूत करती है. इस स्त्री का कोई एक नाम नहीं है न ही कोई एक चहरा. बस यह है. हमारे आस पास. यह किसी अखबार में नहीं है, कोई चैनल वाला अपनी फुटेज इन पर बर्बाद नहीं करेगा. उनके पास तो ग्लॉसी पेपर पर क्रीम पौडर से लिपी पुती देहें हैं. लक्ष्मी बाई से लेकर सरोजनी नायडू, कल्पना चावला, प्रियंका वाड्रा नहीं गाँधी..यह समाज चल इन्ही के शोषण पर रहा है उन मेट्रोपोलिटिन भाषी जुबानों से नहीं, जो बच्चे भी गोद लेती हैं..

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[1] पहुना : हमारी तरफ अवध के ससुरालों में उत्तर भारत के दामाद जमाई के लिए इस्तेमाल होने वाला पद. शायद कभी ब्रज की सूरदास की गोपियाँ भी इस्तेमाल करती हैं. माँ के मुख से कई-कई बार ये भी सुना है, 'आज बदरी काल बदरी, आवा पहुनवा मार मुंगरी'. छेड़छाड़ के प्रकरणों का एक अध्याय ये भी है. [2] बिचलाना : बारिश के बाद मिट्टी वाली ज़मीन इतनी चिकनी हो जाती है जिसपर कोई भी फिसल सकता है. इसी सन्दर्भ में. [3]फहलारे : मतलब खुली जगह. इसके विपरीत 'सकित' का इस्तेमाल होता है उन जगहों के लिए जहाँ वैसी ही घुटन है जैसी ऊपर महसूस हो रही है.

शहरनामे में:
ये जो शहर है लखनऊ | हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ | उन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया | लगभग तीन साल बाद: शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या |

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