मार्च 17, 2012

दाढ़ी विमर्श उर्फ़ प्रतिरोध का एक और अध्याय

दाढ़ी. ये दिखने में भले 'दा' और 'ढ़ी' है, पर इसे विखंडित करने पर एक भरा पूरा समाज खड़ा दिखेगा. उसकी संरचना में आप कहाँ से देखे जा रहे हैं इसका पता नाम से पहले आपके चहरे पर मौजूद या न मौजूद दाढ़ी बड़े आराम से दूसरे को पढने के मौके देगी. यह संस्कृति का एक ऐसा कूटपद है जिसे बारे में बस में चढ़ते सड़क पर चलते दुकानदार से मोलभाव करते किसी से बात करते हमें सोचना नहीं पड़ता..

इसकी व्याप्ति कुछ इस तरह की है के अगर दरियागंज से गुज़रते बस ड्राइवर की झड़प किसी मुसाफिर से हो भी जाती है और नौबत गाली गलौच तक सिमट सुलट कर नहीं रह पाती तो भले ड्राइवर कितनी हूल पट्टी दे, उसे डराने की कोशिश करे, पर उसे मालुम है कि उस आदमी के कूचा साद-उल-लाह खान से वापस लौटने से पहले बस मोहल्ला कब्रिस्तान तुर्कमान गेट के पार हो जाये तो ही भला. और यही सोच गाड़ी एक ही गियर में बड़ी मस्जिद छत्तालाल दिल्ली गेट पहुँच जाती है..

मतलब यह भी है कि दाढ़ी और मूंछ दोनों को अलग-अलग पहचानें मान लिया गया. मुहावरे गढ़ लिए गए.
मूंछ का सवाल बहुत बड़ा शुरू से ही था और आज भी इसकी जिम्मेदारी का एक हिस्सा स्त्री के पास सुरक्षित है. दाढ़ी होती भी है तो चोरों के. उनकी दाढ़ी में फंसा तिनका कई-कई बार उन्हें तेनालीराम जैसे विद्वानों से होते हुए जेल तक पहुंचा देता है. मूंछ का बाल कोई छूने भी नहीं देता.  उस पर बल भी पड़े पर परधान जी की लंबी-घनी मूंछों पर ताव देते ही फिजा बदल जाती है. पर ऐसा क्योंकर हुआ की सभी ईश्वर और देवता बिना मूंछ के हुए, सिवाय ब्रह्मा के.

वहीँ दाढ़ी के मुहावरों के साथ ऐसा दंभ न मिलने के पीछे भाषा की निर्माण प्रक्रिया भी दिख पड़ती है, जिसे इतना निर्दोष मान छोड़ा नहीं जा सकता. औरतें दाढ़ीजार ही कहेंगी, मूंछजार नहीं. मौका लगते नोची दाढ़ी ही जाती है. और यह पेट में भी पाई जाती है. फिर सवाल ये भी है कि चोर लड़की नहीं हो सकती क्या और अगर सारे चोर पुरुष ही हैं तो अब तक उन्होंने दाढ़ी रक्खी ही क्यों हैं..मतलब बात कहीं और ही है. इस तरफ झाँकने पर यह दिखता है कि क्यों एक धरम में मूछें हैं और दूसरे में सिर्फ दाढ़ी इतनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं.

आलोक की मूंछें  उसकी माँ के दिल्ली आने से पहले उसके चहरे पर आ जाती हैं. ऐसे ही मुकेश ने फर्स्ट इयर के बाद अपनी मूंछें नाई के हवाले कर दीं. पहले पहल गोरखपुर जाने से पहले थोड़ी बहुत उगा लेता पर इधर वो भी नहीं. इन मूंछों के पुरुसत्तात्मक पाठों में उसका बेटा मूंछ तब तक साफ़ नहीं करवाता जब तक की वह जीवित है. यह मूंछों का नागर संस्करण है. और ये वही पल है जब दोनों ने इस शहर में फिट होने के लिए अपनी मूछों को त्याग दिया. शहर इतने आक्रामक तरीके से समरूपों को तय्यार करता है, जहाँ आप आप नहीं रह पाते वो हो जाते हैं. भले हम रुचियों की निर्मिती में इसकी उपस्थिति नज़रंदाज़ कर दें, पर इसकी उत्पादन प्रणाली में माल तभी बिकेगा जब हमारा सौन्दर्यशास्त्र उन्ही मानकों के अनुरूप ढल हमारी आदत बन जायेगा.यहाँ सौन्दर्य की परिभाषा में बाल कहीं नहीं अटते.

यह ऐसे ही नहीं हुआ है की शीला' बनी कटरीना अपनी देह को स्त्री संपत्ति घोषित करती हैं. पोशाकों के विशेष संस्करण तभी कोई खरीद पहन सकता है जब उसकी देह पर बाल न हों. यहाँ सिर्फ काखों से बाल  ही गायब नहीं हैं वहां पसीना भी नहीं है और बदबू का तो सवाल ही नहीं. मिनी स्कर्ट पहनने से पहले, शर्ट के ऊपर वाले बटन खोलने से पहले वैक्सिंग करवा हफ्ते दो हफ्ते तक निश्चिन्त हुआ जा सकता है..वो खुला है न यूनिसेक्स सलून कमला नगर में..कितना सस्ता भी तो है..

दूसरे छोर पर इसका दमनकारी-हिंसक रूप भी है, जहाँ वे सब नहीं अटेंगे जो इनके जैसे नहीं होजाना चाहते, जो प्रतिरोध कर रहे हैं, जो इनकी नवसाम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ हैं. यह ऐसे ही नही है कि पूरी दुनिया लड़ाई का अघोषित मैदान नज़र आती है. उसके कुछ मैदान गोधरा जितने छोटे हैं तो कुछ इराक अफगानिस्तान जितने बड़े भी. यह वही समय है जब अमेरिकी सेना ऐबटाबाद में अपने गुप्त ऑपरेशन को जेरिनिमो नाम देती है. मकबूल फ़िदा हुसैन बे-वतन होकर सुपुर्दे ख़ाक हुए. तसलीमा की दाढ़ी भले न हो उनके विचारों ने उन्हें ऐसा बना दिया है. शर्मीला इरोम ऐसा ही एक और नाम है. ज़फर पनाही  ईरान जेल में बंद प्रतिबन्ध झेल रहे हैं. आंग सांग सू की अभी पीछे बाहर आई हैं..कोटेश्वर राव किशनजी मारे जा चुके हैं..

{यह पोस्ट आज सोमवार दो अप्रैल को जनसत्ता में आई है. पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएं .
और ऊपर पोस्ट में यदा-कदा कई लिंक इधर और जोड़ दिए गए हैं. उन्हें मन करे तो देख सकते हैं, उनका रंग अलग है }

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