अप्रैल 01, 2012

प्यार का पहला ड्राफ्ट

पता नहीं कैसा होता जा रहा हूँ. उन सारी बातों मुलाकातों के चुक जाने के बाद भी आज तक वहीँ कहीं अटका सा. निपट अकेला. वहीँ किसी कोने में. कोई नहीं है जिसके पास के कान में कुछ कह सकूँ. उन स्पर्शों की याद भी नहीं है कि हाथ की कोमलतम रेखा में मैं कहाँ गुम हो जाता था. कभी साथ लायब्रेरी के किसी शेल्फ की धूल से उलझते. फिर..पता नहीं क्या..उस दिन ऑटो में मैं-तुम साथ थे..और वहां भी हम अकेले ही थे जब सीढ़ियों पर तुमने पूछा था, अब क्या करोगे..सिर्फ इतना बोल पाया था एमए. बोलना तो कुछ और भी था पर छिपा लिया..

कैसे कहता तुम्हारे साथ हो जाना चाहता हूँ..उतना ही तुम्हारे पास चले आना चाहता हूँ जितने पास हमारे रोल नंबर थे. मेरा एक-तुम्हारा दो. पर नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उस आखिरी दिन भी नही जिस दिन अपनी सारी उर्जाओं को समेट बस बोल देना था. नही बोला कुछ भी. बस लाल साड़ी में तुम्हे देखता रहा..

पता नही कैसे तुम्हारे पास  मेरे घर का नंबर रह गया..उस इतवार दूरदर्शन पर आलोक नाथ वाला तलाश आरहा था और नीम का पेड़ अगला था..घड़ी शायद सवा तीन बजा रही थी. उधर से न सही मेरी तरह से औपचारिकता थोड़ी-थोड़ी बनी रही ही, तभी नयी सड़क साथ चलने को किसी तरह टाल गया था. एक दिन फिर तुमने फोन किया के मैं भी एमए फिलोसफी में आ जाऊं..पर इस बार भी नही..हमें तो हिंदी में झंडे गाढ़ने थे..तुम फिलोसोफी में चली गयी, मैं यहीं रह गया..

आज पता नही ये सब क्यों लिख रहा हूँ..मुझमे इतनी हिम्मत नही थी कि तुम्हे सब कह जाऊं..अपने तर्क खुद गढ़े थे कि जब अपने पैरों पर नही खड़े हो जाते तब तक कुछ नही..कितना झूठ था ये सब..आज भले इसमें पुरुषसत्तात्मक व्याख्या निकलती हों, पर तब का सच यही था. कमज़ोर नायकों में एक और..इस एक कमरे की संरचना में कहाँ अटती तुम..आज तो हमारे लिए खुद यहाँ जगह कम होती जा रही है..उसके इर्द-गिर्द टापूनुमा अखबारों-किताबों के पहाड़ों के साथ सास-ससुर-देवर-नन्द की खटर-पटर..

तुमसे न कहना न बोल पाना अन्दर ही अन्दर घुटते रहना..चहरे पर उन दिनों बथुए की तरह उग आई दाढ़ी आज मुकम्मल लहलहाती फसल में बदल गयी है.. चिड़चिड़ाहट तो गुस्से के साथ मानो मुफ्त गले पड़ गयी थी..सामजिक होना क्या होता है भूलता जा रहा था. अपने विस्तार को बाहर नही अन्दर की दिशा में केन्द्रित कर अपने बिलकुल उलट मैं खुद को बनाता गया..नही लिखना चाहता कि अभी भी परसों जब फरीदाबाद तक मेट्रो के हो जानें की घोषणा करता सरकारी विज्ञापन देखा तो तुम्हारी याद आये बिना नही रही..वो तो मैंने उन मुलाकातों को भी सोच लिया था जिनमे हम दोनों चांदनी चौक घूम रहे हैं और वापसी में ओखला स्टेशन के उस बेंच पर बैठे ट्रेन का इंतज़ार कर रहे होते..पर ऐसा कुछ हुआ नहीं..

उस दिन संजीव सर से कॉलेज मिलने गया था तो मैम मिलीं और तुम्हारी बात होने लगी..तुमने एमए छोड़ने से पहले उन्हें नहीं बताया, उन्हें अच्छा नहीं लगा और एक हद तक मुझे भी के जब उन्होंने तुम्हे मास्टर्स के बाद कॉलेज में एडहोक लगवाने की बात कही थी तो..कुछ नहीं..अब फरक भी क्या पड़ता है..कभी लगता है ठीक  ही हुआ तुम्हे कुछ नहीं बोला..पता नहीं ऐसा क्यों..उस आखिरी मुलाक़ात में तुम्हारी आँखें और उसके नीचे पड़े काले धब्बे तुम्हारी देह को देख रंग दे बसंती की किरण खेर याद हो आती है जो वहां सोहा के लिए कहती है, कुछ खा भी लिया कर, कोख में बच्चा कैसे पालेगी..पता नहीं उस दिन से पहले तुम इतनी कमज़ोर ही नहीं लगी थी..क्या तुम अब भी ऐसी हो..

आज लगता है उन सालों की चुप्पी कैसी अजीब सी थी..अपने से दूर चलते जाने की..भले उन दिनों खूब लिखा, पर उस आत्म केन्द्रित पाठों में मेरा प्रतिक्रियावादी अध्याय बोहेमियन जैसे लगते थे, पर बड़े कायदे के साथ..आज भी मैं यह सब तभी लिख पा रहा हूँ जब मुझे पता है तुम तक मेरी आवाज नहीं पहुंचेगी..तुम तो मेरी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में भी नहीं हो, ऑरकुट पर ज़माने पहले भेजी फ्रेंड रिक्वेस्ट तुमने कभी एक्सेप्ट ही नहीं की..वैसी भी कौन सा तुम मेरी तरह उसी अतीत में ऐसी मौके बे-मौके अटक जाती होगी..और न ही यह पहली बार है, उस सेल्फ प्रोफाइल में वहां ज्योति मैम ने भी तुम्हारे बारे में पढ़ा था..इन्ही पूर्वपीठीकाओं के साथ थोड़ा अपने पास पहुँचने की जद्दोजहद में बी.एड.में जूझता रहा..ख़तम होते-होते थोड़ा बहुत अपने को दुबारा पाने की तरफ चल पड़ा..

यही वो शुरुवात है जहाँ तुमने कहा था, हम एक दूसरे को जानते ही कितना हैं..

[जारी..के कभी कुछ लिखा तो..
आज साल भर से भी ज़्यादह अरसे बाद एक पोस्ट और जोड़े दे रहा हूँ। वहाँ जाने के लिए इसे चटकाएँ ]

आवाज़ें..

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