अप्रैल 03, 2012

शहर-मौसम-शहतूत-कोयल और हम

इस बार हमारी सड़क पर पतझड़ उस तरह नहीं आया जैसे पहले आता था. एक दम तरतीब में लगे सारे पीपल अपने पत्तों की साल भर की यादों के बाद बिदाई कर देते. एक साथ. फिर दम से हफ्ते बीते नए चिकने चमकीले पत्तों की राह देखते. उनका ढलते सूरज के वक़्त बहती हवा के साथ देखना उस नए आने वाले समय की ठंडक से भर देता. पर ऐसा किश्तों में होता. छत पर टहलते नीचे झांकती आँखें उन झर गए पत्तों की व्यर्थता को देख पता नहीं कैसा हो आता. सड़क पर हर सुबह फुटपाथ के सहारे उनपर चलने की आवाजें आज भी कानों में है. और होती उस वक़्त झाडू से उडती धूल. किसी गाडी की रफ़्तार में भागते पहिए से उड़ गए पत्तों की सरसराहट. उन्हें महसूसना अपने रोमांच से डूबना होता.

उनका इतवार की छुट्टी में इकठ्ठा हो जाना फिर हम सबका धम्म से से उन पर कूदना, बेफिकरापन, गेंद ढूंढते बस इतना ध्यान होता था कि कहीं से कोई पीले खून वाला कीड़ा न चढ़ जाये. और वो वाला तो कभी हाथ ही न लगे जिसके छू जाने भर से अनाम सी गंध छूटती और हाथों पर ही रह जाती. लाल पीठ पर काले घेरों वाला ये कीड़ा जब जब इसे छूने की कोशिश करते तब तब भूला याद आता के ये तो उड़ भी सकता है..पर आज भी अशोक के पत्तों को इकठ्ठा कर एक दूसरे पर फेंकने में वाले दिन बीच-बीच में आ जाते थे, वही हमारी गर्मियों की बरफ थी..

पकडिया के पत्ते बड़े होने पर इतने धुलिया जाते हैं की कोई मान भी नहीं सकता जब उस पर नयी कपोलें आती हैं तो हमारी कोयल बगल के आम को छोड़ इसकी डाल से कूकती है. हर साल. कभी मन करता तो इसे छेड़ भी देते फिर शुरू होती असली नकली की दौड़. पर थोड़ी देर में समझ जाती, और झेंप कर चुप बैठ जाती. इधर उस आम की बौर का हर एक साल छोड़ कर आना लगातार जारी है..पर उन ठंडी सुबहों में बहती उसकी खुशुबू अब नाक तक नहीं पूछती..शायद इसका कारण इधर उन जल्दबाजियों का न होना है जब हम सवेरे एक तरह की भागमभाग में होते थे या रात ज़यादा देर से सोने के चलते उस रक्तिम आभा वाले सूरज से गुफ्तगू अब पौने सात-सात के आस पास ही हो पाती है..

अभी कल दोपहर आलोक-मैं महुए की गंध पाकर उस पेड़ तक गए पर वहां सिर्फ गंध थी महुए नहीं..शहतूत का पेड़ गेट पर लगा है. पर बेचारा शहतूत लायक बचा नहीं. उसकी लगातार इतनी छटाई से अब सिर्फ उसके हिस्से में ठूंठ जैसा ताना बचा है और उसकी क़ुतुब मीनार की तरह की टहनियां. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जब इन अप्रैलों में वह नीचे फर्श पर गिरता है तो दाग पड़ जाते हैं और उसे साफ़ करना पड़ता है. हम सुविधा भोगी हैं इसलिए पैर के नीचे इनको नहीं चाहते.

उस दिन पंचकुइयां रोड बनवारीलाल वाले स्टैंड पर खड़ा थोड़ा पीछे लौट गया. जब जब पीछे लगे पेड़ से हम शहतूत उन बड़े लाल पीले फूल के पत्तों में लाते थे-जिन्हें आलोक के यहाँ थलकमल कहते हैं- तबतब शुरू होती थैलियों की खोज. फिर उनमें धोते. मिट्टी पानी में रह जाती और पत्ते में भरभर दुपहरियों में छाया वाली जगह ढूंढ़ लाल गुलाबी शहतूत खाते. इधर न वो छुट्टियाँ मार्च अप्रैल में पड़ पाती हैं न अब कोई जाता है. सब अपने को बड़ा मान बैठ गए हैं. वहां स्टैंड पर जिन बुजुर्ग होते प्रौढ़ महापुरुष ने उन लड़कों को वहां से भगाया शायद उनके हिस्से वे स्मृतियाँ नहीं होंगी और न ही किसी के पास ऐसी किसी चीज़ को जमा होने देना चाहते होंगे..

अब उस छत वाले कमरे की दुपहरी सुपहरी गरम होना शुरू होंगी तब जो खिड़कियाँ अभी तक खुली हैं उनको बंद करने के सिलसिले शुरू होंगे. वहां परदे लगा चुपचाप सोने की योजनाओं पर काम किया जायेगा. शामें धूलभरी आकाश में छिपे सूर्य देवता से बढ़ गयी उमस और फिर बहते पसीने में उन दिनों को कोसने पर मजबूर करेंगी. पानी पानी पानी सिर्फ पानी बिकेगा. रूह-आफ्ज़ा से लेकर खारी बावली में नाम अनाम ठंडाई, टीवी पर रसना लिम्का के नए विज्ञापन..फिर भी एक बात समझ नहीं आती के जब हम पानी की इतनी किल्लत से जूझ रहे हैं तब ये सारे विज्ञापन और साल भर मुग़ल गार्डन में घास के गलीचों को बचाए रखने के लिए इतने गैलन पानी और पसीना क्यों खर्च किया जा रहा है..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...