अप्रैल 09, 2012

उसका नाम टीटू तो बिलकुल नहीं था

हम सबके लिए उसका नाम टीटू ही था.
बचपन से हम उसे ऐसे ही देखते आ रहे थे.
देखने का मतलब
ये नहीं कि वह दर्शनीय स्थल जैसा था,
हमने देखा है उसे बोलने की चाहना लिए हुए.
छटपटाते-बिलखते
आँखें बाहर निकलने को हो आती थीं,
पर नहीं निकल पाता था
जबान से कोई भी स्पष्ट शब्द.

हर बार और जितनी भी बार, उसने बोलना चाहा,
थूक बने राल के साथ
लिपटी हुई कुछ अस्पष्ट ध्वनियाँ निकलीं.
जिसे हमारी भाषा का व्याकरण नहीं समझा,
न कोई हमारी मदद कर सका.
वह हमारी तरह ही कहना चाहता था
अपने दिल में आई कोई प्यारी-सी
नन्ही-सी कोई बात,
कहीं किसी कोने में दबी रही होगी
कोई याद.

जब भी वह बोलता
उसके शब्दों के साथ लिपटे-लिथरते जाते ध्वनि-कण
थूक से लिजलिजे हमारे कानों से पहले
आँखों तक पहुँचते और हम
जल्दी ही भाग लेना चाहते.
नहीं देखना चाहते थे उसकी भीगी-गंधाती कमीज
जो बताती जाती कितना कुछ है, उसके पास
जो वह किसी के साथ बांटना चाहता था.

उसके घरवाले बताते हैं
गुसलखाने में फिसल कर उसकी मृत्यु हुई,
पर मुझे पता है यह झूठ है.

वह तब फिसल-गिरा होगा
जब कुछ बोलने के लिए
सालों जूझने तड़पने के बाद,
सहसा उसकी कनपट्टी के पास उभर आई होंगी नसें
लड़बड़ाती जीभ पर काबू पाने के लिए
सारा बचपन आँखों के सामने दौड़ गया होगा,
सारी उर्जाओं को समेट, अपना ही नाम बोलना चाह रहा होगा
और जिसने भी उस वक़्त सुना होगा
वह बताएगा उसका नाम टीटू तो बिलकुल नहीं था.

और इनसबके बीच
मैंने आज से पहले
कभी उसके बारे में नहीं सोचा
कभी उसके लिए समय नहीं निकाला.

पर आज अपनी इन पंक्तियों को पढ़ कर लगता है
इन सबमें छुपी होगी
मेरे अन्दर की दया-सहानुभूति-उपेक्षा
के बाद उपजी भावना
या मेरे अन्दर का ऐसा ही कोई भाव
जिसने मुझे
एक अदद धडकते दिल के साथ
अभी तक जिन्दा रखा..

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