अप्रैल 21, 2012

दिन पहला:मेरी त्वरित टिपण्णी

दिन एक. जैसा की होता है पहले दिन हिदायतों की मुगली घुट्टी के कई पाठ पिलाए जाते हैं. स्वयं का श्रेष्ठता बोध सहज तो कभी होता नही है. पर जब लाबदे की तरह ओढ़ लिया जाए तो कुछ वैसा ही होता है और किया जाता है. स्वयं को स्वतंत्रता-विचार-परावर्तन-चिंतन-संश्लेषण-विश्लेषण की प्रतिमूर्ति मानना और हमसे भी वही अपेक्षा करना. पर हर सन्दर्भ में पूर्वाग्रह भी दिखते हैं.

संस्थानिक रूप से हम लोगों को 'स्कॉलर' जैसा भारी-भरकम शब्द आज ही लादने को दे दिया गया. कंधे उचकाने का मौका भी नही मिला. भाषिक रूप से खेलना उन खिलाड़ियों का पुराना अंदाज़ है. इतनी ज़ल्दी बदला नही जा सकता. कोशिश करना भी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है.

जब मुझसे पूछा तो मेरा जवाब कुछ ये था कि मातृभाषा जो हमें बोलना सिखाती है, अपने परिवेश-समाज-संस्कृति को पहले पहल देखने समझने का अवसर देती है, वही भाषा उम्र के साथ-साथ कहीं पीछे कैसे छूट जाती है? मैं खुद कितना समझता हूँ, उससे ज़यादा जरुरी था फौरी तौर पर उनकी समझ में कुछ न आने देना.

वहां अन्य सहभागियों की आँखों आँतों के बीच पसलियों से घिरे दिल और ऊपर के माले की खोपड़ी में कई=कई सपने अरमान कुलबुला रहें हैं. उन्हें खुद पता है वह कितनी सफाई से आज झूठ बोल गए हैं. आदर्श के चरम से अपने को प्रतिष्ठित होता देखना, किसे अच्छा नही लगता. इन सबमें चेहरे पर पुते दर्प ने यही कुछ बताया. दो तो सिर्फ अध्यापक के अलावा कुछ और बनना ही नहीं चाहती थीं. एक अपने पिता से आगे बढ़ कुनबे में सबसे ज्यादा पढ़ना चाहती है. और भी बहुत कुछ कहा जिस पर कभी किसी और रोज़..

और मैं खुद एक सवाल से जूझ रहा हूँ कि उस दिन लिखे जवाबों को इन लोगों ने प्रमाणिकता नही दी? माने क्या ये सब मेरे विचारों से सहमत हैं, जो उस शनिवार वहां लिखे गए या उसमें इन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा जिसे मैं खुद असामंजस्य पूर्ण मानता रहा !!

मनोवैज्ञानिक इन तीन पंक्तियों का जो मर्ज़ी करें मेरे उलझने का सिर्फ यही मतलब है कि पेपर जांचने वाले और यहाँ पढ़ाने वाले अध्यापकों में यदि कोई रिक्त स्थान या गैप होता है तब मैं क्या करूँगा? एक तरफ मेरा दाखिला मेरे विचारों से सहमति भी प्रकट करता है वहीँ पर यहाँ का रवैया उन सबको संभाल पाने की स्थिति में किसी तरह भी तैयार नही लग रहा..

10:52P.M. 21/07/2011 

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