अप्रैल 22, 2012

मुझे तब-तब याद आएगी हम दोनों की

पता नहीं उस दिन की छुअन को अभी भी महसूस कर रहा हूँ, एक बारगी लगा इतने मुलायाम हाथों में हड्डी हो भी कैसे सकती है. और असलियत में थी भी नही. पर ये सपना सिर्फ मैंने देखा तुमने नही. देखा होता तो कोई दिन हम कहीं मिल अपने हिस्से की कई-कई बातें करते. पर नही, ये भी नही हुआ. तुम्हे वक़्त नही मिला, न मैंने दुबारा पूछा..पर ऐसा क्या है जो मुझे तुमसे जोड़े रहता है हमेशा. समझ नही पाता..

तुम्हारा नंबर नही बदला. वही है. बात भी हुई. कहा वक़्त मिलने पर बताउंगी. आवाज़ में न विस्मयबोधक चिन्ह थे न ही कोई प्रश्नवाचक सवाल. तुमने सोचा होगा, फोन आ भी गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा और उसमे से मरी चुहिया भाग निकली. पता नही क्यों लगता है तुम्हारी पालियों का वक़्त कभी मेरे हिस्से में नही पड़ने वाला. कबी ये भी लगता है हम दोनों एक दूसरे के हिस्से में इतने ही थे. बीते कल की किसी कहानी की तरह. बिन बोले. चले जाते. चलते जाते. कभी किसी कोने से बात हो जाती, तो लगता, चलो साथ हैं..बस इतना ही, इससे आगे नही..

अब ऊब चुका हूँ उन्ही दो तीन तरीकों से बार-बार उबने से. जहाँ तीन चार साल पहले था, लगता है दो-तीन इंच इधर-उधर होने के अलावा कुछ नही बदला. सपने जस के तस हैं. अपने आज को लताड़ते, सपने देखते. किसी के हाथ में हाथ डाल उस डूबते सूरज के आर-पार जाते खिड़की से दूर कहीं हवा के झोंकों के साथ.

पर सीधी सी बात ये भी है के कोई यूँ ही सारी ज़िन्दगी साथ चलने-बिताने का फैसला सिर्फ एक बार कहने भर से ले ले..हामी भर दे..कोई फिलम तो चल नही रही.. कहाँ है हम दोनों का साझा अतीत..जहाँ सिर्फ हम दोनों होते..मुझे लगता है जब-जब भी हम एक-दूसरे के करीब आये वहां हम दोनों होते हुए भी हम दोनों नही कई-कई जोड़ी आँखें साथ थीं..हमारी बातों की औपचारिकता कभी निजी एकांत की तरफ बढ़ ही नहीं पायी..या शायद मौके बनाये ही नही गए..भीड़ के बीच..

इधर पता नही क्यों इसमें उलझता जा रहा हूँ..हर इतवार अंग्रेजी अख़बारों में अपना राशिफल पढ़ता हूँ और सोचता हूँ चलो कुछ गुंजाइश बनती है..पर सोमवार होते-होते वह पढ़ा सब साफ़ और वही पुराना ढर्रा..इतवार का इंतज़ार. के कभी वो भी तो अपने हिस्से का पढ़े, कुछ करे..ऐसा नही है कि इधर नियतिवादी होता जा रहा हूँ जो थोडा बहुत दिमाग चलता है वहां पहुँच लगता है, हम ऐसे ही कम बात-कम मुलाक़ात वाले दोस्त ही बने रहेंगे. जब तक कि हम दोनों की संस्थागत भूमिकाएं नही बदल जातीं. तब स्वतः ही दूसरे की अपेक्षित भूमिका, निर्णायक दूरी बन उन अ-स्पष्ट संबंधों की उष्मता को कम करती चली जायेगी..

मतलब हम उन भारतीय परिवारों में रह रहे हैं जहाँ लगती नौकरी के साथ लड़के वांछनीय हो रिश्तेदारियों में पूछे जाने लगते हैं और बढ़ती उम्र के हवालों के साथ लड़कियों को जल्दी से जल्दी बिदा कर दिए जाने की योजनाओं पर मंथन शुरू हो जाता है.. और तब वहां ऐसे क्षण भी आयेंगे जब उन हाथों की छुअन का अहसास कभी किसी बरसात की शाम याद आकर थोडा सा रूमानी कर चला जायेगा..

इन सारी दिमागदारियों के बावजूद भी पता  नहीं यह सब कब-तक चलेगा..शायद उस दिन तक..पता नही क्या..शायद ऊपर लिख ही चुका हूँ..शायद तब-तक जब-तक तुम सीधे मना नही कर देती..पर पता नही उस दिन क्या होगा जब तुम भी मेरी तरह सोचने लग जाओगी..जिसकी संभावनाओं पर अभी कुछ नही कहना चाहता. अपनी तरफ से कोई कोशिश तो होने से रही..पर क्या पता, हो भी जाए..

तभी तो आज शाम जब सुशील ने अपना एफ़बी स्टेटस लिखा..जिंदगी के सारे सपनों का मोम /सारे रिश्ते की जमावट /तो कब की पिघल चुकी थी /बस रह गया था तुम्हारे साथ का इक धागा /जो जलाए रखा था जीवन की लौ /लो /आज वो भी बुझ गया /कुछ अवशेष सा जम गया मेज पर /जिसे वक्त खुरच-खुरच के साफ़ कर डालेगा..

तब मैंने वहां जाकर ये लिख मारा..पर गाहे बगाहे /जब हवा /उस मेज़ के चादर को उघाड़ देगी /मुझे तब-तब /याद आएगी हम दोनों की..

1 टिप्पणी:

  1. सोमवार इसे फेसबुक शेयर करने के बाद आलोक की टीप..इसे पोस्ट का विस्तार ही समझें..

    Alok Jha मोमबत्ती एक एवजी व्यवस्था है जो किसी स्थायी के हट जाने पर बनती है और जैसे ही स्थायी वापस आया कि एवजी बाहर !
    अब मुद्दा स्थायी बनाने की प्रक्रिया का रहा अगर वही करप्ट है तो क्या !
    Monday at 10:55 via Mobile · Like

    Shachinder Arya अस्थायी ही कभी-कभी स्थायी ही होता है पर नज़र का धोखा देखने नही देता..और कोई करप्ट नही, उसका अकथित ही कथन है..
    Monday at 11:02 · Like

    Alok Jha गालिब का खयाल तो अच्छा है पर कब तक यह खयाली समोसा खाया जाए !
    Monday at 11:50 via Mobile · Like

    Shachinder Arya उस पुलाव को बीरबल की खिचड़ी बनने से रोकना भर है बस..हो गया..
    Monday at 11:52 · Like

    Alok Jha भाई जी उस खिचड़ी में कुछ तो स्थाई था भले ही मामला दूर हो !
    Monday at 11:55 via Mobile · Like

    Shachinder Arya चलो तब फिर हम उष्मता हो गए और वे ऊपर की हांडी..एक तो यहाँ भी स्थायी है..
    Monday at 11:59 · Like

    Alok Jha मारे न ये ' बक्वांडपप्रत्याशा ' है !
    बगुला सांड के अंडकोश को लटकता हुआ मांसपिंड समझता है और उसके पीछे लगा रहता है कि यह अब गिरा तब गिरा !
    Monday at 12:05 via Mobile · Like

    Shachinder Arya यहाँ प्रत्याशा ऐसी है कि हम चाहे न चाहे एक दूसरे के पास होने का भ्रम तो बने रहने दें महाशय..
    Monday at 12:09 · Like

    Alok Jha अब यह उम्मीद नहीं थी आपसे !
    Monday at 12:10 via Mobile · Like

    Shachinder Arya ख़्वाब है उसे ख़्वाब ही रहने दो..सुबह का होता तो कुछ और बात होती. मुश्किल ये की खुली आँख से देखा.
    Monday at 12:13 · Like

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