अप्रैल 25, 2012

दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन

बात करने के लिए ढूंढे कोई नहीं मिलता. फोन किसे करूँ. राकेश ने कभी दस के बाद फोन नहीं उठाया. आलोक को करने का मन नही हुआ. अरुण अपने में इधर उलझा सा है. उमेश भी वहीँ कहीं अटका सा. आशीष अपनी तय्यारी में है..अभी याद नही आ रहा के नीरज का फोन सुबह आया था तो वह कल की सुबह थी या आज की..मुकेश से बात उसी इतवार फोन काटने के बाद से नही हुई. लवकेश कभी-कभी करता है राजकुमार राय की तरह..पता नही नाम गिनवाकर क्या हो जाने वाला है..

नीचे की अड्डेबाजियाँ गायब होकर इंटरनेट पर सर्फ़ करने से लेकर इन कमरों में दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन सरीखे गानों की ज़द में आ चुकी हैं. अब होली जैसे दिनों में भी एक बार भी हम सब नहीं मिल पाते. पुराने दोस्तों ने नयों के लिए जगह छोड़ दी है. और पुराने किसी इतवार को याद कर लिया करते होंगे पार्क में वॉलीबाल खेलते हम सबों को. वही आखिरी खेल था जिसमे हम कई कई बार साथ हुए.

याद नहीं पड़ता उन शामों को बीते कितना अरसा हो गया जब सब मिलकर बिरला मंदिर के उस जलपान गृह में छोले के साथ समोसे, ब्रेड-पकोड़े खाने निकलते थे. झींगुर भी निकले अदरक भी. और हम सब कबी कभार किश्तों में भी जाते रहे होंगे, पर वैसे शनिवार लौट कर हमारे पास नहीं आये. न वो रातें ही कहीं दिखीं जब कुर्सी तोड़ते कमर सीधी करते क्रिकेट खेल कर थके मांदे दुपहरी के गए दिन ढले एन.पी.बॉयस स्कूल से लौटते. यही स्कूल इधर रॉकस्टार में कोर्ट बना जहाँ रणबीर अपनी विशेष उँगलियों का प्रयोग करते दिखते हैं. इस ट्रेलर में दो मिनट अट्ठाईस सेकण्ड से लेकर अगले सैकेंड तक वो स्कूल मौजूद है.. हम वापस आते एक बार बैठ जाते तो फिर घर से बार बार बुलाये जाने पर तब तक टस से मस नहीं होते थे जब तक की खाने का वक़्त नहीं हो जाता था. खाना खा वापस अपनी मंडली यहीं पंखे के नीचे जुटती. वक़्त भागता रहता हम वहीँ डटे रहते. पता नहीं बातें कहाँ किस कोने से निकल हमारी चमड़े की जुबानों को चलाये रहतीं. बारह वराह बजना तो उन दिनों आम बात थी.

हम लोगों ने मिलकर ऐसा किया कुछ नहीं के हम सब न मिल पायें. पर उसे बनाये रखने की अपनी तरफ से कोशिश भी नहीं की. फिर हुआ कुछ ये की जिसको जब वक़्त मिलता दूसरे को फोन खड़काता और साथ कहीं हो आता. रात खाने के बाद की सैर सारी पलटन साथ करने निकलती थी उसके भी टुकड़े हे ज़माना हो गया. खेल के मैदान ही वह आखिरी जगहें थीं जहाँ गाहे-बगाहे सब इक्कट्ठा हो जाते थे पर उनकी नौकरियों और बाद के समय में अपने परिवारों को वक़्त देने के नुक्ते ने उसे भी नहीं छोड़ा.

पुराने जितने भी थे यहीं घर के आस पास थे. इनके बड़े जो स्कूल के थे उनकी हद पहाड़गंज-देवनगर-रैगरपुरा बीडनपुरा की रही. आसपास में बस दो रहे राजेन्द्र और जितेन्द्र. जितेन्द्र रहता आराम बाग़ जितना पास है पर अपनी शादी की बात एक दिन पहले बताता है. के कल हम लोगों को भी बरात में साथ चलना है..बाकी मिले फेसबुक पर. संदीप से बारहवीं के बाद सात आठ साल बाद यहीं मिला. विकास-हनी-देवकी-ऋषि-शीतल-हिमानी-दिव्या-रोहित-मयूर सब सत्तानवे अट्ठानवे के बाद एक-एक कर वर्चुअल स्पेस में मिले. उस रात हनी बम्बई से वापस आया था. विकास से तभी फोन पर बात हुई थी. इनमे से कई की शादी हो गयी, कई लाइन में होंगे.

जो कॉलेज में साथ पढ़े जिन्होंने इधर वाले दोस्तों के वक़्त में कटौती कर अपना हिस्सा बढ़ाया भी उनमे अब कईयों से सीधा संपर्क नहीं बचा. जो बचे हैं उनमे से कुछ दिल्ली से कूच कर गए, कुछ यहीं हैं. पर मुलाकातें किसी से नहीं. मनोज कहीं किसी न्यूज़ चैनल में है. मुकेश भोपाल भास्कर में, जहाँ अभी पीछे अक्तूबर गए थे. नीरज पूर्णिया है. बस कुल मिलाकर तीन. गुन्जायिश करके चौथे को जोडूं तो दिनेश है. दक्षिण पूरी दिल्ली का. सौम्य से भी मुलाक़ात फेसबुक पर ही होती है..

इधर घर वाले सारे दोस्त आखिरी बार आगरा जाते वक़्त साथ थे और इसे भी बीते दो साल हो रहे हैं. शाकुंतलम में हम सबने मिलकर गजिनी  देखी थी. उस इवनिंग शो से पहले हमारे अडवांस रुपयों से पहले उस दूकान वाले ने पहले दूध ख़रीदा और बाद में कॉफ़ी के नाम पर पता नही क्या दे मारा था..ऐसे ही कोई शाम जब डिलाईट पर हमने बालकनी में दी मम्मी:टॉम्ब ऑफ़ दी ड्रेगन एम्परर  देखी थी. फिल्म तो कुछ ख़ास नही थी पर दरियागंज के ताज के उस रात बने मसाले डोसे का स्वाद आज भी कभी-कभी याद हो आता है..वो शामें-रातें फिर कभी हमारी तरफ से गुज़री ही नही..

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