अप्रैल 17, 2012

श्रावस्ती की सैर

यह यात्रा संस्मरण देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका 'देश 'में 2007 के अंक में प्रकाशित हुआ था..इतने साल बाद नज़र पड़ी तो यहाँ साझा कर रहा हूँ..चलिए चलें श्रावस्ती की तरफ..
 
सर ने कहा लिखो दोस्तों ने कहा लिखो मन ने कहा लिखो हाथ ने कहा लिखो लेकिन कलम ने कहा क्या लिखूं! इसी लिखने लिखाने के चक्कर में मेरा मन न जाने कहाँ कहाँ नहीं भटका और आखिर में हांफता हांफता रुका इतिहास के दरवाज़े पर. एक बारगी तो वह हैरान हुआ और मुझे सर से पैर तक घूरा फिर उसने कहा, यहाँ क्या करने आये हो! तुम भुलक्कड़ लोग चाहे मुझे याद करो या न करो; मैं कल भी था आज भी हूँ , कल भी रहूँगा. तुम्हारी बिसात ही क्या है!! वह कह तो ठीक ही रहा था लेकिन मेरा हक मन उन दमदार बातों से ज़यादा न घूम सका और मेरी लेखनी चल पड़ी श्रावस्ती की सैर पर..शायद घुमने से ही आराम मिले.

आप नहीं जानते श्रावस्ती को! अरे वही अंगुलिमाल वाली, शाक्य मुनि की! अब आप यह मत पूछियेगा की ये अंगुलिमाल डाकू है कौन..अरे वही अहिंसा के पथ वाला. जिसने लोगों की अंगुली काट-काट माला बनाकर अपने गले में पहनने का व्रत लिया था. अभी भी याद नहीं आया, शायद इतिहास सच ही बोल रहा था..तो चलिए चलते हैं उसी गुफा में..आप की भेंट करवा दूँ ..डरिए मत वह आपकी उंगली नहीं काटेगा. यह बात तो बौद्ध काल (5-6 सदी ईसा पूर्व) की है, अब तो केवल उसकी गुफा व अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य खड़े उसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

यह भारतीय पुरातात्विक नक़्शे पर सन 1863 में आया जब कनिंघम आदि पुरातत्त्वविदों को यहाँ पुरातव सम्बन्धी विपुल सामग्री मिली. अन्वेषण से यह तथ्य भी प्राप्त हुए की ई.पू.यहाँ मिटटी  के किलों की शुरुआत हो चुकी थी. यह सोलह महाजनपदों में से एक कौसल की राजधानी थी , जिसकी पहचान वर्त्तमान में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर और बहराइच जिलों की सीमा पर सहेट-महेट नामक स्थान से की जाती है.


हमें भी फाहियान (चीनी यात्री, गुप्त काल में) और ह्वेनसांग (सातवीं सदी) की तरह इस श्रावस्ती जाने का मौका दो साल पहले मिला. जब हम हर साल की तरह उस साल भी गाँव पहुंचें तो यहाँ का प्लान बना. चूँकि वर्तमान श्रावस्ती कटरा बाज़ार में हमारी भाभी का मायका भी था इसलिए रात रुकने की कोई चिंता नही थी. एक शाम  हम पूरे लाव लश्कर के साथ पहुँच गए. पर बीच में रात पड़ गयी. नींद का कहीं अता पता न था, बस मन न जाने किन कल्पनाओं में खो गया था, बार बार लगता घडी रुक तो नही गयी. सुबह हुई हम जल्दी जल्दी नहा धो. नाश्ता कर बस तुरत निकल पड़े. 

सुबह शांत थी. कोई ध्वनि थी तो केवल पक्षियों की उनके कलरव की. बिकुल सीधी सड़क पर चलते चलते हम बाज़ार से बहुत दूर पहुँच गए थे  और दायें हाथ पर एक दरवाज़े से हम एक उद्यान में पहुचें, वहां एक घंटा टंगा हुआ था, कोई छोटा मोटा नहीं, पूरे पांच कुंटल का जापानी घंटा. जिसे बजाने के लिए तने को काट गोल मोटी लकड़ी की तरह वहां टांग दिया गया था. घंटे की एक एक चोट हमें उसी समय में वापस ले जाने को तैयार थी. पर हमें वहां से चलना था. हम चल पड़े अंगुलिमाल की गुफा की तरफ..

होता है न कभी-कभी जल्दी के काम बनते कम उलझ जाते हैं, वैसा ही हमारे साथ हुआ. फंस गए शॉर्टकट के चक्कर में. एक बार इस शॉर्टकट पर चलना शुरू किया तो बस चलते गए चलते गए पर ये शॉर्टकट कटने को तैयार नही, ऊपर से सूरज महाशय कुछ ज़यादा ही मेहरबान दिख पड़ रहे थे..चलते चलते गाय भैंस धूल मिट्टी गोबर बछिया बछड़े सब से मुलाक़ात करते चल रहे थे, पर आँखें उस गुफा ओ देख भर लेना चाहती थीं..की तभी साथ चल रहे राहगीर ने कहा यही गुफा है.

काँटों की झाड़ियों के पार बिना पेड़ों के पार गुफा थी..हम सभी एक दूसरे के चहरे पढ़ने की कोशिश में लग गए.वह कोई फ़िल्मी, आदिमानव की गुफा जैसी नही थी बल्कि लगभग दो मंजिला ऊँची चौकोर इमारत थी. जो हमें बुला रही थी. उसके दो प्रवेश द्वार थे जो अब इतने सदियों के बाद मिट्टी के कारण कुछ अन्दर धंस गए थे. अन्दर आकर लगा हम ऐसे डब्बे में बंद हैं जिसके आमने सामने दरवाजें न हो तो बस गए..ऊपर सारा आकाश हमारी तरफ अन्दर झाँक रहा था..कहीं ये आज ही ढह न जाये इसी दर से जल्दी उस डब्बे से बाहर निकल आये. हमने कहाँ अलीबाबा चालीस चोर वाली गुफा की कल्पना की थी, यहाँ ये तो एक डब्बा निकली. लेकिन ऐसा वैसा डिब्बा नही, वह आज भी उसी समय को अपने में समेटे हुए दृढ़ता से समय की मार सह रही थी. वहां नाम के लिए भारतीय पुरातत्त्व विभाग लखनऊ मंडल का बोर्ड चमक तो रहा था लेकिन गुफा के अन्दर, कुछ दीवारों के बीच पेड़ पौधों ने अपने लिए भी जगह बना ली थी और दरवाज़े इतने संकरे की अन्दर जाते दिल बैठ जाये.

बाहर निकल हम गुफा के ऊपर चढ़ गए. वहां से दूर चिरावती (राप्ती) नदी अपना आभास दे रही थी, नदी के कारण हवा में थोड़ी ठंडक थी और कुछ ज़यादा ही तेज़. यहाँ से जापानी घंटे के निकट वाले श्वेताबर जैन मंदिर की चोंच कुछ कुछ दिखाई पड़ रही थी. नीचे उतर पक्की कुटी गए और फिर मेहट छोड़ सहेट की तरफ चल पड़े! 

जैसे-जैसे घडी की सुईयां बढती जा रही थी धूप भी अपने चरम पर पहुँच रही थी. रस्ते में सरकारी हैंडपंप देख मैंने बैग से बिस्कुट निकाले और हम सबने खाकर पानी पिया. ऐसा लगा कि पानी की ही ज़रूरत थी गले से तुरंत नीचे. पर संदीप पर इसका उल्टा असर हुआ. देह गरम लग रही थी. उसने सिर पर तौलिया रख लिया पर हम तीनो अभी वापस नही लौटना चाहते थे इसलिए अपनी स्पीड थोड़ी धीरे कर ली. धीरे धीरे सहेट पहुंचे जहाँ कभी गौतम बुद्ध अपने चौमासे व्यतीत किया करते थे.

किवदंती है कि इसी श्रावस्ती में गौतम बुद्ध ने यहाँ के धन कुबेर अनाथपिण्डक को दीक्षा दी थी और उसने बुद्ध के लिए राजकुमार जेत से अट्ठारह कोटि स्वर्ण  मुद्राओं से उसके उद्यान की भूमि को ढक कर उसके उद्यान की भूमि को ढ़क कर जेतवन ख़रीदा था. पर हम इस जेतवन में घुसे बिना टिकट ख़रीदे. एक टूटी ग्रिल से अन्दर दाखिल हुए. जहाँ महेट में केवल ध्वंस स्मारक थे, वहीँ इसकी हालत कुछ ठीक थी. तेज़ धूप में जितना भी पढ़ा उससे पता चला कि यहीं वह मूल गंध कुटी थी जिसमे महात्मा बुद्ध चौमासे व्यतीत करते समय रहते थे और यहीं से चल कर वे अंगुलिमाल की गुफा तक गए थे. चलते चलते अब थकान लगने लगी थी, हम छावं ढूंढ़ रहे थे की हम तीनों की नज़र उस पीपल की तरफ पड़ी जिसे लोहे के खम्बों से रोक कर सीधा करने की कोशिश की गयी थी. यह जैतवन में स्थापित वह पवित्र बौद्ध वृक्ष है जिसे श्रीलंका-सिंघल द्वीप- से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था. हर साल लाखों बौद्ध जगत के श्रद्धालु  इसके दर्शन और परिक्रमा को आते हैं.

सोचा था थोड़ा और रुक इत्मीनान से देखते पर संदीप का बुखार लू-धूप के कारण ये हो न सका. हम तेज़ क़दमों के साथ सुबह साढ़े सात के चले पौने चार के करीब वापस घर पहुंचे. रास्ते  में न जाने कितने  बौद्ध विहार-जैन मंदिर पड़े पर किसी पर नही रुके. उन्ही दिनों वहां एक मंदिर का निर्माण हो रहा था, नाम था महा मंकोल चाई. थाईलैंड वाले हैं. हम तो इसे नही देख पाए पर आप वहां जाएँ तो इसे देखना न भूलें. 

वैसे इस श्रावस्ती के पास  एक घंटे की दूरी- बयालीस किलोमीटर- पर बहराइच जिला पड़ता है. यहीं 1900 में महाराज सिंह इंटर कॉलेज में प्रेमचंद ने दो माह का प्रवास किया था, यहाँ से उनका तबादला प्रतापगढ़ को हुआ और वहीँ से 1901 में उनका लेखकीय जीवन प्रारंभ हुआ था.साइमन कमीशन के विरोध में फरवरी उन्नीस सौ बीस में बहराइच-जरवल-नानपारा में हड़ताल की गयी थी. सरोजनी नायडू सन छब्बीस में यहाँ आयीं थी और खादी के इस्तेमाल के लिए आवाहन भी किया था. 1929 में गाँधी जी बहराइच आये थे और एक आम सभा का आयोजन उसी पुराने सरकारी हाई स्कूल (जिसे अब महाराज सिंह इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है) में हुआ था. इसके साथ यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है महमूद गजनवी के भांजे ग़ाज़ी सैय्यद सलार मसूद [सलार सैफुद्दीन अलिअस सुर्खरू सलार ] की दरगाह पर हर साल लगने वाला जेठ मेला. इस मज़ार पर इब्नेबतूता भी चौदहवी शताब्दी में आया था.

आज इस यात्रा को दो साल हो गए पर यादों के पन्नों पर आज भी ये ताज़ा है और उन घंटों की ध्वनियाँ आज भी बुला रहीं हैं..अगर आप भी इस यात्रा को जिवंत करना चाहते हैं तो अभी से तय्यारी शुरू कर दीजिये, क्या पता इतिहास आपकी भी क्लास न लेने लगे..


{बस आखिर में यही कि इस पोस्ट में जहाँ-तहां जो फोटुओं के लिंक हैं वो इतनी पुराने नहीं हैं..उनमें से कुछ जून 2010, तो कुछ अभी हाल फरवरी की हैं..}

2 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक यात्रा संस्‍मरण. ''ह्वेनसांग (अशोक काल)'' यानि युवान चांग, लेकिन वह तो सातवीं सदी इसवी में भारत आया, हर्षवर्धन के समकालीन.

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  2. आपका धन्यवाद!!
    इसे अब सुधार दिया गया है..

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