अप्रैल 06, 2012

इधर ये दो दिन..

दिन एक

09:55 pm 05/04/2012

पंखा बंद है. मिट्टी ज़मीन पर धूल की तरह पसरी फैली है. हवा अशोक के पीले हो चुके पत्तों के साथ खेल पतझड़ जैसा मौसम बनाने के कोशिश में है. पीपल पर अब कोमलता अब कुछ कम हुई है पर उस हरे में अभी भी नयापन है. पकड़िया पूरा भरा पेड़ लग रहा है. आम बौर के साथ पतंग भी टाँगे हुए है.

आज सुबह से ही सुबह सुबह जैसी नहीं लग रही. थकी उदास खाली उब जैसा कुछ लिए..सर अभी भी भारी लग रहा है, फिर भी 'प्यार का पंचनामा' देख मारी. इतवार 'स्वदेस' में परदे पर फिलिम देखते वक़्त उसके पीछे भी लोग देखने की कोशिश में उलटी तरफ बैठे थे. पर रह गयी. टायटैनिक थ्री-डी में रिलीज़ हो चुकी है. रवीश प्राइम टाईम में जनवरी सोलह को सेना की टुकड़ियों के अभ्यास, दिल्ली कूच तख्तापलट के 'सू' को लेकर उदय भास्कर- रैडिफ की शीला भट्ट- तहलका के आशीष- आनंद प्रधान को लेकर शेखर गुप्ता की कॉपी के ऐतिहासिक महत्त्व पर बतिया रहे है.

उधर वाणी से इस अप्रैल में दो किताबें आ रही हैं. और दिमाग अवसर बराबर प्रतिभा वाले गणित से दुबारा खेलने को हो रहा है. तकिया दिवाल के सहारे लुढ़क गया है. पानी की बोतल टेप कैंची के साथ है. मोबाइल का म्यूजिक प्लेयर प्यार की पुंगी बजाकर जगजीत सिंह सरफरोशी- होश-बेखुदी- इश्क-बेहोशी की समझाईश पर निकल पड़े हैं. नीचे पिट्ठू के रात्रि संस्करण घरवालों की आवाजों के बाद भी चिल्लाते चल रहे हैं.

पता नहीं फिल्म देखते वक़्त गर्दन कैसी हो गयी थी की अब उसमे दर्द हो रहा है..

कल सी.आई.ई. का आखिरी दिन था. आज से नए रोजाना की तलाश शुरू..और पूरे दिन का हासिल कुछ-कुछ  यूँ था के फेसबुक पर हाजिरी कम से कम हो इसकी कसमे दिमाग में घुमने लगीं और किताबों में मुंह मारने की पूरी तय्यारी बन रही थी. बस ये दुपहरें अपने बने बनाये ढर्रों में नींद को अपने साथ न लाये. आज खाना फिर अपने स्वाद के साथ गले से उतर ही नहीं रहा था. आँखें रूह-आफ़ज़ा को ढूंढ़ते वापस टीवी पर अनस्टोपेबल देखने लगीं. अभी नौ बजे से लीजन आरही है स्टार मूवीस पर या पिक्स पर!!

उसने कल कहा यह उसका दिल्ली में आखिरी साल हो सकता है. जबकि अभी राकेश से बात हुई तो वहां लगा के जितनी जल्दी हो सके वह दिल्ली आना चाहता है. दोनों की कहानियों के कई-कई प्रसंग हैं इसलिए अभी इतना ही..

उस दिन अरविन्द अपनी माँ के हाथ आखिरी बने पापड़-कचरी दे रहा था. कैसे ले जाऊंगा हाथ में?? बोलकर नहीं लाया, कहा फिर कभी ले जाऊंगा. और लवकेश के यहाँ चल पड़ा पैदल. ढक्का गाँव.

वह पिछले वीरवार घर से निकल लिया था अकेले एजेंट विनोद देखी. घर पर लड़की वाले आ रहे थे, उसे देखने. दिल्ली बाहर से. मोटा दहेज़ दे रहे हैं. होंडा सिविक. पांच-आठ लाख नकद. घर-गृहस्थी का पूरा सामान. और लड़की भी. मतलब जब तक शादी के लिए मन मान न जाये तब तक रूमानी आसमान में रहे. पर प्रयोजन वादी तर्क बीच में नैतिकता वाले नुक्ते को ले आता है, के ये ठीक नहीं, के उन सबको वस्तु माने जो उसके साथ अभी हैं..दो-एक जितनी भी..

दिन दो 

01:40 pm 06/04/2012

कबूतरों की उम्र कितनी होती है?? इस खिड़की के शीशे पर आकर अन्दर झांकना. छज्जे पर तिनके इकट्ठे करना, रहना. शायद पहले उनके अंडे यहीं रह भी गए थे, जब हम अदिति जितने थे. दुपहरियों में छत की तरफ वाली खिड़की को खोल कर अन्दर बैठने की जगह ढूंढ़ते. तब से लगातार दोनों को देख रहा हूँ. हर सुबह चलते पंखे के दरमियानी में भगाते डर भी लगता है कहीं उसमे फंस न जाएँ. पर नज़र पड़ते ही टिकने नहीं देता हूँ. अभी भी उसकी चमकती आँखों में देख रहा था. शायद मुझे पहचानने की कोशिश में थे. पर मुझे तो हर कबूतर पहले का जुड़वाँ लगता है, मैं कौनसा सलीम अली के खानदान से ताल्लुक रखता हूँ..

दो दिन सत्यानाश. रात की नींदे सुबह नहा लेने के बाद की पालियों में पूरी हो रही हैं. अभी पसीना नहीं है, हवा चलती रहती है, खिड़कियाँ भी खुल जाती हैं, पर रात के बारह एक दो तो ऐसे बज जाते हैं. फिर तीन चार ऐसी आँख लगती है की सोते रहो-सोते रहोss.. पर छेह के बाद का उजाला आँख में चुभने लगता है..और तब तक इतनी पास उन दोनों के गलों की आवाजें गुटुरगू वाले अंदाज़ में कानों तक पहुचने लगती हैं..

पर बचपन वाली गौरय्या यहाँ नहीं है, कौवों ने अपने को मिश्रा टी स्टाल तक सीमित कर लिया है..हाँ उस दिन सी.आई.ई.में भी दिख पड़े थे..

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