अप्रैल 26, 2012

हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ

उस दुपहरी विनय खंड से टेंपो कर बीसेक मिनट में हज़रतगंज पहुच गया था. घड़ी डेढ़ पौने दो के बीच थी और मेरे पास उस इतवार वक़्त इफरात में था ही. साहू में घोस्ट राईडर लगी थी पर शुरू होने में काफी देर थी. बैठ गया वहीँ सड़क पार एक बेंच पर और शुरू हो गयी इंतज़ार को काटने की तरकीबें.

जहाँ मैं बैठा था पूरे गंज का सबसे भरा पूरा रहने वाला इलाका था क्योंकि  पास सिनेमा हॉल तो था ही, साथ थी खाने वाली चाट की दूकान. थोडा सा नवाबी अंदाज़े बयां करता नवाब'स . मतलब वहां उपभोक्ताओं की लगातार आमद थी. उनमे बच्चों से लेकर उन बुढ़ाती देहों पर एंटी-एजिंग क्रीम मठारे चहरे. दमकती-चमकती खालों के साथ स्कूटी पर आती-जाती लडकियां..उन्हें देखती आँखें, अजीब- गरीब स्टाइल में चलते-फिरते, बालों को ज़ेल से सेट कर फिरते लड़के. कुछ मिश्रित युगल भी आस-पास बैठे अपने भविष्य योजनाओं पर काम कर रहे थे और उनकी अर्जियां ऊपर तक पहुंचाने के एवज़ में अपना हिस्सा मांगते छोटे-नन्हे, बड़ों के कठोर हाथ..

दुर्खाइम यहाँ आ कर चुकते से लगते हैं जब शहर और उसमे भी प्रत्यक्ष बाज़ार जैसी जटिल औद्योगिक व्यवस्था में श्रम का विभाजन हो रहा था तब ये खुद को उन औजारों से क्यों संपन्न नहीं कर सके. शायद इन्होने यहाँ आने में देर कर दी. या इसे ऐसे भी कहा जा सकता है की उनके पास अपने श्रम को बेचने के बाद इतना आधिक्य नहीं बचता के सामजिक गतिशीलता में अपने को संलगन कर सकें और विकल्पहीनता वश पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही तरह के कौशलों का हस्तांतरण भर किया और जब उनकी व्यवस्था अपदस्थ हो गयी तब इनके कौशल और श्रम का किसी ने कोई मूल्य नहीं लगाया. 

साफ़ दिखाई दे रहा है कि खेतिहर समाज की आजीविका के स्रोत एक-एक कर उस नयी आई प्रणाली ने निगल लिए जो नव साम्राज्यवादी पाठों की तरफ जाते हैं जहाँ बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुनाफे बटोरते यमुना एक्सप्रेस वे  तो बने, उन मुनाफाखोर पेट्रोलियम कंपनियों को मुंहमांगे दाम पर बेचने की लौटरी हाथ में दे दी गयी. पर इनका स्थान सिमटता गया. सोचने लगा यहाँ से पहले जहाँ ये लोग रहते थे वहां अब सब क्या काम करते होंगे. उनके काम का मूल्य क्या होगा..क्या उसका इतना अवमूल्यन हो गया होगा कि उन सबको इसकी कीमत वहां से विस्थापित होकर चुकानी पड़ी होगी..और खेती जो कभी भी लाभ का सौदा नहीं रही उसे भी छोड़ कर पूरा कुनबा शहर चला आता है. यहाँ उन कौशलों का कोई मौद्रिक मूल्य नहीं जो उनके श्रम को रातोंरात पूंजी में बदल सकने की क्षमता आ जाये.

जब समाज का विभेदीकरण किया जा रहा था, तब वहां खेलती सबसे छोटी लड़की सबसे पहले भाग कर अपने जिम्मे का काम ले आई और नवाब'स और रॉयल कैफे का इलाका अपने परिवार के सुपुर्द कर दिया..वहीँ पास के बेंच पर संभ्रांत परिवार की दो लडकियां-जो देखने में बहनें लग रही थीं-बैठी पता नहीं क्या बातें कर रहीं थीं. बस मैं उन्हें देखे जा रहा था बारी-बारी. और थोड़ी देर में इतना अंदाज़ भर तो लगा कि उनकी बात का मजमून वहां छोटे-छोटे बच्चों का उन्ही वर्गीय संरचनाओं में खेलना तो बिलकुल नहीं था. उनकी इतनी छोटी सी ज़िन्दगी में खिलौनों की जो भी परिभाषा हो, वे उसे अपदस्थ कर अपने नए सौंदर्यशास्त्र को विकसित कर रहे थे. वहां लगी जंजीरों से ऊपर नीचे होते रहना और उन्ही के बीच से छोटी की चुटिया खींच कर भाग जाना और उस पकड़म पकड़ाई में उससे भी वैसे ही जंजीरों से निकल कर पकड़ने को कहना.

वहीँ पास रिक्शेवाले भी खड़े थे और बराबर उन गाड़ी से बाहर निकलने वाली देहों को सिर्फ दस रुपयें में सहारागंज, कैसर बाग़ के चौक तक ले जाने की पुकार लगा रहे थे. पता नहीं वे इतने आशावादी कैसे हो गए थे और पौने घंटे जब तक मैं उन्हें देखता रहा कोई कतरा सवारी भी उनकी तरफ नहीं बढ़ी. हाँ उस छोटी लड़की को मेरे पीछे बैठे एक जोड़े ने दस को नोट ज़रूर दिया. वो लेकर वह अपनी माँ को देती उससे पहले भाई ने उसके हाथ से ले लिया और ये भी ये भी बताया की उनने इसे ये नोट दी है. बस इतना पता चलना था के माँ भी अपनी दुआओं को वहां समेटती हुई फाट पड़ी.

इस व्यवस्था में आप दूसरे की जेब से पैसे तभी निकलवा सकते हैं जब आपकी उमर ही मासूम नहीं आप मासूम लिंग की भी हों. मतलब इस परिदृश्य में जहाँ कन्या भ्रूण हत्याएं करवाई जा रही हों वहां एक लड़की अगर अपने अस्तित्व के लिए आपसे कुछ मांग रही है तो दिया जा सकता है. पर उसके लिए आपका समाजीकरण अभी प्रारंभिक स्तर पर होना चाहिए जहाँ देह को भी इस व्यवस्था में पूंजी का माध्यम बना बना दिया है, इसका ज्ञान नही होना चाहिए..

[जारी..]

पीछे की ज़रूरी कड़ियाँ:
ये जो शहर है लखनऊशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्याउन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया|

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