अप्रैल 23, 2012

साहिब बीबी और गैंगस्टर' का उत्तर पाठ

हम अभी ठीक ढंग से साँची से भोपाल आ भी नहीं पाए थे के अल्पना पर फ़ोर्स दिख पड़ी पर उतरे भारत टाकिज पर साहिब बीबी गैंगस्टर के लिए. अक्टूबर पांच से लगातार ये पोस्ट टलती जा रही थी. पर आज नहीं. डैशबोर्ड से निकाल फिर लिख रहा हूँ..तो शुरू करें..

लगता है हम लोग अतीत की छविओं को पुनर्परिभाषित करने के काल में जी रहे हैं. बार-बार उन्हीं बिम्बों-प्रतीकों में आवाजाही करते रहते हैं. किन्ही कोनो कतरों में अपने वज़ूद को तलाशनें की जद्दोजेहद. तिग्मांशु की साहिब बीबी और गैंगस्टर इसी तरह की कोशिश है.

फिल्म के सारे चिन्ह सारे औज़ार उसी सामंती सभ्यता की छटपटाहट अपने वर्चस्व को वापस पाने की है. पर करें क्या उसका रास्ता पूंजी से ही होकर जाता है. एक प्रौढ़ राजमाता हैं जिनसे साहेब को बार-बार रुपयों के लिए हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता. और साहेब की औकात ढाई सौ के एक कारतूस से नाम रोशन करने की ही रह गई है. सिर्फ रुतबा बचा रह गया. रुतबा ही उस दमनकारी चक्र का अधिशेष था. रुतबे के साथ घर से बाहर एक स्त्री भी थी, जिसके जिम्मे दैहिक कार्य व्यापार थे. बीवी मीना कुमारी की तरह सिंदूर नहीं मंगाती. यह सिर्फ सिंदूर मंगाने न मंगाने जैसी छोटी दिखने वाली बात नहीं है. इसके पीछे उस संस्था के चुक जाना भी जहाँ इसे ढोते रहना सिर्फ स्त्री के हिस्से ही आया था.

वहां बदतमीज़ी भी तमीज़ से की जाती है. गैंगस्टर गुलाम का नया वर्ज़न है. वह बीवी की पर्देदारी को एक-एक कर छीजता है और साहेब हो जाना चाहता है. छवियाँ बराबर आ जा रहीं थी. मकबूल के इरफ़ान खान से लेकर इश्किया की विद्या बालन और उससे भी पहले मृत्युदंड की नायिका. इस प्रकाश झा वाले संस्करण को थोड़ी देर के लिए किनारे रख दिया जाए तो इन दोनों नायिकाएं भी वही करती हैं. सबसे पहले अपनी देह से मुक्त होती हैं.

ये भी देखने लायक है कि बीबी की सेविका गूंगी है, इसे स्वामिनी भक्ति का रूपक मान लिया जाए तो एक टेक्स्ट यह भी कहता है के यहाँ एक स्त्री दूसरी स्त्री को पुरुष हो जाने के मौका देती है मतलब यही के जो काम कन्हैया साहेब के लिए करता है और उनका राज़दार बन हमेशा साथ रहता है. पर एक दूसरा टेक्स्ट यह भी है कि गुलाम हमेशा इतने दबावों में जीते हैं की उसकी स्थिति कभी बोलने लायक हो ही नहीं पाती. 

फ़िल्म ख़तम होती है माही गिल के स्थापित होने के साथ. और चेहरा है लकवाग्रस्त मुखौटे साहेब, जिम्मी शेरगिल का. मतलब ये भी के भूमिकाओं की अदला-बदली हो जाती है. सरकारराज टाइप छत से नीचे झांकते चेहरे. और नीचे हैं असुरक्षित जन. भले जातीय रूप से वे वहां इक्कठे हुए हों. उस सामंती ढाँचे को जहाँ ढाई सौ के कारतूस के बूते नाम रौशन करने की औकात नहीं थी, वहां उनकी घुसपैठ चुनावी प्रक्रिया से होती है और उस ढहते ढांचे को वैधानिक संबल मिलता है. 

अबरार अल्वी की फिल्म उन सामंती ढांचों के पतन की कहानी है. पर आगे की कहानी इधर के हिस्से में है जहाँ स्वतंत्रता के बाद राजनीति उन सभी राजघरानों, बड़े-बड़े भू-स्वामी जमींदारों को आज तक जिन्दा रखे हुए है जिनको विकास क्रम में उन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में समां जाना चाहिए था. मतलब यह कि राज्य की व्याप्ति ने उन सामंती संरचनाओं एक ऐसा पर्दा दिया जहाँ उनका हुकुम और वजनी हो गया और उस 'जन' की राज्य तक पहुँच का रास्ता इन महलों से जाने लगा.ये वही तंत्र है जहाँ साहेब से लेकर उसके प्रतिद्वंदी सब नेता जी के दरबार में हाजरी लगा टेंडर खुलवाने से लेकर रास्ते से हटाने तक के षड्यंत्र खेले जाते हैं. कुछ-कुछ सुलतान मिर्ज़ा के ढ़र्रे पर, यहाँ साहेब मरते-मरते बचा सिर्फ चलती फिरती लाश.

लेकिन यहीं एक और बात ध्यान देने वाली है के स्त्री की स्वीकार्यता उसी पुरुषसत्तात्मक ढांचे के अंतर्गत है जो वेलकम टू सज्जनपुर में भाभी सा को वोट पूर्व परधान की ठसक के बूते डरा धमका अपनी तरफ खींचने की कवायद में लग जाते हैं. पर जो एक बात बार-बार खटकने लगती है के इस फिल्म में 'स्त्री' की भूमिका में 'बीबी' का किरदार ऐसे ही होने के पीछे का कारण कहीं न कहीं तिग्मांशु का पुरुष होना भी तो है. वहां उनकी व्याख्या में स्त्री देह का वस्तुकरण कर उसका प्रयोजनवादी अध्याय ही लिखा है. साहेब नाम का सफ़ेद पत्थर गैंगस्टर नाम का काला पत्थर.

वे मधुर भंडारकर फैशन और पेज थ्री की नायिकों की तरह क्यों नहीं हो पायीं जहाँ प्रियंका और कोंकणा अपने नायकों को छोड़ देती हैं जैसे ही उनके समलैंगिक संबंधों के बारे में उन्हें पता चलता है..जोया अख्तर की लक बाय चांस, अयान मुखर्जी की वेकअप सिड की स्त्री क्यों नहीं बन पायीं. इसे सिर्फ और सिर्फ कथ्य के आधार पर जस्टिफाई माना जा सकता है. अर्थात वहीँ नायिकाएं अपनी देह का प्रयोग करती हैं जहाँ उनका अभीष्ट उस सामंती सत्ता को पाना है. चाहे वो मकबूल की निम्मी हो या इश्किया की कृष्णा वर्मा. अंकुर की लक्ष्मी. वे सब उन पुरुषों की संरचनाओं का उपयोग अपने सामजिक लिंग की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए करती हैं.

अगर इसे ऐसे कहें के अंकुर की लक्ष्मी और सूरज का सातवाँ घोड़ा की वह स्त्री जो तांगे-घोड़े की नाल-नदी के इर्द गिर्द कठोर व्रत धारण करती है, इनमें समानता है के दोनों ही उस समाज में किसी के द्वारा बाँझ नहीं कहलाना चाहती और दोनों ही स्त्रियों के परपुरुष संसर्ग को मिथकीय नियोग मान दर्शक नैतिक बोझ से मुक्त हो सकता है. समाज उस जैविक अवधारणा से नियंत्रित होता है, जहाँ पुरुष बीज है तो स्त्री उसके लिए भूमि उपलब्ध कराती है, उसकी पोषक है. पर यहाँ तांगेवाला नहीं है जीप है और न ही 'बीवी' को गर्भधारण करना है. वैसे भी अब महानगरों में वीर्यकोष-आईवीएफ़ क्लीनिक-सरोगेट मदर आसानी से मिल भी जाती हों वहां 'गुलाम' दैहिक संस्करणों में ही आयेंगे और फिर सत्ता का स्त्री-मूलक पाठ शुरू होगा..

बात ख़तम करते-करते जो बात बार-बार रह जा रही थी कि ललित/ ब ब लू उर्फ़ गुलाम अपनी गर्लफ्रेंड के लिए अंग्रेजी सीखता है गिटार जितना भी सीख पाया कोशिश की. गला खंखार गाना भी गाता है. वह उस जगत में प्रवेश कर खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना चाहता है जिसमे उसकी प्रियसी रहती है. उस बाधक पहरेदार उसके पुरुष मित्र की भी हत्या कर देता है.

और फिल्म के आखिरी सीन में उसका स्थानापन्न दूसरा 'गुलाम' दिखाई देता है. अब पुरुष की देह पर स्त्री का अधिकार..पर यह जितना एक रेखीय जान पड़ रहा है अभी भी उतना ही समस्याग्रस्त है क्योंकि उन समलैंगिक संबंधों से वे पुरुष भी वही करने की कोशिश में थे जैसा ये स्त्रियाँ इन छवियों में अपनी देह से सिद्ध कर रहीं थीं..

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