मई 02, 2012

आमिर खान की सुबह और हमारी नींद

जैसे टाटा की कड़क चाय जगाती थी अब आमिर खान हर इतवार नींद से उठाने आ रहे हैं. आँख भले खुल जाये पर दिमाग के दरीचों में जो दीमक लगें हैं उसके प्रति कुछ जिम्मेदारी भरा काम अब इनके कन्धों पर है. है क्या इन्होने खुद ही ले लिया. धोबी घाट वाली माथे की शिकन दुबारा उनकी भौहों के ऊपर मौजूद है. प्रसारित होते विज्ञापन कुछ ऐसा माहौल बना रहे है जैसे के अब कुछ ऐसा हो जाने वाला है जो अब तक नहीं हुआ था. गांधी ने तब भारत को जानना चाह था, ये अलग तरीके से कैमरे-पटकथा-संवादों की मौजूदगी में सदी के खोये-सोये भारत की खोज करने जा रहे हैं.

याद न हो तो लोकपाल बिल के अन्ना से पहले सरदार सरोवर बाँध की मेधा पाटकर के साथ इनको पीछे देखा जा सकता है. सरोकार से कोई आज का नाता नहीं है. फ़ना के ज़माने से है. वे देशवासियों से विदेशी मुद्रा साथ लाते पर्यटक अतिथियों को देवतुल्य मानने का आग्रह भी करते रहे हैं. असल में आमिर खुद को अभिनेता ही नहीं समझते अपनी छवि की सार्वजानिक उपस्थिति में वे उतना ही आम हो जाना चाहते हैं जितनी भारतीय सड़कों पर मौजूद मारुती की गाड़ियाँ और पहियों के नीचे उड़ती धूल.

इस कार्यक्रम के प्रायोजन अधिकार सोलह से बीस करोड़ के बीच में बिकें हैं. वहीँ स्टार ने अपने विज्ञापन दाताओं को आश्वस्त भी किया है के उनके प्रतिस्पर्धी ब्रांड को कोई स्लॉट नहीं दिया जायेगा. आमिर ने स्वयं कई कंपनियों के विपणन व्यवस्थापकों से आग्रह किया है कि वे इस कार्यक्रम के बीच समय न खरीदें ताकि इसका प्रभाव कम न हो जाए. इस प्रभाव के लिए निर्माताओं ने सवा छह करोड़ में कुल सत्ताईस घंटों के दो हज़ार स्लॉट्स बुक किये हैं. यह अब तक किसी टेलीविजन कार्यक्रम के लिए किया गया सर्वाधिक व्यय वाला प्रमोशनल कैम्पेन है, जिसमें भारत भर के तीन सौ सिनेमा घरों में राष्ट्रगान के बाद इसके प्रसारित प्रोमो भी शामिल हैं.

इस सारी हेरफेर का लब्बोलुआब यही है के छह मई से प्रसारित वाला सत्मेव जयते इस अभिनेता की सार्वजनिक चरित्र में उस अधिनायकवादी बाज़ार के लिए ब्रांडिंग का हिस्सा भर होगी जहाँ उसकी इस छोटे परदे की सर्वप्रियता को बहुराष्ट्रीय कम्पनियां विज्ञापन में इस किरदार को लेकर मुनाफा काटेंगी. मतलब सरोकार- जन के साथ- संवेदनशीलता सिर्फ परदे पर लगान के क्रिकेट मैच में छक्के लगाने तक ही है. उस उत्पीड़न के कुचक्र में संसाधनों पर कब्जों-विस्थापन- अघोषित युद्ध जैसी स्थितियों से इन्हें क्या लेना देना. वर्ना कुओं से ठंडा मतलब कोकाकोला निकालते विज्ञापन के ज़माने से नहीं पता था कि जहाँ-जहाँ इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उपक्रम स्थापित हैं वहाँ-वहाँ भूमिगत जल का स्तर इतना भी नहीं रहा के कुएं जीवित रह सकें. जब सुनीता नारायण इन पेय पदार्थों में कीटनाशक होने और सुरक्षा मानकों को लेकर जब अपनी बात कह रहीं थी तब इनके कान में क्या समस्या थीं. बस चुपके से उन विज्ञापनों में अपने भांजे को स्थापित कर दिया.

इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्र नामक अस्मिता संकुल से एकत्र सांस्कृतिक-सामजिक पूंजी का प्रयोग उन उन्मादी राष्ट्रवादी सत्ताओं के पक्ष में नहीं होगा, जो उस लोकप्रियता का रूपांतरण कर इस पात्र को अपने हित के लिए प्रयुक्त करेंगी. सीधे सरल शब्दों में यह कोई पुरानी बात नहीं है कि उसी ग्यारह बजे इतवारी सुबहों को दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धार्मिक मिथकीय कार्यक्रमों के दैवीय चरित्रों को पार्टी विशेष ने अपनी टिकट पर संसद पहुँचाया. इधर सचिन रेखा के साथ कॉंग्रेस के मनोनीत सदस्य बन राज्य सभा की तय्यारी में हैं, जिनके सौ अंतर्राष्ट्रीय शतकों पर एंटीलिया के अम्बानी ने एक शानदार सामंती किस्म का आयोजन किया था जिसमे लता जी सचिन से बाल ठाकरे के यहाँ हुई अपनी पहली मुलाक़ात का ज़िक्र करती हैं और आग्रह पर गीत भी गाती हैं. मतलब यह मराठी माणूस से लेकर पूंजीपति के राजनीतिक हितो की टकराहट का समय नहीं उनके समायोजन का दुरभिसंधि काल है, जिसमे मिस्टर परफेक्शनिस्ट की पारी की शुरुआत होने जा रही है.

{यह पोस्ट आज 'जनसत्ता ' में 'अगली पारी '  शीर्षक के साथ आई है वहां पढने के लिए यहाँ चटकाएं.}

1 टिप्पणी:

  1. गलती से 'सुनीता नारायण' की जगह 'तीस्ता सीतलवाड़' का नाम चला गया था. त्रुटी आज जनसत्ता में आई अपनी पोस्ट में पता चली. भूल सुधार कर ली गयी है.

    उत्तर देंहटाएं

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...