मई 05, 2012

प्रेमकथा में असहजता का आलोचनात्मक अध्ययन

अभी लगा एक कमज़ोर दिन चुना. उसकी एक मुकम्मल हाँ-न सुनने के लिए मौके भी नही दिए. पता नही क्यों लग रहा है बस चीजों को बनाने के बजाये उनके अस्तिपंजर को तोड़ मरोड़ जटिल बना लेना खटक रहा है, जहाँ से निकल भी नहीं पाता. एक लड़की है जिसके मन में कुछ होगा भी तो उसे प्रकट करने के सारे रास्ते इतने संकरे कर दिए कि उस डूबते सूरज पर पुलिया पर आ ही न सके-न पाए. आज भी उस आखिरी शाम वहां कैंटीन की तरफ खड़े होकर बराबर गेट की तरफ देखना समझ नहीं पाया हूँ. न यह समझ पाया के उस रात तुमसे न बात कर उससे क्यों की. फिर जब उस मई अचानक हो गयी बरसात में गोल मार्केट के बस स्टैंड पर रुक गया था तो फोन क्यों किया. बात हुई पर वो नहीं जो चाह रहा था.. तुम बाहर थी कहीं किसी कार्यक्रम में.

शायद जितनी तेज़ी से उस तरफ बढ़ना था उतनी ही धीमी रफ्तार में खुद को घसिटना चुना. अब अगर वह अपने को विशुद्ध भारतीय सिनेमा वाली प्रियसी मानती है, जिसे मनाने के लिए तरह-तरह से कोशिश करूँगा, घुटने के बल मुंह-दांत के बीच गुलाब जैसे किसी फूल के साथ उसकी हाँ सुनने के लिए बेताब हो उठूँगा, तो ऐसा सपने में भले हो जाए असलियत में प़ता नहीं होता भी है कि नहीं..पता नहीं..अपने को उस प्र-स्थिति में स्थित ही नहीं कर पाता. या यह मेरी ज़िद, के अब कुछ नही. उसने अपनी तरफ से क्योंकर कुछ नही किया. तो मुझे समझना होगा यहाँ की लडकियां अपने दिल में कुछ भी रखें, सामने लाती नही हैं. उनकी तहों में इंतज़ार की मोटी परत भी होती है. अब इससे जयादा वो क्या पूछे के इन परीक्षाओं के बाद आगे क्या करोगे??

फिर एक ऐसे बिंदु पर भी आता हूँ जहाँ सारा लिखा बेकार बे-बुनियाद लगने लगता है. क्योंकि. सिर्फ मुझे लगता है, इसलिए, उसे मान लिया जाए? यह कहानी ठीक-ठीक लड़के-लड़की की भी हो सकती थी. इस तरह लड़खड़ाती नही. जिसमे लगातार कोशिशें होती रहनी चाहिए थीं. उन ऊलजलूल समाजशास्त्रीय मनोविश्लेषणात्मक जटिलताओं के लिए अवकाश के बजाये अपने को संजीदा बना सामने रखना था. सिर्फ एक बार बोल देने और उधर से जवाबनुमा कुछ आने की दरमियानी में उन दिल की धडकनों के बीच नरम कोनों में अपनी जगह बनानी थी. उसमे इतने नुक्ते-लेकिन-किन्तु-परन्तु जैसी क्लिष्टताओं को शुरू से गायब कर आगे बढ़ना था. पर यहाँ तो पहला कदम रक्खा नही गया, वह आलोचनात्मक प्रेमकथा में अपनी भूमिका का स्पष्टीकरण जैसा कारण बताओ नोटिस बन गया. आज भी है.

उस तरफ से कोई बात आये इसके लिए किया ही कुछ नही, तो अब कोई परिस्तान से जादू तिलिस्म तो बन नही जाने वाला है. जहाँ दमाग में खयाल आया और अगले ही पल उसके साथ कई पहर अकेले मिल जाएं. जहाँ सिर्फ हम दोनों हों. अगर तुम सोचते हो जिसके साथ ज़िन्दगी की कई बरसातें भीगते हुए गुजारनी हैं उससे सीधे बोल भी नहीं सकते. फिर वह चाह कर भी कैसे अपना दिल खोल कर रख दे. के अपने मुताबिक़ जो सबसे मुफीद जवाब हो उसे उठा जेब में रुमाल के साथ रख चलते बनो. के कल फिर मिलेंगे.

इधर इस तरह मर्सिया पढ़ने की कोशिशें और भी तेज़ हो सकती हैं जैसे-जैसे मैं अपने दिल के दरवाजों पर उन सबको पाऊं. जिनमे तुम सबसे पास खड़ी हो. बैठ भी गयी हो तो नज़र नहीं आई अभी तक. बस यही मलाल जैसी कोई मासूम तस्वीर और उस हाथ की छुअन के छोटे स्पंदन रहेंगे जो बार-बार पास लायेंगे. और हर बार भाग लेना चाहूँगा. क्योंकि उस सपाटबयानी का कभी मौका बनाया ही नहीं जहाँ पूछ सकूँ और इत्मीनान की घड़ियाँ रुक सी जाएँ. यह किसी कमज़ोर से देवदास की रूपक कथा नहीं है. अगर इतने एकान्तिक क्षण बातें मुलाकातें होती तो उसकी तरह मरने से अच्छा होता उस चंद्रमुखी-पारो टाईप किसी के साथ ज़िन्दगी का बुढ़ापा बिताना.

पर समझ नहीं आ रहा अपने को कहाँ रखूं. कोई कोशिश नहीं हो पायी. बस एक काम किया. पन्ने रंगे. जितनी देर ये सब किया उतनी दरमियानी उसके साथ बना पाता तो कहानी शायद कुछ और होती. इस फ़रवरी से पहले तक उसे किसी बंद गली के कमरे में कुण्डी लगा बिठा चुका था. पता नहीं कैसे किवाड़ खुल गया और अब तुम द्वारे ठाड़ हो. सबसे बड़ी दिक्कत यही हुई के तुम्हारे हिस्से का दिल दिमाग खुद लगा और उन सारे संभावित जवाबों को खोज लाया जो तब मुझे चाहिए थे. सीधी बात न करो तो कम से कम ऐसी उल ज़लूल खुराफातें भी नहीं करनी चाहियें. पर नहीं हमीं ने तो ठेका ले रखा है इन सारे कामों का.

अभी भी तुमसे बात नहीं की है. बस रह-रह उन स्थितियों को टाल रहा हूँ जिनके सामने आने से पहले ही भाग लेना चाहता हूँ. उतनी टेढ़ी-मेढ़ी मेढ़ पर कोई रास्ता खडंजा इतना सपाट नहीं होगा जिस पर चल सकूँ. उस जगह जहाँ तुम पायी जाती हो वहां बस यही हवा में है की देव पारो के इंतज़ार में है. ये वाली बात नहीं के दूर देस में लड़की वालों की तरफ से कथित अ-कथित दबाव भी लगातार आ जा रहे हैं. शायद जब पता चले तो जिस अनकहे धागे से हम अभी तक जुड़ें हैं वह भी टूट जाये. या प्रकारांतर से दूसरी तरह की घटाटोपिक परि-घटनाओं का गुंजलक सामने आये जो इधर की जटिल भाषिक संरचना जैसी ही हों. पर इसकी संभावना रिक्टर स्केल पर सबसे कम प्रभाव वाले भूकंप की तरह ही चाहता हूँ.

और यह आखिरी बात बता दूँ कि अभी भी इन सब में तुम्हारे वाले हिस्से या तो गायब हैं या कपोल कल्पना से बना गढ़ लिए गए हैं. अपने पास कच्ची  मिटटी का गड्ढा है, अपन उसी में बैठे रहते हैं. तो मतलब यह वैधानिक चेतावनी की तरह लिख मारूं कि यह कथा उस एकल चरित्र की मानसिक बुनावट का प्रतिफलन है जहाँ दूसरा पक्ष कभी अपनी भौतिक उपस्थिति में नहीं रहा और इसके साथ बनती बिगड़ती सारी अवस्थाओं घटनाओं का किसी मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नही है. और चेतावनी जैसा हिस्सा उसमे यह है कि भइये अगर कोई लड़की पसंद हो तो सीधे उमेश की दूकान से गुलाब का फूल खरीदो और फ़रवरी चौदह के इंतज़ार में पतराने से अच्छा है किसी रूमानी सुबह शाम चुन उसे इत्मिनान से सब कह डालो. कुछ भी दिल की किसी कोठरी में बंद नही. काबिल बनो अपनी कहने के, उसकी सुनने के. नही तो बकौल बाबा आलोक उम्र में छेह-सात साल छोटी बीवी के चार-छह बच्चे ललमुनिया मक्खी की तरह इर्दगिर्द भिनभिनायेंगे.

2 टिप्‍पणियां:

  1. Aisa hi mere sath bhi Hua , is article ko likhne ke liye thanks

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    1. पता नहीं इसपर क्या कहना चाहिए। कहना भी चाहिए या नहीं। पता नहीं। पर यह इसलिए नहीं लिखा था के कभी कोई इन बातों से इत्तेफ़ाक रखता हुआ कोई शक्स मिलेगा। ज़रूर स्थितियाँ यह हो सकती हैं पर उनके घटित होने के क्रमिक विकास को इस तरह नहीं कह सकते।

      प्यार स्थिति है या भाव? या या कहीं किसी मुकाम तक पहुँचना है? यह आकर्षण कब तक बना रहेगा, कह नहीं सकते। इसे कशिश भी कह सकते हैं। या उस कथित प्रेमिका का पत्नी के रूप में जीवनसाथी बन जाना अभीष्ट है? या मेरे कई दोस्त प्रेमिकाओं के पत्नी बन जाने को प्यार की सबसे बड़ी असफलता मानते हैं। इनमें से किसे तुम चुनोगे? शायद तुम्हें भी न मालूम हो।

      पर तुमसे यह सब क्यों कह रहा हूँ? पता नहीं। बस ऐसे ही कभी-कभी दिमाग खिसक जाता है। तुम इसे अन्यथा न लोगे। ले भी लोगे तो कौन सा कुछ खास परिवर्तन होने वाला है॥ जैसा सोचते हो वैसा ही सोचते रहोगे..

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