मई 09, 2012

उसका नाम भी था. ललमुनिया.

सुबह का सहज पाठ. कोई नहीं सोचता कि मच्छर को भी गर्मी लगती है तभी मौसम गरम होने के साथ ही उसकी क्रियाएं आत्मघाती हो हमें काटने लगती हैं. वरना ठण्ड में तो बेचारा अपनी चोंच चुभाते भी नही हैं. किसी कोने में पड़े रहते हैं. दुबके. पर इन बड़ी बड़ी कंपनियों ने उसकी तरह तरह से हत्या करने के उपाय सुझाए हैं. ऑल आउट लगा लो कछुए का धुंआ फेफड़ों के लिए अच्छा नहीं. ओडोमॉस से तो आसपास फटकने भी नहीं पाते. मच्छर भी इंसान भी.

चांदनी चौक भागीरथ प्लेस बिजली मार्केट में लॉन टेनिस के रैकेट की तर्ज़ पर बिजली से रिचार्ज ही जाने वाला यंत्र मिलता है. हमने यहाँ से नहीं ख़रीदा. उस दिन सैक्टर सत्रह चंडीगढ़ भूमिगत पैदल पार पथ माने कि सबवे में छोटी सी दूकान से लेते आये थे. बटन दबाओ और उसकी ज़द में आया कोई भी नहीं बचेगा.

इसे उन बड़ी कंपनियों ने हाथ भी नहीं लगाया है अब तक. वर्गीय उपभोक्ता ढूंढ़ रहे होंगे. या शायद हथेली के बीचों बीच धराशायी होते मच्छरों को मारने में ऐसा हत्याबोध अन्दर तक नहीं भरता जैसा कि आँखों के सामने इसकी चपेट में आया वो बेचारा हवा में ही चटचटा कर मुर्गा छाप पटाखे की तरह धुंआ बन जाता है. भले उन चमचमाते शीशे लगे दरवाज़े वाले होटल रेस्तेरां नीली बत्ती मशीन किसी कोने में रखी रहती है और मक्खियाँ सम्मोहित हो उसके पास जाते ही वीरगति को प्राप्त होती हैंपर उस मृत्यु में हमारा अवलोकन स्थल इतना पास कभी नहीं होता. कभी तहलका में इसी मक्खीय भाव पर कोई कहानी पढ़ी थी. उसका नाम भी था. ललमुनिया.

मच्छरदानियों के अहिंसात्मक मार्ग से निकल हम इस तरफ भी चल पड़े. आज का सच यही है के उन औद्योगिक नगरों के बगल से बहते नालों गंधाती-उबलती नालियों ने हमें मक्खी मच्छर ही दिये हैं. रोटी तो मिली नहीं. जो भी दिहाड़ी पगार मिली, उसका बंधा बंधाया नुक्कड़ वाले झोला छाप डॉक्टर को जाता रहा और जिनकी जेब में जेब से बड़े नोटों की गड्डियाँ थीं उन्होंने या तो खिड़कियाँ अँधेरा होते बंद कर लीं, ऑल आउट रेपेल्लेंट का पवार स्लाइडर लगाया और चैन से सो गए या फिर उस खेलगाँव में बोली लगा सबसे ऊपर की मंजिल ले लेना चाहते हैं जहाँ से यमुना की बदबू उनकी नाकों तक न पहुँच सके, जिसमे उनकी फैक्ट्री का नाला खुलता है..एक अर्थ में उन अमानवीय परिस्थितियों में रहने की विवशता से लेकर दवाइयों की बड़ी दुकानों का खेल इन गाद वाली नालियों के इर्दगिर्द ही खेला जाता है, जहाँ पूंजी अपना चक्र पूरा कर वापस उन इज़ारेदार लोगों तक पहुँच जाती है.

खैर, आजकल मौसम थोड़ा ठीक है. मच्छर अपने घरों में परिवार के साथ कुशल मंगल से होंगे. चैन की नींद ली होगी. अपनी चोंच पैनी कर रहे होंगे. शायद इनके यहाँ भी हमारी तरह कोई डायलॉग प्रसिद्ध होगा, 'दो आँख के मैं तेरा खून पी जाऊंगा..!!' ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि कान के पास सुई चुभोते अपनी ज़िन्दगी पंखों पर लिए डोलते वक़्त भी ये सब कई-कई राग भिनभिनाते रहते है. इनके यहाँ भी इधर 'मच्छर आइडल' के विज्ञापन दिखाए जा रहे होंगे. बस अगली बार इत्ता ध्यान रक्खें के उसे दोनों हथेलियों के बीच चपटा करने से पहले पूछ लें के कहीं अपने परिवार में खून चूसने वाला वो अकेला तो नहीं..!!

{कहानी 'ललमुनिया' को गूगल पर सर्च करने पर अभी टकरा गयी ..कहानी है उमाशंकर चौधरी की ललमुनिया मक्खी की छोटी सी कहानी. लिंक तहलका का है.}

2 टिप्‍पणियां:

  1. गज्ज़ब धुलाई|| अब लिंक पर जाते हैं|

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  2. कहानी का लिंक अब नहीं है। नॉट एगसिस्ट। तहलका की वैबसाइट से गायब। अगर उमाशंकर बता पावें तो अग्रिम साधुवाद..

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