मई 13, 2012

मछलियाँ छटपटाहट ज़िन्दगी और आंसू

गाड़ी चले जा रही है. सड़क पर. आगे दो लोग बैठे हैं. एक चला रहा है. सामने देख रहा है. दूसरा कभी बाएं खिड़की के बाहर देखता कभी पीछे रक्खे गमलों की खटर-पटर सुन रहा है. छत पर लड़कों की पलटन है और उनका अपना ही शोर उस गाड़ी के साथ दौड़ रहा था. तभी अचानक ब्रेक लगता है और पहिये रुक जाते हैं. गाड़ी पंचर नहीं हुई है, पर आगे की सड़क ऐसी नहीं है के उसपर चला जा सके. कम से कम उसको तो कभी नहीं रपटाया जा सकता जिस पर गमले लदें हों और उनके टूट जाने का डर भी हो.

यहीं से देखना शुरू किया था और थोड़ी देर में लगा जैसे उस आदमी से पहले मिल चुका हूँ. जो गाड़ी नहीं चला रहा था. थोड़ा रुका ध्यान से उसके चहरे को देखा तो याद आया, अरे..यही तो है वो, जो अपनी मोटर सायकिल पर लोगों को छोड़ता था..!! फिल्म भी वही थी. बस थोड़ी आगे जान पड़ रही थी.

तो पीछे उस गाड़ी में पटरों पर गमले रखे थे. तिमंजिला इमारत की तरह. बिलकुल वैसे ही जैसे कभी अपने यहाँ गैस सिलेंडरों को ढ़ोते टेम्पो नज़र आ जाते हैं. गाडी रुकते ही बिजली के करंट की तरह बच्चों का खून दौड़ने लगा. काम आपस में बँट गया था. एक उन तख्तों के बीच छूटी रह गयी जगह में घुस कर अन्दर के जाकर गमले निकाल रहा था. दो-तीन ऊपर से नीचे उतार रहे थे और बाकी लड़के भाग-भाग कर छोटे-छोटे गमलों को पंहुचा कर वापस आ रहे थे. गमले पास ही किसी नर्सरी के ही थे. उनके काम में एक अजीब किसम की तेज़ी थी. जल्दी से ज़ल्दी उस गाड़ी को खाली कर देने की बेचैनी जैसे. अभी इसे ही समझ पाता कि किसी लड़के के कान में पानी बहने की आवाज़ सुनाई दी. उन्होंने देखा जिस ड्रम के पानी में मछलियां थी, उसमे एक छोटा सा छेद हो गया है.

पर इसे निकाले कैसे. वो तो सबसे नीचे, उन कतारों के पीछे रखा हुआ है. पहले सारे गमले निकलेंगे फिर ये ड्रम. पानी ख़तम होने से पहले उसका निकाला जाना ज़रूरी था. पर वहां तक पहुँचने के रस्ते में गमले पड़े हैं और वो तिमंजिला इमारत. बस अब तो उन मछलियों को निकाल कर ही रहेंगे. वही पौधों के गमले जिन्हें तरतीब से उतार रख रहे थे अब उनकी नज़र में वह सब रुकावट थे. वही लकड़ी का पुल जिसके पार जिंदगी दौड़ कर पहुच गयी थी और इन्हें भी वही पहुँचने की ज़ल्दी थी. दन्न से लड़के ऊपर चढ़े और दमादम गमले नीचे फेंकने लगे.

इसी में उसकी बैसाखी भी थी जो अभी भी गाड़ी में बैठा इंतज़ार कर रहा था. एक अर्थ में यहाँ सामान उतार उन्हें आगे भी जाना है इसका संकेत. पर अचानक आ गए इस ज़लजले में उसे गाड़ी का दरवाजा खोल बाहर आने का मौका भी नहीं मिला. वो चिल्लाता भी है निकलने की कोशिश भी करता है. सब बेकार. ड्रम इतना भारी है कि छह लडको की पकड़ उसे नीचे उतारती है. नीचे आते ही छेहों भागते है. पर पता नहीं कैसे उनके हाथों से फिसल जाता है और अब ड्रम कि सारी मछलियां पानी के साथ ज़मीन पर हैं. छटपटा रही हैं. दृश्य धीमा हो जाता है. गति रुक जाती है. उन क्षणों में जीवन के लिए उनका संघर्ष निरर्थक लगता है. वहां साँसों के धडकती आवाजें थी आँखें उस सपने को छटपटाता देख रही हैं. उछलती फुदकती बस जी लेना चाहती हैं. ऐसे ही धीरे धीरे जिंदगी ख़तम होती रहती हमारे सामने.

सीन तब तक स्लो मोशन में रहता है जब, उन मरती मछलियों में से एक, उस पास बहती नहर की नाली में, अपनी जिंदगी को ढूंढ़ उसमे शब्दशः छलांग लगा देती है. उसे पता है ज़िन्दगी कहाँ उसका इंतज़ार कर रही है. उस घुटन, कम होती साँसों का डर, जीने की ललक फिर पानी की तरफ ले जाती है. एक बार फिर हरकत होती है. पर हरारत महसूस की उन बच्चों ने. तेज़ी से सब भागते हैं और उस बह गयी मछली को पकड़ लेना चाहते हैं. ये आते-जाते भाव उस छोटी सी दरम्यानी में कई बार ऊपर नीचे होते हैरान परेशान हैं. कुछ समझ नहीं आता ये क्या है.

किसी के चहरे पर कोई जवाब नहीं है बस आँखे अन्दर तक धंस सवाल पूछ रही हैं. उन सबने मिलकर फैसला ज़िन्दगी की तरफ किया. भारी दिलों में छटपटाती धडकनों के बीच जो आवाज थी उसे सबने सुना. आँखों में आंसू थे और हाथ सारी मछलियों को ज़मीन पर सरका उस नहर में डाल रहे थे. बस अब उनमे से एक के  हाथ में एक थैली है और उसमे एक बचा ली गयी मछली भी है. गाड़ी अब भी भागी जा रही है पर सब शांत हैं. उन सब पर सोच रही हैं जो अभी बिता और उन सबमें वह आदमी भी है जिसकी टांग टूटी हुई है.. 

[ पीछे का थोडा हिस्सा यहाँ है..]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...