मई 26, 2012

तारें जिनमे आग नहीं लगती

अभी कल शाम जब गोल मार्केट एक चिट्ठी स्पीड पोस्ट करने गया तो देखा वहां बत्ती नहीं थी. बत्ती गाँव की ढबरियों में होती थी, यहाँ उसे बिजली कहते हैं. और शहर की नगरीय गतिकी में बिजली पानी से बने या नाभिकीय उर्जा से यहाँ के उपभोक्ता तंत्र को बिजली चाहिए. उन सारे भौतिकतावादी उपकरणों का आधार और ज़रूरत बना दी गयी प्रणाली की प्राणवायु. वहां वजन करने वाली मशीन भी तभी काम करेगी जब लाइट होगी. जो पर्ची लिफाफे पर लगानी थी उसे भी पहले कंप्यूटर मशीन की ज़रूरत थी. फिर बारकोड भरने पढ़ने के लिए दूसरे की.

पूरी प्रक्रिया इतनी यांत्रिक है जिसमे मनुष्य ने अपनी भूमिकाएँ तकनीक के सुपुर्द कर अपना अवमूल्यन कर लिया है. कईयों को यह प्रगति का सूचक लगता होगा और किन्ही के लिए हमारे लगातार अमानवीय होते चले जाने को एहसास से भर देता होगा. हमारी निर्भरता ऐसे तंत्र पर है जिसकी उत्पादन प्रणाली उन साम्राज्यवादी राष्ट्रों को अपने नव उपनिवेश बनाने में मददगार होगी.

तेल को लेकर उन देशों की बेचैनी ऊपर से लोकतंत्र स्थापित करने का मुलम्मा चढ़ा मुखौटा. किसी से छिपा नहीं है उन सारे विद्रोहों को दिए जाने वाली मौद्रिक सहायता से लेकर हथियार मुहैया करने तक की जो प्रक्रिया है वह अफगानिस्तान में नेतृत्व की ऐवजी व्यवस्थाओं की तरफ जाती हैं. जहाँ 'नाटो' अभी मौजूद है फिर भी इतने बड़े हमले होते हैं वहां उन राष्ट्रों के न रहने पर स्थितियां और बदतर होती जाएँगी. तब किसी रूस को वहां घुसपैठ कर अपना आधार बनाने के मौके मिलेंगे. हम तक ईरान से आज तक गैस पाइप लाइन नहीं पहुँच पाई है जबकि उसके बाद हुए परमाणु समझौते के तहत उन संयंत्रों को स्थापित किया जा रहा है जिनका स्वयं उन राष्ट्रों में परिक्षण नहीं किया गया है या ऐसे संयंत्र वहां बंद किये जा चुके हैं.

इस स्थिति में जब यहाँ दिल्ली की डाकघरनुमा इमारतों में इनवर्टर तक नहीं हैं वहां उन दूरदराज़ के इलाकों में इन सारी व्यवस्थाओं के सिर्फ सपने ही बुने जा सकते हैं. उधर तो बस थूक लगी टिकटें होंगी किसी माधव की हाथ की लिखाई और पोस्टकार्ड तब पहुंचेगा जब बरही को तीन दिन और बीत जायेंगे. सीधी सरल बात यही है की इस समय जब हमारी प्राथमिकतायें देश के आधारभूत ढांचे में सबसे पहले उस आम जन के जीवन को जीने लायक बनाये रखने की होनी चाहिए. जबकि यहाँ सुविधासंपन्न वर्ग बना रही है और लगातार दूसरे की कीमत पर उसे पाला पोसा जा रहा है. फिर जब सरकारी शब्दावली में हथियार उठा हिंसात्मक क्रियाओं में लगातार संलिप्त होता है, तब 'ऑप्रेशन ग्रीन हंट' चलाये जाते हैं, 'सलवा जुडूम' गढ़े जाते हैं.

इस बिंदू पर आकर हमें यह सोचना होगा की हमारी प्राथमिकतायें क्या हों? उन परमाणु संयंत्रों के विरोध में खड़े लोगों के आन्दोलन के पीछे विदेशी पूंजी की कॉर्पोरेट व्याख्या या विदेशी पर्यटकों के नृतत्वशास्त्रीय पर्यटन यात्राओं को उन लोगों के जीवन में हस्तक्षेप को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मान वहां से उगे पैसे का इस्तेमाल टेट्रा ट्रकों की दलाली में करना.

विद्युत ऊर्जा सिर्फ सामने प्रत्यक्ष उत्पाद नहीं. वह उस लम्बी नव साम्राज्यवादी विस्तारण योजना में एक ऐसा औज़ार है जिसमें उनके द्वारा बनाया गया हर उपकरण हमारे घरों में बिजली के बोर्ड ही ढूंढेगा. और उनमे लगी तार हवेल्स की ही हो क्योंकि विज्ञापन कहता है, 'वायर्स दैट डोंट कैच फायर'. और सरकारों को बिजली अधिकारों का निजीकरण करने का अवसर सुलभता से मिलजाया करेगा जहाँ फिर शुरू होगा पूंजी का खेल. मुनाफे की बन्दरबाँट!!

{ये पोस्ट 'जनसत्ता ' में कल 'रोशनी का अँधेरा ' नाम से आई है..वहाँ पढने के लिए इस लिंक को चटकाएँ..}

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