जुलाई 25, 2012

बरसात की छोटी सी मुलाक़ात

स्मृतियाँ शायद ऐसे ही काम करती हैं. तुम्हारा मेरे साथ बगल में खड़े होकर फोटो खिंचवाना अभी भी याद है. और इन सबके बीच द्वन्द नहीं पर खींचातान चालू रहती है. मेरे चेतन में घुसपैठ कर मेरे सपनों में आवाजाही भी होती जाती है. जिसपर मैं कुछ नहीं कर सकता. पहरेदार भी मेरे साथ सो जाता है.

सपने कहीं पलायन जैसी स्थिति की तरफ नहीं ले जायेंगे. कोई दबा छिपा अव्यक्त सा यहाँ हमेशा से मौजूद रहता है इसलिए आश्वस्त हूँ ऐसा होगा नही. हम अपने सपनों उसकी यादों में याद रह जाने लायक को बचा रखने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं. उनकी बारंबारता, उनका स्मृति में ठहर जाना कहीं रुकावटों को पैदा करता है तो कहीं कभी उन्ही को हटाने में मददगार भी होता है.


कल सुबह बारिश 
के बीच मेट्रो स्टेशन पर एक भूले बिसरे प्राणी से मुलाकात हुई. भौतिक उपस्थिति के स्तर पर वैसी ही परेशानी का भाव. आँखें कहीं गहरी गहराई में उतरती सी. बालों को बाँधने का ढंग तब से बदला हुआ सा. दांतों को उनकी सही जगह बताती तारें उसके होंठों को सूजन जैसा भाव देकर अपना ध्यान हटा रहीं थीं. आगे के दाँतों के प्रति ऐसी सामजिक चेतस वृति कई खांचों को और खोल देती है.

मेरे लिए तुम भी तुम हो इसलिए तुम्हे तुम ही कहा.एक बार बाहर जाती लाइन में लगकर बाहर आ गया. कार्ड पंच नही किया. ए.ऍफ़.सी. गेट से परली तरफ न निकल इतने दिनों बाद दिख पड़ने पर बात कर ही लेनी चाहिए, यही सोच स्टेशन से बहार नही निकला. मैं खुद किसी जद्दोजेहद में था. पर पास गया. बुलकारा.


तुमने भी शायद मुझे देख लिया था. और मिलने की चाहना उस स्तर पर नही दिखी जैसी सहज ही हममे होती है. तुम मोबाइल में व्यस्त इधर उधर देख रही थी और मेरे जैसे दाढ़ी वाले, जिसके साथ कितने ही प्रस्थान बिन्दुओं को जोड़ देने वाले एक साल कई संगी साथियों के साथ पढ़े थे, से कन्नी काटने की पूरी कोशिश की जा रही थी. दो-तीन-चार बार हमने एक-दूसरे को देख कर भी नही देखा. पर लगा पहले का कोई सूत्र था जो कह रहा था मिल लेना चाहिए. इसलिए मिला.


बातचीत कई स्तरों पर हुई. एमए लेक्चर से लेकर कॉलेज मैगज़ीन, एमएड तक. औपचारिकता धीरे-धीरे टूट बन रही थी. दर्शन से लेखन फिर ब्रेख्त के बाद छाते रिक्शे से होते हुए बाहर होती हुई बरसात पर फिर अटक गयी.


आखिर में घड़ी नौ बीस के इर्द गिर्द मंडराने लगी और मेरी क्लास का वक़्त पास आ गया. इससे पहले रिक्शा लेकर दोनों चलते बौछारों के साथ बारिश तेज हो गयी. और चूँकि उसका पहला लेक्चर तो करीब करीब ख़तम ही होने वाला था, वो वहीँ रुक गयी. कि बरसात रुक जाये तब फैकल्टी की तरफ जाये. मैं उसके आने वाले नतीजे के लिए 'ऑल द बेस्ट' कह भीगता भागता अपनी शुरू होने वाली क्लास में पहुंचा.


लाइन में लगते आगे बढ़ते बाहर निकलते मैं पीछे मुड़ उसी को देख रहा था. पर उसकी गर्दन गाय की तरह रंभाती दाएँ-बाएँ देख रही थी.


{बरसात की तारीख है सोलह अगस्त, बीते साल.}

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