जुलाई 22, 2012

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स

बड़े दिनों बाद वापसी..

क्या मेरे पास बने बनाये खाँचें हैं, उनमे धीरे-धीरे सबको डालता हूँ. समरूपता के इस कोण में मेरा खुद का क्या क्या निश्चय है. क्या यह विचारधारा की तरह रूढ़ नहीं है. घेरकर लपेटकर फिर उसी तरह कान पकड़ना जैसे पीछे पन्नों पर सष्टांग करायी थी. उन सारे विश्लेषण के औजारों का बासीपन गंधाने लगता है. बिलकुल वैसे ही जैसे घर में फ्रिज न हो और ढोकला एक रात रोक लिया जाये तो अगली सुबह स्वाद थोडा खट्टापन लिए रहता है. उसे खाने को जीभ मना कर देती है. या यह उन तर्कों अवधारणाओं को बार-बार उपयोग में लाकर उनकी प्रमाणिकता को बनाये रखने की ज़िद जैसा कुछ है. मूलगामी रूप से जितनी पुरानी यह सारी विधियां लगती हैं, उनमे हमारे यहाँ का लगता मौन उसकी मजबूती को साथ-साथ परखता चलता है.

उस दिन जब लिखा कि 'कम्युनिस्ट' जैसे किसी पद के साथ नत्थी नहीं हो जाना चाहता तब शायद यही आग्रह था के तांगा खींचते घोड़े की तरह बस एक ही दिशा में नहीं समझना चाहता. कभी लगता है के पूंजीवादी पाठ में उतना ही व्यक्तिवादी अध्याय हूँ जितना नितांत निपट अकेले क्षणों में कोई हो सकता है. हम विचार के साथ हैं. किसी के सुझाये नहीं चलते. उनकी जांच परख हमेशा होती रहनी चाहिए. और जहाँ तक मुझे अपनी पहचान है, वहां सवाल इतने हैं की पूर्वनिर्धारित उत्तरों से उनका गुज़रना नहीं होने वाला. भले उन सन्दर्भों को यहाँ वहां लिखमारूं पर किसी के साथ जोड़ना बैठा देना उतना ही खतरनाक होगा.

हम सबको पता है हम सभी उस प्रक्रिया में हैं 'जहाँ ज़िन्दगी सिर्फ जीने लायक बने रहे' से आगे, अधिशेष में क्षणों को व्यतीत व्यतीत करना चाहते हैं. सक्षम हो इसकी कोशिश की जा सकती है के किसी का काम पूंजी के संकट के चलते न रुके. इसे छद्दम आवरण भी नहीं कह सकते क्योंकि हम तो विनम्रता से उस वास्तविकता को स्वीकार कर रहे हैं जिनके पास पहुँचते-पहुँचते न मालूम कितने ही मारे जाते हैं. जबकि उनके आदर्शों में उनके साथी 'पूंजीपति' होते हैं.

बस कोशिश यही रहेगी के खुद से पर्देदारी न हो. हम विचारधारा की तरह यथास्थितिवादी नहीं हो सकते. न ही उनके पोषक होना चाहते हैं. विचार के संस्थागत होते ही उसकी मृत्यु निश्चित है. क्योंकि उसे विचलन से पीड़ा होती है . वहां संशोधन नहीं हो सकते. सवालों की जगह नहीं होती. पैबंद सिर्फ उन्ही के खेमों के विचारों के चिपके होते हैं. इसलिए भी उससे बचने की कोशिश रहती है. भले ही किसी विचार को मौन स्वीकृति दें पर विचारों की क्रमबद्ध श्रृंखला में हू-ब-हू अतार्किक स्वीकार्यता स्वीकार नही.

यह आज तारीख दिमाग में चल रही खुराफात का दस्तावेजीकरण है. भले झुकाव इनके विकल्पों की तरफ अधिकांशतः होता है पर किसी बने बनाये जुलूसी बिल्ले में तब्दील नही होना चाहता. वैसे भी उनकी अपेक्षाएं कुछ ज़यादा होती हैं जबकि मेरे जैसा व्यक्ति किसी अपेक्षित अपेक्षा के दायरे में रहकर सांस नही ले पाता. ऐसा मुझे लगता है. और 'मुझे' मेरे स्वर की प्रतिध्वनि सुनाई देनी चाहिए. जिसका वहां निषेध है. व्यक्ति वर्जित प्रदेश. वहाँ समूह की भेड़िया-भेड़-बकरी धसान में आपका स्वागत है.

{ इसका पीछा आगा..}

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...