जुलाई 30, 2012

उस रात की अजीब सी उलझन

कहाँ से शुरू करूँ?? क्या क्या लिखूं क्या सब छोड़ रहने दूँ??

दिल्ली आने के बाद उन्ही दबावों से घिरने का मन नही कर रहा. पिछले दस दिनों की बेफिक्री उस रात की तरह न हो जाये जब चाची के सवाल ने पूरी रात न मालुम किन उथले में ले जाकर पटक दिया था!! था छोटा सा सवाल, के, लड़की पास हय तोहका के नाय..!!


लगा कि अचानक हम इतने बड़े हो गए के हमसे जुड़ी बातों में हमें शामिल किया जाने लगा..शायद यहाँ शहर में रहने के कारण हुआ या कुछ और पता नही..फिर एक पल बाद महसूस हुआ कि क्या यह ज़िन्दगी का ऐसा मुकाम है जहाँ से एक हमसफ़र टाईप का व्यक्ति हमारे साथ नत्थी कर दिया जाता है..


आमना सामना बार बार दो-एक साल में होना, किसी मजबूत परिचय का आधार नही हो सकता. जितना दिखाया जा रहा है उसके पीछे बहुत सारे ऐसे चोर दरवाज़े भी होते हैं जहाँ आवाजाही इतनी सहज सरल नही होती. 
उन लड़की वालों के लिए उनकी लड़की, माने उनके परिवार का हमारे परिवार के साथ संबंध इस रूप में ऐसा है जहाँ दोनों लड़कों में से किसी के भी साथ जाया जा सकता है.

शादी ब्याह क्या हमेशा से ऐसे ही पारिवारिक संस्करणों में हमारे सामजिक दस्तावेज़ हैं. जहाँ उस लड़के का पिता और उसके पीछे उन सारे कार्य व्यपारों का इतिहास काम कर रहा होता है, जो उसे एक भरा पूरा कुनबानुमा आकार देता है. जहाँ उसका सामजिक मूल्य औरों के पूर्वजों-वंशजों के मुकाबले कहीं अधिक मान लिया जाता है. इसका संचय कोई एक दो दिन की जमा नहीं, बपौती है. जिसे जिम्मेदारी से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को इस उम्मीद से हस्तांतरित करती है जहाँ उसका मूल्य काम न हो उत्तरोत्तर बढ़ता जावे. और ऐसे ही सामान रूप से उस वधु के परिवार की तरफ भी समानुपातिक रूप से संचालित होता है ताकि जिस उम्मीद के साथ कहीं भी लड़की का रिश्ता लेकर जावें, स्वीकार लिया जाए.


उस रात और उससे पहले जनसत्ता में छपी मेरी ब्लॉग पोस्ट ने पापा के मन में किसी अज्ञात-ज्ञात विचार को जन्म दिया कि अगर यह चौदह फरवरी वाली प्रेमदिवसीय आलेखनुमा कहानी में कुछ तनिक भी सच है तो उस लड़की की खोजबीन होनी चाहिए. सुबह से दो तीन मर्तबा दायें-बाएं कर किसी चक्कर-वक्कर को टटोल चुके हैं. और बातचीत में कहीं यह भी प्रकट भी होता है कि हम इतने साल इस जैसे महानगरीय विश्वविद्यालय में पढ़ने के बावजूद किसी लड़की तक को नहीं खोज पाए.


अजीब सी अकुलाहट गले में आकर फंस सी गयी थी. उगलना चाह रहा था पर..खैर, एक तरीके से यह वो क्षण था जहाँ आकर मुझे अपनी खोजबीन को रोक देना था. कोई खोजी दस्ता था भी कहाँ..जिसके साथ ज़िन्दगी बितानी थी, एक तरीके से वहां पहुँच गया था. अपनी हैरान परेशान सूरत से कहीं किसी कि आँखों कोनों कतरों में झाँकने से अब तौबा होने जा रही थी. सोना इतना ज़रूरी लग भी नहीं रहा था. बस एक एक कर उन सारी छवियों को ध्वस्त करके चलना था. उन सारी स्त्रैण छायाओं से कैदी के भाग जाने का वक़्त जैसा कुछ था..


एक लड़की एक लड़का दोनों एक दूसरे को उतना ही जानते बूझते हैं जितना रोज़ बस स्टैंड पर गुज़रती आंखें एक दूसरे को देख भर लें और यही उनकी अबोली-बेमिली छोटी सी पहचान हो..

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