अगस्त 02, 2012

मई आठ की एक शाम

राकेश दो को दिल्ली आ चुका था पर मुलाकात आज शाम हुई. वहीँ इंतज़ार करता हुआ. मेट्रो स्टेशन गेट नंबर चार चांदनी चौक. अरुण हरदयाल लायब्रेरी के पास उमेश की खोज खबर लेता फोन पर बात करता मिला. मैं नयी सड़क से मिनियम लेकर आ रहा था. टाउन हॉल होते हुए. आशीष भी था. कुल मिलाकर पाँच.

फिर हम लाजपतराय मार्केट से रिमोट कंट्रोल लेकर अरुण के घर पहुंचे. आशीष वहीँ इंतज़ार करता रहा. बैठा रहा. वो अन्दर गया और अपनी दस हज़ारी फोटो एल्बम ले आया. गाँव से आ गयी थी. शादी की फोटोग्राफर की खींची हुई तस्वीरें. उमेश पांच गुना टांगने वाला अपना ही गणित भिड़ा रहा था. फिर सुई गुजरावालां टाउन होते हुए तीस पैंतीस लाख दहेज़ की संभावनाओं से विश्लेषण शुरू हुआ. खाना आज कल कहाँ की पेन्ट्री से आ रहा है, इस पर अरुण ने जवाब दिया और आशीष नें मुस्का कर मुहर लगायी. ऐसी ही प्रमेय वह हमें समझा रहा था.

हर प्रेम की परिणति विवाह में होना नियतिवादी विमर्श है और राकेश ने उसे खारिज करते हुए आगे कहा के तुम्हे अगर लगता है कि सच्चा प्यार है तो कभी उससे शादी नही करना. करोगे तो तलाक देने वाली स्थिति में पहुँच पाना मुश्किल नहीं होगा. क्योंकि ज़िम्मेदारी तुम्हारी थी. किसी ने थोपा नहीं था.

उसकी बहन कॉमर्स से ग्यारहवी कर रही थी. कोई पब्लिक स्कूल था पीतमपुरा का. चार विषयों में रह गयी है. भाई साथ रखने से मना कर रहा है. कहता है पैसा लेना है ले लीजिये पर साथ नहीं रखेंगे. जबसे वह दिल्ली से गया उसके कौन दोस्त हैं? क्या रुचियाँ हैं? ऐसे सवाल भी साथ रीवा चले गए. ओपन से बारहवीं तो हो जाएगी पर उसका होना ढाई पसेरी भी नहीं. वह खुद इधर इन छुट्टियों में दिल्ली के स्कूलों में नौकरी ढूंढने करने की तलाश में है. सिगरेट महिना भर हो गया पीछे तबियत खराब होने पर छोड़ दी.

आज न फव्वारे पर जग्गू की फ्रूट आइसक्रीम खायी न बाद में अरुण-उमेश की लायी कोक पी. पता नहीं आज की बातचीत पर उसके सिरदर्द का असर था या उन सारी बनती बिगड़ती स्थितियों के बीच अपनी नौकरी को लेकर उठती खीज, के वो बात लगी ही नही. कभी-कभी राकेश-आशीष दोनों की स्थितियां लगभग समान सी लगती हैं. दोनों सामान्य सवर्ण. उस सरकारी नुक्ते की दौड़ती बाधादौड़ में सरका कर पीछे भेज दिए जाते हैं. शादी घर-परिवार-अपेक्षाओं की ज्यामिति में अपनी भूमिकाओं को लेकर जटिलता का अनुभव. बराबर बढ़ती उमर का दबाव. खुद के उत्पीड़न के लिए तय्यार करते मानस.

अरुण अच्छा श्रोता तब नही रहता जब उसके दिल में दबी कुछ बातें सतह पर आना चाहती हैं. बात सीधे अब राकेश के भविष्य पर जा टिकी. कभी-कभी कुछ जवाबों को हमें नही माँगना चाहिए..पर..खैर, फिर वहाँ अपने वर्तमान से असंतुष्ट होने के बावजूद हाँ में हाँ मिलाता पकड़ा गया. के जहाँ हम होते हैं वहां अपने को 'मिसफिट' भी पाते हैं पर वहीँ किसी 'यूटोपिया' के लिए संघर्ष कर रहे अपने आज को कोसते रहते हैं.

आशीष इस मामले में उमेश की तरह तो नहीं पर हाँ, दोनों दूसरों की सुनते हैं, तब कहीं अपनी रखते हैं. उमेश की सचाल-वाचाल ध्वनियाँ अनुपात में ज़यादा होती हैं क्योंकि कई बातों का प्रस्थान बिंदु वही होता है. आशीष भी नौकरी की अपने पिताजी की बातों से थोड़ा परेशान रहता है. पर शायद यह हमारे मध्यवर्गीय परिवारों में बेटों की नियति जैसा कुछ है. बिन नौकरी शादी की तरह.

आज शाम की इन सब बातों में अजीब किस्म की विश्रृंखलता लग रही है वैसी ही वहाँ उस हवा में थी. बेतरतीब सी. भौतिक रूप से सब वहाँ मौजूद थे पर मानसिक रूप से न मालूम कहाँ थे. वहाँ कसरत करता दिमाग किन्ही उलझनों से उलझ रहा था. उन सब में ठहराव हो ही नही पाया..ऊपर से अरुण बार-बार उस कमरे की कथित घुटन से बहार निकल अपने हिस्से की बातें करना चाह रहा था जो कुल मिलाकर बाहर भी कम ही किश्तों में आ सकीं. बाहर सबने पहले गोलगप्पे खाए फिर हल्दीराम के ढोकले देखते हुए छोटे लाल की रेहड़ी वाली फ्रूट आइसक्रीम पहुंचे. जिसके देखते ही अरुण को दौरा पड़ता है और अपने आस-पास खड़े दोस्तों में से किसी एक को चुन सौ वाला डिब्बा पैक करवा लेने को कहने लगता है.

मेट्रो में जाते हुए राकेश ने कहा, अब यहाँ नही मिलेंगे..शायद सिरदर्द कम नही हुआ था..

{इधर डेढ़ साल बाद घटी ऐसी ही एक और शाम हमारे हिस्से..}

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...