सितंबर 08, 2012

एक अनगढ़ कविता

कभी-कभी मन करता है तो बैठ जाता हूँ..रात करीब नौ बज रहे थे. बाहर बारिश नहीं हो रही थी. आकाश में तारे थे..और मेरे साथ थीं कुछ देर बाद ये पंक्तियाँ..उन सभी बेरोजगारों को जो कभी न कभी अपने पिता की  तरफ भी मुड़ जाते होंगे..

आखिर में बस इतना ही के मैंने अभी तक ज्ञानरंजन जी की कहानी 'पिता' नहीं पढ़ी है..  

डर

इसे कविता में ही कहूँगा कि पिता का चेहरा, 
अब ज़यादा दिखता है अपनी आँखों के पास

उस पर उम्र की साल-दर-साल चादर
शरीर को थका रही है,
कह रही है थोडा आराम भी ज़रूरी है

इन एब्सर्ड सी पंक्तियों में
छिपा रहा हूँ अपना डर
कि डरा हुआ हूँ..

इतना डरा हुआ के लिख भी नहीं पाता..
किसी से कह भी नहीं पाता
शायद यहाँ भी न कह पाऊं..

बस्स देखता हूँ
उनकी आँखों से नीले रंग का हरा हो जाना
पर भी नहीं कहता उनके गलत होने पर भी
कि सामने हरा नहीं नीला ही है..

रोज़ किसी नतीजे के आने का समाचार लेना
और मेरा झुका सिर उन्हें कुछ और कहने नहीं देता.

उनके हाथ में रहता है
सपनों के घर का नक्शा
जिसमे हम सब रहेंगे आराम से!

एक सत्ताईस साल के बेरोजगार होने के बाद
यह डर ही मेरा रोज़गार है..  

१६.७ २०१२ 

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता में मैं भी हूँ और मेरा डर भी।
    लेकिन इस डर को मैं अपना रोज़गार नहीं बना सकता,
    क्योंकि,
    इससे नीले को हरा समझने वाली आँखों के सपने पूरे नहीं होते।
    और इस रोज़गार से जो घर बनेगा,
    वो ना तो सपनों का होगा ना आराम का।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. कह सकते हैं के हम सब इससे बचना चाहते हैं
      पर बच नहीं पाते।

      यह नियतिवाद नहीं पर इसकी बनावट बुनावट बढ़ती उम्र के साथ न मिलते रोजगार की भरपाई जैसा कुछ लाग्ने लगता है
      चाहे अनचाहे ..

      यह दुख की कविता है
      हम सबके दुख की ..

      हटाएं

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...