सितंबर 10, 2012

जो हिंदी में नहीं था

खिड़की के बाहर बारिश हो रही है. पर उसपर नहीं लिखने जा रहा हूँ. कुछ याद आया है इसके साथ. पर उसमे भी बारिश की बूंदें नहीं हैं..बस एक अँधेरा कमरा है, उसमें है मोमबत्ती का पीली छाया भरा उजाला. तब हमारे घर में लकड़ी का तख़्त था जो अभी टूट चुका है और बाहर पड़ा भीग रहा है. टूटा कैसे उसकी कहानी फिर कभी..तो हमारा गद्दा बिछा बिस्तरा वही होता था, पैर पोंछने की हिदायत के साथ.

उन दिनों घर की गतिकी में अलमारी की पीठ नहीं कन्धा दिवार को लगता था. बड़ा वाला बक्सा तब ठण्ड आते दिनों के साथ खुलता तो उस पर रखे गद्दे-बिछौने उसी तख्त पर रखे जाते. अब वह वहां नहीं है तो बक्से का खुलना कई सालों से विलंबित सा है. मतलब उसमे ऐसी ज़रूरत का सामान है, जिसकी ज़रूरत इतनी ज़ल्दी नहीं पड़ती.

तो आज भी अच्छी तरह से याद है उस मोमबत्ती की रौशनी में एक छोटा सातवीं क्लास का लड़का अंग्रेजी में छपी किताब से सवाल-ज़वाब याद करने की ज़द्दोजहद में था. इम्तिहान सालाना था और नामुराद साइंस की जुबान थी मुश्किल.

उन्ही दिनों पहली-पहली बार यह बात कान में पड़ी होगी कि लिख-लिख कर याद करने से एक तो ज़ल्दी याद हो जाता है और ज़यादा दिन तक भेजे में भी रहता है. तो इन सबको मिलाकर हुआ यूँ के अंग्रेजी उस वक़्त माशहअल्लाह अंदाज़ में पढ़ते थे. जितना ज़वाब लिखा छपा होता उसे पेंसिल बॉक्स से यूँ छुपाते, जैसे उससे छुपन छुपायी खेल रहे होते..फिर एक मिनट बीतता, दूसरा मिनट आता और तीसरे तक आते-आते जब याद किया हुआ न आता तब धीरे धीरे एक-एक इंच नाप-नाप कर हटाते और हू-ब-हू रफ कॉपी में नक़ल कर लेते. और बेचारा दिल भी समझ लेता बिलकुल वैसा ही तो याद कर लिख दिया है, अब वहां भी पूछेंगे तो लिख मारेंगे..

पर अगर दो चार मिनट बाद ही उस सवाल पर घूम कर वापस आते तो याद किया साथ वापस नहीं होता. और यह उस इम्तिहान के पर्चे से लड़ने के लिए जुटाए जा रहे कॉन्फिडेंस के लिए घातक होता इसलिए पन्ना पलट लेते और फिर भूल कर भी उस पन्ने नहीं लौटते. कहीं दो चार हर्फ़ भी इधर उधर हो गए तो..

फ़िजिक्स को तब उस दिमाग से हिंदी में सोच भी नहीं सकते थे. जो हिंदी में होती तो कभी उसे पढ़ के जाते भी. बस घूमते टहलते पहँचते. कुछ-कुछ याद कर लिख मारते. ऐसा नहीं था कि हम फ़ीस नहीं दे रहे थे, फिर भी पता नहीं क्या हुआ के मास्टरनी जी ने कभी भी ये जानने की कोशिश नहीं की के हमने समझ आ भी रहा है या नहीं..या हम ऐसे ही मुंडी हिलाए जा रहे हैं.

पेपर तो मौत के साथ करते दिन होते इसलिए जितनी जल्दी खतरा टले उतनी ही सेहत की तंदुरुस्ती बने. पर तंदुरुस्ती उस इम्तिहान में पिछड़ गयी. खींच खांच के साठ प्रतिशत बन रहे थे पर दो विषयों में रह गया. वो थे अजब गजब गणित और ससुरी साइंस. जब मैं भाषा से जूझ रहा था तब साथ-साथ इनसे भी लड़ना पड़ रहा था और वहाँ किसी टीचर को समझ नहीं आया के फर्स्ट डिवीज़न के बावजूद उसी जमात में अगर रह गया हूँ तो क्यों..मैं फेल किसमें हुआ था विषय में या माध्यम में..

तब मेरे पास ये सवाल नहीं थे बस इतना जानता था के हिंदी में मौका मिलता तो बात दूसरी ही होती. पर नहीं ये नहीं समझा पाया उन्हें..दुबारा सातवी करनी पड़ी. स्कूल छूट गया. दोस्तों की पलटन वहीँ रह गयी. उस मन को कैसे दाखिला न होते दिनों में मैंने संभाल के रखा था..फेल का बिल्ला लगा था न, कोई स्कूल लेता क्यों..??

{आज (14 सितम्बर 2012) यह पोस्ट 'जनसत्ता 'में 'विफलता का माध्यम' शीर्षक के साथ आई है..वहाँ पढ़ने के लिए इधर चटकाएँ.. }

इस पोस्ट 'विफलता का माध्यम' पर 
चौपाल में एक पत्र....तारीख बाईस सितंबर.

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