सितंबर 09, 2012

इतवार फिर कभी नहीं आये

इधर पीछे पता नहीं क्या हुआ के पुरानी स्मृतियाँ छवियाँ बन कर सामने से गुज़र रही हैं. अनछुई सी कोमलतम यादें. बचपन इतना इत्मीनान से उन्हें सहेज रहा था जिसमे आपाधापी इतना आंडी टेढ़ी नहीं कर जाती थी कि सोमवार पिछली रात के अलसाई आँखों को खुलने नहीं देता था..

एक इतवार था. सड़कें बेतरतीब भरी नहीं थीं. खाली थीं. गाड़ियां गाड़ी वालों के पास थीं. हम बस में थे. शायद उन दीवारों को तभी से वैसे ही पोता जा रहा है, जैसा वो आज की रॉकस्टार में मूतते लोगों के पीछे छिपी हुई हैं. बस कौड़िया पुल के पास से गुज़र रही है. लाल किले के बाद. बस भी हमने यहीं बिरला मंदिर से ही ली होगी दो सौ पंद्रह या दो सौ सोलह.

शास्त्री पार्क तब गुप्ता जी रहते थे. अब वह कहीं नहीं हैं. आखिरी मुलाक़ात हुई इस बार गाँव में. सीधे मिले नहीं, अमर उजाला से इनकी दुर्घटना में मृत्यु की खबर मिली. तब हम उनके घर जा रहे थे जहाँ किराये के कमरे में वे रहते थे. उनकी पत्नी भी आई हुई थीं. तब हम दोनों भाई शायद तीसरी चौथी में रहे होंगे..बस दनादन भागती जा रही थी. वापसी में रात अँधेरा हो चुका था. सड़क किनारे ऊँची सी दिवार थी. और उस ऊँचाई पर बड़ी सी सड़क. जिसपर जाती सीढ़ियाँ लगी थीं. हम चढ़ कर ऊपर आगये. बस पकड़ी या नहीं. याद नहीं. शायद पकड़ ही ली होगी तभी तो आज घर पे हूँ..

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