अक्तूबर 15, 2012

मृत्युलेख

दो दिन से क्या देख रहा हूँ, पता है..?? खेल. वक़्त हमारे साथ खेलता है. हमें लगता है की वक़्त हमारा है पर उसमे हमारी भागीदारी उम्र के आसपास निर्मित होती संरचनाओं की होती हैं जो देह के बूढ़े होने के साथ साथ या तो कमज़ोर होती जाती हैं या हमारे नियंत्रण से बाहर खिसक खुद को स्थापित कर लेती हैं.

पापा के सबसे बड़े मामा के सबसे बड़े लड़के. पापा के ममेरे भाई. डॉक्टर हैं. अपनी उम्र के प्रारम्भिक चरण में जैसे प्रभाव युक्त आभा के साथ थे, उनका तेज इधर स्वास्थ्य के साथ धीरे धीरे कम होता जा रहा है. स्मृति इतना साथ नहीं देती. उम्र अपनी रचना को कह रही समेट लिया जाये. यह स्थिति व्यक्ति के सामने ही घटित होती है. उसका लगातार क्षीण होता जाना. जिस मृदुता सद्भाव प्रेम को तब हम नहीं पहचानते न तवज्जो देते हैं उसे ही अब हमारा साथी होना पड़ता है.

इस सारी अभिधा की लक्षणा से जो व्यंजना हो रही है और जो नहीं हो रही है उसमे सुनी सुनाई सामने घटित घटनाओं को लिखने नहीं जा रहा हूँ. बस याद कर उस घटित जीवन यात्रा को अपने पास सहेज कर रख ले रहा हूँ जहाँ अचानक ह्रदय के किसी कोमलतम अंग में छोटे भाई के साथ बितायी कोई याद किसी टहनी पर टंगी रह जाती है और इतने बरस बीत जाने पर उसे सामने देख फिर उन पन्नों पर जाने को हो उठता है.

पता नहीं उनसे जुड़ाव न के बराबर है पर पापा को बोली पंक्तियों में जो नैराश्य जैसी प्रसन्नता थी उसका निरर्थक बिंदु पर पहुँचना अन्दर से अजीब सा कर रहा है. हम कुछ देर ठहर पनियाई आँखों से अपने बीते कल में जाना चाहते हैं उन दिनों को फिर से जीने की तमन्ना होती है पर सामने हमारी देह को निहारती ऑंखें बस लगातार हमें देखती रहती हैं. हमें चला जाना है उन सबको यहीं छोड़े.

लगातार उस कम होते वक़्त में हम ज़यादा से ज़यादा जी लेना चाहते हैं. पर सामर्थ्य सिर्फ स्वपनलोक तक ले जाता है. जहाँ फरेंद का बिरवा उसकी कमज़ोर डाड़ से गिरकर घुटने कोहनी की चोट दर्द नहीं देती बस रोक देती है. थोड़ी देर के लिए उमर वहीँ इंतज़ार करती है और अचानक हम छूटते चले जाते हैं. कटहल के बिये भी याद आयें तो खा नहीं सकते. फूफा कटरा से ले भी आयें, तब भी नहीं. पाला जवानी की तरह नहीं गिरेगा. बरसात तब रूमानी नहीं रह जाती.

फिर लगातार वहीँ करवट बदलते जिसपर नज़र पड़ेगी बने की हवा के साथ उसकी याद किसी डोलची पोटली से फुदक बाहर आ जाना चाहेगी. उन यादों को हम समेटते रह जायेंगे और वक़्त सिर्फ कान में इतना फुसफुसाएगा कि भईया बहिनी तोहर वक़्त आई गवा..!! और सब वहीँ रह जायेंगे. यहाँ तक की मैं भी. क्योंकि उस दिन के बाद मैं रहूँगा भी कहाँ? मेरी याद उस दिन के बाद कोई याद नहीं बनने देगी. वहीँ कोने के साथ चटाई समेटते सबको कुछ याद भी आएगा तो मैं नहीं वो बीछी आएगी जो मुझे काट गयी थी.

यह हमारी स्मृति के पन्नों का एक-एक कर बिखरने जैसा जान पड़ रहा है. जिनको बचपन से देखते आ रहे हैं उनमे से एक एक की मृत्युरेखा तक पहुँचती ज़िंदगियाँ थोड़ा तो हमें भी खाली करती जाती हैं. पता चले. न चले.

{17 दिसंबर, 2012 यह पोस्ट जनसत्ता में 'स्मृतियों के पन्ने ' नाम से आई है, वहां पढ़ने के लिए इधर चटकाएं}

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