अक्तूबर 20, 2012

असहमति का साहस - विवेक की असहमति

इसे पढ़ने के पहले विनम्र निवेदन है कि इस पर दृष्टिपात करने के बाद मुझे तहलका का खोजी पत्रकार मानने की गलती न करें. 'समयांतर' के पाठक के रूप में चार-पाँच सालों से तो जुड़ा ही हूँ तो इस पूंजीवादी समय में एक क्रयशील उपभोक्ता के रूप में यह सकर्मक विमर्श जैसा ही माना जाये..!!

बकौल विनीत कुमार 'आपसे सवाल करने की हैसियत मेरी बस इतनी है कि कई कई महीने बेनागा दस दस रुपये देकर समयांतर खरीदी है और मैंने जिस पत्रिका के लिए पैसे खर्च किये हैं, उनसे ये जानने का अधिकार तो रखता ही हूँ. हिंदी में में ये बदतमीजी समझी जाएगी लेकिन बाज़ार की भाषा में ये एक उपभोक्ता का अधिकार है.'

(थोड़ा विनीत से : दो जगह फेरबदल की स्वतंत्रता ली है एक तो वहाँ जहाँ आपने 'कई मर्तबा लेख के लिए' लिखा था उसे मैंने 'कई कई महीने बेनागा' कर दिया है और वहाँ अखबार 'जनसत्ता' था यहाँ 'समयांतर' पत्रिका लिख मारा है. सन्दर्भ २७ अगस्त का आपका फेसबुक स्टेटस है. साल था दो हज़ार दस और घडी में बज रहे थे आठ बजकर बारह मिनट..) 

इस बड़ी भूमिका-कम-स्पष्टीकरण-कम-निवेदन के बाद आप आगे बढ़ सकते हैं..थोड़ा परसाई भी पढ़ रखा है यह भी आपको पता चल जायेगा..

'समयांतर' विचार और संस्कृति का मासिक, 'असहमति का साहस और सहमति का विवेक' टैग लाइन वाला पत्र है. हम इसे पत्रिका कहते आये हैं. अक्तूबर का अंक है कीमत बीस रुपये. पृष्ठ उनतीस से 'पुस्तकों पर केन्द्रित छमाही आयोजन' वाला विशेष नुक्ते के साथ 'परिच्छेद' शुरू हो रहा है. इसका विस्तार पृष्ठ बयासी तक है.

इतनी तथ्यात्मक जानकारी इसलिए लिखी क्योंकि इसकी आवाज़ जिसे स्वर कहूँ और इसका मिजाज़ कुछ ऐसा है कि सरकारी विज्ञापन प्रभाग के अलावा दुसरे पूंजीगत स्रोतों से प्राप्त विज्ञापन इसकी प्रतिबद्धता- स्वर- असहमति- प्रतिरोध- विवेक को प्रश्नांकित कर सकते हैं. इसलिए न इसके कागज़ कि गुणवत्ता वैसी ज्ञानोदयी आभा लिए होती है न विज्ञापन रंगीनियत लिए.  पर छपाई से लेकर कागज़ मानव श्रम बौद्धिक व्यायाम आदि इत्यादि मदों के लिए पूंजी तो चाहिए. अब वह आये कहाँ से? तो इसकी सूचना पेज नंबर ७९ पर एक बक्से में है जिसका शीर्षक है 'इस अंक के प्रकाशक'.

अब इसे संयोग कहें या अरेबियन नाइट्स का चमत्कार-फमत्कार कि जिन्होंने इस अंक के प्रकाशन में सहयोग किया है उन्ही प्रकाशन संस्थानों से प्रकाशित पुस्तकों पर समीक्षाएं- लेख वहाँ के पन्नों पर हैं. यह कैसे हुआ होगा इसकी दो संभावनाएँ तत्क्षण दिख पड़ती हैं- पहली यह कि चयन भले समयांतर का रहा हो पर छापने के एवज़ में उन्होनों उन प्रकाशकों से सहयोग नामक मद में आर्थिक पूंजी कि मांग की हो. अच्छा ये वाला थोड़ा ओछा किस्म का भी लग रहा है और इसमें श्रम भी करना पड़ रहा है तो दूसरी संभावना पर गौर किया जा सकता है.  

वह यह कि चूँकि घोषित रूप से पुस्तकों पर केन्द्रित अंक वर्ष में दो बार प्रकाशित होता है, जून और अक्तूबर में, तो स्वयं ही पूंजीगत सहयोग के साथ वह प्रकाशन संस्थाएं स्वयं मुद्रित की हुई सामग्री इस पत्रिका को मुहैया करवाते आ रहे हों..!! 

और असहमति होते हुए भी क्योंकि साहसी पुरोधा हैं वह सहमति का विवेक इस्तेमाल करते हों. हर बार. स्पेस की कीमत ही तो लगा रहे हैं. भले अगले अंक में उस प्रकाशक की बखिया उधेड़ दें. सेंध तो हर बार लगा ही जाता है. क्या कुछ मुखौटे ऐसे ही अपना काम करते हैं..

{नीचे की गयी टिप्पणी में सम्पादक 'समयांतर ' पंकज बिष्ट का इस पोस्ट के प्रतिउत्तर में दिया गया जवाब है। सन्दर्भ समयांतर, दिसंबर 2012, पृष्ठ छह.}

1 टिप्पणी:

  1. समयांतर को यह मेल करने के साथ ही फेसबुक पर नोट की शक्ल में भी लगा दिया था। 'फेसबुक नोट'(क्या कुछ मुखौटे ऐसे ही काम करते हैं..??) पर ग्वालियर वाले अशोक कुमार पाण्डेय जी ने कमेंट किया। मेल का जवाब कुछ दिनों बाद दस नवम्बर को सम्पादक समयांतर पंकज बिष्ट की तरफ से आया। वही पत्र लिखने के लिए औपचारिक धन्यवाद नुमा। अभी बीते दिसंबर(2012) के अंक में उन्होंने इसे प्रकाशित किया है। साथ में जवाब भी था। उस प्रतियूत्तर को हू-ब-हू यहाँ उतारे दे रहा हूँ।

    उत्तर: इस मजेदार पत्र के लिए हम आभारी हैं। शचीन्द्र जैसे पाठक न हों तो जिंदगी कुछ शुष्क हो जाएगी। आर्य साहब को लगे हाथ यह भी मान लेना चाहिए था कि हमारे देश का पूंजीपति, इसमें अब विदेशी निवेश भी काफी हद तक शामिल हो चुका है (उदाहरण, पेंगुइन, हार्पर कॉलिंस और मैकमिलन), उदारीकरण के बाद, इतने उदारमना हो गए हैं कि वे अपनी आलोचना के लिए समयांतर के अंकों को प्रायोजित कर रहे हैं- 'विज्ञापदकीय उर्फ़ एडवरटोरियल वाली शैली में।

    आश्चर्य की बात यह है कि विगत चार पाँच सालों में 'दस-दस रुपये का दंड भरने' के दावे के बावजूद वह इतनी देर बाद यह लिखने का साहस जुटा पाए। इस बीच कुछ नहीं तो दस ऐसे विशेषांक तो निकल ही गए हैं जिनमें 'इस अंक के प्रकाशक' छपा है। पत्र लेखक इतने अनजान व्यक्ति भी नज़र नहीं आ रहे हैं कि हिंदी समाज के चलनों से अपरिचित हों। क्या उन्होंने गलती से भी नहीं सोचा होगा कि जो हिंदी के प्रकाशक मुश्किल से ही विज्ञापन करते हैं वे भला समयांतर के ही अंकों को क्यों प्रायोजित करने लगे हैं? समयांतर से उनके इस लगाव का क्या कारण हो सकता है, यह कि समयांतर लाखों में बिकता है?
    हर पत्रिका अपने पाठकों से इतनी समझदारी की अपेक्षा तो करती ही है कि वे प्रतिक्रिया से पहले थोड़ा सोच विचार भी करने का कष्ट करेंगे। अगर कोई पाँच वर्ष बाद भी अंदाज़ नहीं लगा पा रहा हो कि प्रकाशकों को एक जगह करने का कारण क्या हो सकता है तो उस पाठक की समझ का क्या किया जा सकता है।

    पत्र लेखक चतुर सुजान व्यक्ति हैं, इतना तो जानते ही होंगे कि तकनीकी रूप से भी हर पत्रिका का एक ही प्रकाशक होता है। और उसका नाम प्रिंट लाइन में पत्र पत्रिका के अंत में छपा होता है। यानी अगर कोई किसी पत्रिका के पूरे के पूरे अंक का खर्चा उठाने के लिए तैयार हो भी जाए तो भी वह प्रकाशक नहीं कह लाएगा। प्रायोजक ज़रूर हो सकता है। यह कानूनी मुद्दा है।

    अंत में प्रिय भाई खोजी पत्रकार बनाने की महत्वाकांक्षा रखना दूर की बात है, असल बात यह है कि सहमति और असहमति के अलावा एक और विवेक भी होता है जिसे अंग्रेजी में 'कॉमन सेन्स' कहते हैं। इसका आभाव घातक होता है। आशा है आप सहमत होंगे।

    -संपादक

    इसका कोई भी जवाब भेजने की अभी तक नहीं सोच रहा हूँ। बस यादगारी के लिए यहाँ लिख दिया है।

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