अक्तूबर 25, 2012

किस्सागो और उनका आदिग्राम

'आदिग्राम उपाख्यान' का फ्लैप कुणाल को 'जबरदस्त किस्सागो' कहता है. उनकी यह किस्सागोई उस जीप के बरगद के पेड़ से पहले उसके सड़क से खेत पर उतरने वाली घटना के दरमियान ही पैदा होता लगता है. या फिर इज़राइल-इस्माइल भाईयों की पढाई के आसपास. जहाँ इसे राजनितिक उपन्यास हो जाना चाहिए था सारी गड्डमड्ड वहीं उसके नंदीग्राम के क्षेपक हो जाने के साथ हो जाती है. घेराबंदी. संग्राम की पूर्वकथा में जो भी कहा गया उससे प्रस्थान बिंदु इतना मजबूत नहीं बन पाता के उसकी भूमिका में इस कृति को स्वीकार कर लिया जाये.

बावजूद इसके कहानी है. आगे है. पीछे है. ऊपर है. नीचे है. इसे बिना किसी नारे के सिर्फ एक जगह की ठीक ठाक कहानी भी कहा जा सकता है. पर रेणु से अढ़ाई कोस चल यहाँ आने की उतनी जहमत बाकियों को नहीं उठानी चाहिए. 'मैला आँचल' इससे ज़यादा राजनीतिक है और न कहते हुए भी कई कई उपाख्यान उसमे रचे बुने हैं. सीधे टकराव से ज़यादा दायें बाएं किया गया है. या यह हो सकता है की समकालीनता का दबाव उसे कहीं मोड़ने का मौका ही नहीं देता.

वहाँ बाघा से ज़यादा यादगार चरित्र सद्दाम और उसका बाप शमशुल हैं जिनको फ्लैप पर लिखने वाला शायद भूल गया. यह बात दीगर टाईप की है के उसने कमज़ोर चरित्रों के लिए पाठकों का जहाँ और उसका कोना सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित करा दिया था. हाँ यह देखना भी मौज़ू है कि उपन्यास नागार्जुन की इन पंक्तियों से शुरू होता है 'आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी,/ यही हुई है राय जवाहरलाल की' और ख़तम होता है संसद मार्ग पर. मतलब, धूमिल की कविता पर (सुदामा पाण्डेय का लोकतंत्र)  'लेकिन वह जो न रोटी बेलता है न खाता है, बस रोटी से खेलता है, वह तीसरा आदमी कौन है? इसका उपयोग वे ममता बनर्जी से एक सवाल के रूप में करते हैं पर जवाब में दूसरी तरफ से कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता. मिलता सिर्फ मौन है.

दिक्कत यही लगती है के जब उस पाठक के सामने उदय प्रकाश की '..और अंत में प्रार्थना' से लेकर 'वारेन हेस्टिंग का सांड' पहले से मौजूद हैं, तब आप उनसे खुद को कैसे अलगायेंगे..जादुई यथार्थवाद परिमलेंदु दा की कहानियों का हिस्सा ज़यादा लगता है पर जिस रानी रासमणि की मौत बंगाल के आकाल में चावल की खुशबु से हुई थी उसमे अखिलेश की 'वजूद' मौजूद है. यहाँ हेस्टिंग का नक्शा नहीं है शमशुल खुद है..

अगर मुझे राजनीतिक आख्यान ही ढूंढने हैं तो 'हज़ार चौरासी की माँ', मधु कांकरिया की 'लेकिन कॉमरेड' क्या कम हैं ..गोविन्द निहलानी की 'द्रोहकाल' देख सकते हैं..रैक से फिर 'रजिस्टर्ड नंबर 1038' उठाई जा सकती है..

{बारह की रात इसे ख़तम करने के बाद की फौरी टिप्पणी } 

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आपका आभार. परन्तु मित्र ऐसी सूत्र टिपण्णी से बचा करें. क्योंकि इनसे पता नहीं चलता के पाठक वास्तव में कहना क्या चाहता है..थोड़ा आलोचनात्मक होने के साथ अगली बार आने की प्रतीक्षा..

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