नवंबर 18, 2012

तुम्हारे लिए..

इधर मेरा तुमसे बात करने को खूब मन किया करता है। कभी सोचता हूँ किसी छत के छज्जे किनारे हम तुम बैठे हैं और सामने डूबते ढलते सूरज के साथ आराम से अपने आने वाले कल को एक दूसरे में बाँट रहें हैं। जब हम दोनों संग होंगे तब भी क्या आज की तरह तुम्हारे चहरे को इतनी शिद्दत के साथ महसूस करूँगा, पता नहीं पर। आज जब फोन पर लगे कान से तुम्हारी छवि मेरे अन्दर उतरती जाती है उस वक़्त कुछ सोच नहीं पाता बस थोड़ी देर के लिए उसी आवाज़ दुबारा सुनने के लिए बीच बीच में चुप हो जाता हूँ। सिर्फ सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़।

नहीं सोचा था कभी के इतने अन्दर से तुम्हे महसूस करूँगा। हम थोड़े पीछे के दिनों में कितने अजनबी से थे। बस जो थोड़ी बहुत पहचान बोल बतकही थी उसे किसी ऐसी गली में इंतज़ार करने का रोमांच नहीं होता न कोई डर जैसा स्थायी भाव कहीं आसपास फटकता था। नहीं सोच पाता था कि तुम ऐसी होगी। 

यह जो आगे लिखने जा रहा हूँ वह किसी और कहानी की तरह ही सच है के एक दिन सड़क पार करते वक़्त सोचने लगा अब मेरे हिस्से में तुम्हारा भी उतना हिस्सा है और इतनी बेतरतीबी से इन दौड़ते पहियों के नीचे आजाने के लिए नहीं बना हूँ। अब हम दोनों एक दूसरे के लिए उतने ही है जितने अपने खुद के लिए। दिमाग में यही सब घूमता था कि जो कस्बाई किसम की जगह बड़े होने के खतरे होते हैं उनसे तुम खुद को कितना बचा सकी हो..फिर शहराती दिमागों में जैसे ख़याल आते हैं उसमे तुम्हे फिट करने की जद्दोजहद से अपने को परेशान करता रहता..खुद कितना शहराती हूँ इसपर कभी नहीं सोच पाता..

जहाँ तुम हो वह भी तो ठीक ठाक शहर ही है ठीक ठाक क्या पूरा शहर है अपने इतिहास से वर्तमान में आते आते संक्रमण से वह भी उतना ही प्रभावित है शहर के भूगोल को फिर कभी छुएँगे फिलहाल तुम्हारी तरफ लौटते हुए यही पाता के जिसे बचपन से इतनी पास से लगातार देखता आ रहा था उसे इस तरह कभी क्यों नहीं देख पाया। शायद जो पास होते हैं उन सबके साथ यही होता होगा, बिलकुल वैसे ही जैसे किताब आँखों के बिलकुल पास लाने पर छपे शब्द धुँधले दिखते हैं उसी तरह..

प्रेम कभी कभी ऐसे ही दबे पाँव हमारे इर्दगिर्द चहल कदमी करता रहता है बस उसकी आवाज़ हमारे कानों तक देर में पहुँचती है मैंने कई बार इसे पहले भी सुनने की कोशिश करी पर कामयाब न हो सका इस बार कान मशीन नहीं लगायी पर फिर भी 'उस तक' पहुच गया। उस तक को तुम 'तुम तक' भी पढ़ सकती हो। तब इसके मायने पिछली पंक्ति से और आगे चले जायेंगे जहाँ हो सकता है हम दोनों को हमदोनो साथ साथ दिख पड़ें और दिखे किसी बड़े से दरिया किनारे किसी हरी भरी बगिया में पेड़ के नीचे लगे सागौन की लकड़ी से बने बैंच। जिस पर हमदोनो उसी सूरज को निहार रहें हों।

मुझे पता है वो दिन अभी कुछ और दिनों की दूरी पर हैं। शायद तुम्हे भी पता है। वो दिन थोड़ा और हमदोनों का इंतज़ार करें। मुझे पता है वो करलेंगे..

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