दिसंबर 10, 2012

न समाज एकरेखीय है न बच्चे

पता नहीं ऐसा कैसे होता गया के लिखना शुन्यता जैसा दार्शनिक भाव लेता गया और मैं खुद किसी पुरानी किताब की जिल्द की तरह होता रहा। होते जाना मेरे सामने ही था। बिलकुल यहीं जब जंतर मंतर इतना लोकप्रिय स्थल नहीं हुआ था और न मैं इस लिखने विखने के चक्करों में किसी लड़की के पीछे पड़े दीवाने की तरह हुआ था। पर जो सच था, मुझे पता था। लडकियां खूब नहीं थीं, न उनके पीछे जाने लायक जूते ही कभी खरीद पाया। जो कुछ देखता उससे प्रभावित नहीं होना चाहता था पर करूँ क्या। ये दिल है के मानता नहीं..!!

शायद अनिल कपूर की किसी फिल्म का है, कह नहीं सकता। अस्सी के दशक के गाने थे ही ऐसे। पर इतना ज़रूर याद है के बहुत छोटे थे तब शुक्रवार को शाम साढ़े सात बजे चित्रहार आता था और उस पर गाने बजते थे रंगोली की तरह। गाने तो खूब आये पर याद एक ही रहा, 'तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त..!!'

तब न स्त्री विमर्श के इर्दगिर्द फटकने की कोई गुन्जायिश थी, न कोई दिली तमन्ना। न कोई बाध्यता, न दबाव। लडकियाँ साथ वाले स्कूल में लड़कों के संग पढ़ती थीं और हम बेचारे लड़के उनके इंतज़ार में पागल होने के बजाये शुतुरमुर्ग की तरह किताबों में मुँह गढ़ाए रहते। न तब ट्युशन पढने की ज़रूरत महसूस हुई न कभी किसी धार्मिक लड़की को शाम छह बजे बिरला मंदिर बुलाया। बुलाता कैसे यहाँ न कोई बाज़ार लगता था, न उसे कभी उसकी माँ सब्जी लेने अकेले उद्यान मार्ग भेजती। वो तो भला हो साईं मंदिरों का जो संगतराशन गली जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में कोना किनारा ढूंढ़ कर अपना छत्र खुद ही डाल लिया लिया करते हैं। और शुकर हो भैयाजी जैसे कोचिंग सेण्टर वालों का जो लड़का लड़कियों को साथ नहीं पढ़ाते। शायद प्रेम की समझ में हमसे बीस ही होंगे तभी ऐसी व्यस्था रखी।

इससे एक तो फायदा यह हुआ कि माता पिता को अपनी बेटी भेजने में कोई खतरा महसूस नहीं होता, वो बात अलग है के ऐसे खतरे कुछ ही परिवार अपने बेटों के संदर्भ में करते रहे होंगे। खैर, दूसरे ये के उन लड़के लड़कियों को इस बहाने घर से निकलने की आज़ादी अबाध रूप से मिलती रहने की गारंटी मिलती रहेगी। यह प्रेम के लोकतंत्र जैसा ही है जहाँ हरी वर्दी के लड़के आराम से पीली बिल्डिंग की लड़कियों से बेरोकटोक बखटके पहाड़गंज के किसी कोने किसी छह टूटी चौक पर आराम से मिल सकते हैं। माँ को भला कैसे पता होगा के जो लड़का उनकी लड़की की कलाई पकडे उस पर मेहँदी लगा रहा है वह इतने सस्ते दाम पर कैसे तैयार हो गया??

जिनकी माएँ अपने लड़के लड़कियों के अधार्मिक हो जाने इस कलियुग के प्रभाव से चिंतित हो उठी थी उन्ही के लिए मनमोहन देसाई  की 'अमर अकबर एंथनी' से सीधे प्रकट होकर शिर्डी वाले साईं बाबा उन्हें पार लगाने आ गए हैं। मतलब जिन्हें ट्युशन में फ़ीस देना फ़िज़ूल खर्ची लगता है और गोलगप्पों टिक्की भल्ले पापड़ी पर खर्च करना बेहतर विकल्प है तो वे सब वीरवार को स्पेशल संध्या में अपने संगी से सात बजे वाली शिफ्ट में मिल सकते हैं। बे खतरा। बे निगरानी। कोई लड़का मिला भी तो छुटकी कहेगी वहीँ कोई होगा। कोई शक भी नहीं करता। कर भी लेंगे तो क्या फ़र्क पड़ना है।

प्रेम तो सहचर्य से ही उत्पन्न होगा न। नर का मादा के प्रति, मादा का नर के प्रति। प्रेम एक दूसरे को आत्मसात करने का नाम है। कब किसी गली के किस मोड़ पर कितने बजे मुलाक़ात होगी यह सिर्फ उस एक पुर्जे पर लिखा मिलता है, जिसके नीचे अनाम मोबाइल नंबर भी लिखा होता है। यह आत्मसातीकरण की प्रक्रिया बिलकुल उसी क्षण नहीं प्रारंभ नहीं होती। इसे सूत्र पीछे जाते जाते हैं। उन विज्ञान के पाठों की तरफ जहाँ मनुष्य के पुनरुत्पादन का सचित्र वर्णन होता है। वर्जनाएं सिर्फ वहीँ कक्षाओं के भीतर नहीं टूट रहीं, उन सबके जेबों-मोजों-बस्तों में रखे मोबाईलों में दस सेकंड की क्लिप में भी उतने धीरे से चुपके से टूट रहीं हैं। उस चारदीवारी में दो पालियों में चलते विद्यालयों में सबसे ज़यादा इसमें सेंध लगायी है। यदि वे दैहिक ही है तो यहीं। बिलकुल इसी पल। जब आखिरी घंटी के बाद लड़की हॉल में लड़के का इंतज़ार करती है।

त्रासदी कहकर दुःख मनाने के बजाये इस पर थोड़ी देर ठहर होगा। सोचना होगा। इसे स्वीकारना होगा। शयद थोड़ी देर बाद कोई इसे प्रेम भी कहना स्वीकार न करे, पर उन पदों से ज़यादा महत्वपूर्ण है इन पर विचार करना।  यह हमारी पीढ़ी की अलीशा चनॉय और मिलिंद सोमन के 'मेड इन इंडिया' से आगे जाकर इमरान हाशमी, मल्लिका शेरावत, सनी लियोन के बॉलीवुड फिल्मों में आ जाने के साथ हनी सिंह का भी है। इन्हें भी बड़े ध्यान से पढ़े जाने की ज़रूरत है। यह मस्तराम की पीली सस्ती किताबें अपने बस्तों में शीला सिनेमा के पास वाले पुल से नहीं लाते बल्कि बीस-बीस तीस-तीस रुपयों के सिम कार्डों और मेमरी कार्डों के साथ स्कूल के दरवाजों से अन्दर दाखिल होते हैं।

इसे सिर्फ सरकारी और निजी विद्यालयों में पढ़ने का मसला नहीं माना जा सकता बल्कि यह उससे आगे जाकर हमारे समाज के इतनी तहों में होना का प्रतीक ज़यादा लगता है। जहाँ वे स्वतंत्रताएं अपने आप ले ली गयी हैं जिन्हें उम्र विशेष आने पर सामाजिक संस्था में प्रवेश करने के बाद मिलता था। समाज अगर इतना ही सरल होता तब न तो बलात्कार की घटनाएँ कभी होती, न किन्ही संबंधों को अवैध बोला जाता और न इसपर क़त्ल करके इतना खून बहाया जाता, न हमारी कुंठाएं अपरागम्य सम्बन्धी अपशब्द बनकर हमारी भाषा का अनिवार्य अंग होते। इन्हें बोलना जितना आसान है उसी समानुपात में अब यही पीढ़ी उसे व्यवहार में लाकर उसके साथ प्रयोग कर रही है।

समझना ज़रूरी इसलिए भी है क्योंकि अगली बार किसी प्रायमरी क्लास के छात्र द्वारा बलात्कार की घटना अखबार में पढ़ कर आश्चर्य का भाव उसे छिपा न ले जाए। और उन लड़कों को भी ध्यान से सुने जाने की ज़रूरत है जब सरकारी पैसे मिलने के बाद जब वे अपनी पिछली बीती रात जीबी रोड बिता कर आने की बात कहें तब हमारा मुँह खुला का खुला न रह जाये।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बंधू फाक है जरुर है और वो ये है
    कि पेट पूजा भी जरुरी है
    क्योकि भूखे पेट ना तो स्कूल में पढाई होगी
    और ना ही शाम को सात बजे साईं का भजन
    समझे
    खा लेने दो इन्हे
    गोल गप्पे और टिक्की भी
    ठीक है

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    उत्तर
    1. हाँ थोडा बहुत तो मैंने भी सोचा के जब दोनों को एक दुसरे को जानने बुझने के मौके यह समाज ऐसे ही देना चाहता है या खुद इनसबने उसे ले लिया है, ठीक ही किया। कुछ हक ऐसे लेने ही पड़ते हैं। उम्र का तकाज़ा भी यही कहता है। किताबें, चारदीवारी कब तक उन्हें रोक कर रखती..

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