दिसंबर 11, 2012

किसी टहनी पर बैठा है 'अँधेरा'

अँधेरा। अखिलेश की चार कहानियाँ हैं। सबसे पहले 'वजूद ' पढ़ी। वैधजी-रामबदल की मौत-जयप्रकाश का गू में लिथरी अपने बाप की लाश को हगनी गढ़इया से भैंस पर लाद कर लाना। उसी शाम उसकी माँ जानकी की मृत्यु। दोनों को हत्या कह सकते हैं। और थी भी। कहानी ख़तम होती है तीसरी हत्या पर। जब जयप्रकाश के औषधीय ज्ञान की कीमत लगाने शहर की दवा कम्पनियां आयीं थीं। इन सब कठोर चीजों के अलावा वहां आईना था। खुशबू थी। और इतनी तेज़ चीख़ थी कि आसपास की टहनियों पर बैठे परिंदे उड़ गए। बछड़ा भागता दौड़ लगाता पाया गया।

इतवार दरियागंज जाने से पहले 'अँधेरा ' पढ़ी। फैजाबाद का दंगा तब तक हो चूका था और तारीख थी अट्ठाईस। वहाँ की कोई भी खबर मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं बना पाई। जैसे कहानी के दोनों चरित्र फिर कभी दिखाई नहीं दिए। दंगे के पहले की अफरातफरी- अफवाहें- बदहवासी सब कर्फ्यू की धारा एक सौ चवालीस तक आते आते और भयावह हो जाती है। रेहाना मुसलमान थी और ज्ञानरंजन हिन्दू। कैसे एक मुसलमान लड़की का हिन्दू मिथकीय ज्ञान उस रात उसकी जान बचाता है, यह हमारा धार्मिक उन्माद ही है जब हम अपने जैसों की तलाश पहचान करने के लिए उनका हिंसक प्रयोग करते हैं। नायक साइबर कैफ़े वाले से यह नहीं कह सकता कि इस दंगे की छाया वाले समय में उसकी प्रेमिका बुद्धा गार्डन के गेट पर उसका इंतज़ार कर रही होगी। बहाना बनता है पिता की बिमारी का और पिछले दरवाज़े से उसे कैफ़े मालिक निकाल देता है। बिलकुल यही क्षण मो.आरिफ़ की कहानी 'चोर सिपाही ' की तरफ ले जाता है। दोनों में अभी समानता दोनों का समानधर्मा होना है और दोनों कहानियों के प्रेम कहानी हो जाने की पूरी सम्भावना..

'यक्षगान ' में छैलबिहारी का मिथकीय अभिनय सरोज के प्रेम को बेल चढ़ाता है। उसके घर से भाग जाना संभावनाओ-अफवाहों को सूत्रबद्ध करना बिलकुल उसी रूप में दिखाई पड़ता है जैसा हमारे समाज के पुरोधा स्त्री के कंधो पर यौनिकता को लाद ठेलते रहते हैं। फिर उन कथित प्रेमियों के कारण ही उनका यौनशोषण होता है और वे सब हमारे समाज में उसी तर्ज में राजनीति-मीडिया-कयासों में कहीं खो जाती हैं, पाठक यानी के मैं उसे खोजने की कोशिश भी किताब की दूसरी तरफ बैठ कर करता हूँ आगे जाकर, उसमे भागीदार बनकर, नहीं। और तत्क्षण एक तर्क मेरी बगल में उगा दीखता है जहाँ खुद को इस समाज में उसी की तरह बेबस शक्तिहीन कुछ भी न कर सकने में अक्षम बन खुद को समझा लिया करते हैं। और हद यह कि अब तो बोल भी नहीं पा रहे सिर्फ लिख पा रहे हैं।

यहीं उनकी उदय प्रकाश की 'आचार्य की कराह ' याद आती है। फिर बिलकुल इसी मुठभेड़ में पंकज सुबीर की 'ये कहानी नहीं है '। शायद कहानियों का नया-नया पाठक हूँ इसलिए बार-बार पीछे गुज़रे पन्ने यूँ ही याद आ जाया करते हैं और एक एक कर लगता हूँ देखने क्या कुछ मिल रहा है उन सबमें। कल इस कहानी संग्रह की जमानत का आखिरी दिन है। किताब लौटानी होगी। सिर्फ एक बची है 'ग्रहण '। सोचा था निपटा लूँगा। पर हर बार सोचा होता कहाँ है। कभी वक़्त नहीं मिलता, तो कभी मन नहीं बन पाता.. पर देखते हैं कब..
02/11/2012

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