दिसंबर 22, 2012

क' ख' फेसबुक संवाद सन्दर्भ: दिल्ली बलात्कार घटना

यह संवाद जिसे तकनीक की भाषा में चैट कहते है दो दोस्तों के बीच फेसबुक पर हुई बातचीत है। एक दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना से उद्वेलित है जबकि दूसरा थोड़ा शांत बुझा बुझा सा लगता। कई सन्दर्भ है बाते हैं व्याख्याएं है पर अभी उन्सबसे बचते हुए सिर्फ यही। बिना किसी लागलपेट। 

चलते चलते यह भी लिख ही दूँ के यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है के यह और दोनों पुरुष हैं। देश की राजधानी में रहते हैं। और आमने सामने जैसे तर्क वितर्क और उभर सकते हैं यहाँ उस माध्यम की सीमा में पढ़ा जा सकता है। कानून समाज राष्ट्र लिंग आदि इत्यादि उपबंधों में दोनों घूम रहे हैं..

बस तारीख बता दूँ इक्कीस दिसंबर और बज रहे थे आठ बजकर आठ मिनट। और अंतिम संवाद के समय घडी के कांटे नौ बजने में सात मिनट कम बता रहे थे।

क. इलाहाबाद कैसा है..??

ख. इलाहाबाद एकदम बढ़िया। गैंग रेप की गूंज वहां की सड़कों पर भी काफी है।  

क. उस लड़की की मृत्यु हो गयी न..

ख. सुनने में तो यही आ रहा है। लेकिन मीडिया में अभी तक ऐसी कोई हलचल नहीं है।

क. इतना विभत्स बर्बर था।

ख. हालत ठीक नहीं है।

क. क्रिटिकल। पांच सौ से ज़यादा तो सर्जरी हो चुकी हैं उसकी..

ख. सच कहूँ तो रेप की ये पहली घटना है जिसने इतना हिला दिया है। पता नहीं क्यों? कुछ करने का मन कर रहा है लेकिन कर नहीं पा रहा। 

क. पहली बार कोई खबर इस तरह से छाई है वर्ना बलात्कार इस समाज में न होते हों ऐसी बात नहीं है। तिल तिल कर मरने वाली त्रासदी है इनका उन स्त्रियों के साथ रोज़ होना।

ख. इससे पहले भी कई खबरें पढ़ी सुनी, कुछ दुःख और अफ़सोस भी हुआ लेकिन इसका आघात कुछ से बहुत ज्यादा लगा।

क. मैं तो घोषणा करने वाला हूँ के पुरुष होने के नाते यह कह रहा हूँ के किसी महिला स्त्री के साथ कभी बलात्कार जैसी किसी घटना में संलिप्त नहीं होऊंगा, न ऐसी कोई कोशिश करूँगा। बस कम से कम अपनी तरफ से यही कर सकता हूँ, फिलहाल अभी तक..

ख. अब भी मृत्युदंड न मिला तो अरब देश भले।

क. मृत्युदंड इसका हल कभी नहीं हो सकता। न किसी समस्या का वह हल है..

ख. ऐसा तो कोई भी मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति नहीं करेगा लेकिन जो कर रहे हैं उनका क्या करें। ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते न उनको। तो हल बताओ?

क. यह समस्या से बचने का चोर रास्ता है, उसकी जटिलता को समझना होगा और कुछ जिम्मेदारियाँ अपने अपने हिस्से लेनी होंगी..एक पुरुष, एक स्त्री, एक माता, एक पिता, एक शिक्षक, एक नेता आदि इत्यादी की जटिल भूमिकाओं से गुज़र कर ही कोई रास्ता मिलेगा..

ख. इन लम्बी प्रक्रियाओं में कई और इस बर्बर मानसिकता की भेंट चढ़ चुकी होंगी।आप आज बलात्कार का दोष सिद्ध होने पर दोषी को तत्काल गोली मरने का क़ानून बनाइये कल रिजल्ट देखिये।

क. पर ऐसी त्वरा उद्वेलनों में धैर्य से सोचने समझने की ज़रूरत है और ऐसा नहीं है के तब तक हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें। कम से कम सत्ता में बैठे लोगों को अपनी जिमेदारियों को लेना ही होगा। यह दंड देना इंस्टेंट फ़ूड की तरह है जो हमें उन्ही बर्बर समाजों की तरफ ले जायेगा और हम कहीं जा नहीं सकेंगे। कानून उसका एक पहलु है, समाज उससे कहीं जीवंत तंतुओं से बनी संरचना है।

ख. ये एकपक्षीय नहीं हो सकता, सिर्फ सत्ता में बैठकर ही इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता। रही बर्बर समाज की ओर लौटने की बात तो अभी भी हम सभ्य समाज में नहीं हैं।

क. मैं उसे एकपक्षीय कब कह रहा हूँ। मेरा कहना है जब तक उस लम्बी प्रक्रिया को हम वास्तविक रूप देते हैं उसमे अपनी भूमिकाओं को समझते हैं तब तक के लिए सत्ता को अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। लेकिन कोशिश तो ही करनी है उसे वहां से आगे लेजाने की।

ख. जो भी हो मुझे इस जैसी समस्याओं का तत्काल हल मिलने की जल्दी है। 

क. पर वे जितनी सरल लगती हैं उतनी हैं नहीं..

ख. लेकिन समाधान तो खोजना ही होगा एक और काण्ड होने से पहले। या इंतज़ार करें किसी और के विक्टिम बनने का, समस्या की जटिलता का बहाना बनाकर। अब इसके लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं हो सकता।

क. तो जो क़ानूनी रूप से जो हो सकता है उसके साथ नागरिक सक्रियता की भी तरफ जाना होगा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. इंतज़ार कष्टकारी है पर उन इंतज़ार की घड़ियों में हमने जिस समाज की परिकल्पना की है उसे बनाने में अपनी-अपनी भूमिकाओं को चुन लेना है या खुद को उनमें संलग्न कर लेना होगा। और जैसे आज जनसत्ता में अरविन्द दास 'पाश' को यादकर कहते हैं ‘हम लड़ेंगे/ कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता/ हम लड़ेंगे/ कि अब तक लड़े क्यों नहीं/ अपनी सजा कबूलने के लिए/ लड़ते हुए जो मर गए/ उनकी याद जिंदा रखने के लिए। हमें भी उस उदास मौसम के खिलाफ डटे रहना है।

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    2. हमेशा की तरह विमर्श के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाया।

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    3. नहीं बदल पाया ऐसा कैसे कह सकते हैं। तुम अभी भी सोच रहे हो, ऐसे ही कहीं न कहीं इस तरह की बातें अभी भी हैं। समाज ऐसे ही अपना काम करेगा, धीरे धीरे। बदलाव काफी लम्बी प्रक्रिया है दोस्त।

      इतनी जल्दी कैसे बदल जाएगा सब, हमें बदलनी होगी अपनी संस्कृति। आज नाग पंचमी है और अपनी तरफ़ आज के दिन 'गुड़िया' मनाते हैं। उस लोक में उन लोक कथाओं के सन्दर्भ भी तो बदलने चाहिए। गुड़िया को पिता जा रहा है और आगे आने वाले दिन में उसी से राखी बंधवा कर उसकी रक्षा वाला वादा करेंगे। सब गड्ड मड्ड है।

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