दिसंबर 31, 2012

दिन आखिरी

पूरा दिन मानसिक रूप से खुद को तैयार किया के अन्दर से आज महसूस हो कि साल ख़तम हो रहा है। कुछ था जो इस तारीख का इस साल का इस पार ही निपटा लेना चाहता था। नकली चाँदी के वरक की तरह ही सही पर था जो नया सा तो लगे। यही सोच चांदनी चौक डीपीएल लाइब्रेरी पुरानी किताबें लौटा आया। 'अंत में प्रार्थना..' भी। पंकज सुबीर की 'ईस्ट इंडिया कंपनी  'भी। जबकि अभी दोनों को पूरा ख़त्म नहीं किया था। दूधनाथ सिंह की 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ' भी एक कहानी पढ़ जमा करवा आया।

साल भर जो सोचता रहा था के नया पैन लाऊंगा, उसके लिए यही दिन चुना। दो कलम ख़रीदे। उनमे एक चीनी फाउनटेन पैन है दूसरा भारतीय कंपनी का। पैदल ही हौज़ क़ाज़ी पहुँचा। चावड़ी बाज़ार होते होते। आज राजीव चौक से बाहर निकलने दे रहे थे। शनिवार की तरह बंद नहीं था। शिवाजी स्टेडियम जो कॉमनवेल्थ खेलों के लिए बनाया जा रहा था अब तक बन ही रहा है और उसके लिए इस टर्मिनल का जो हुलिया बदला है उसमे आज सिर्फ हापुड़ गाज़ियाबाद जाती खटारा बसें बची हैं और गिरिराज बुक स्टाल। इसी स्टाल पर स्टीकर विज्ञापन की शक्ल में है जोकि इंडिया टुडे का दिया हुआ है। इस पर भी कब से लिखना चाह रहा हूँ पर टालता जा रहा है आज की तरह।

वहां से सात आठ पत्रिकाएं उठा लाया। पर आदत वही, पन्ने पलट कर किनारे। उनको न सिराहने रखना न बाद में चुने के मौके निकलना। एक हद तक खुद को दोहराते-दोहराते तंग भी आ गया हूँ। सोच रहा था इस वाली आदत को वहीँ तारीखों में दफ़न कर दूँ। पर लगता नहीं है के आसानी से होगी। उन तीस वाले इतवारी अखबारों की तह भी खोलकर नहीं देखे अभी तक..

ये सब क्या लेके बैठ गया..यहीं छोड़ते हैं..वहां से एक बजे करीब नौ सौ नब्बे पकड़ थाना मंदिर मार्ग उतरा। पप्पू दूकान से चिप्स लिए। कनेडियन कंपनी के। सैफ 
ली वाले। इन्डियन मसाला। फिर वक़्त तो था ही और शर्टें मम्मी ने भिगो दी थीं। पाँचवी खुद ही डुबो दी। अभी आगे दो तीन सुबहों तक वे सारी वहीँ तारों पर टंगी सूखने की कोशिश में लगी रहेंगी। बहरहाल। खाना खाया। बैठ गया। साढ़े चार पौने पाँच हुए होंगे, अन्दर से कुलबुलाने लगा। आ गया ऊपर यहाँ।

सोचने लगा बीते साल को तरतीबवार करीने से रखता चलूँगा। उन बातों को छुऊँगा जिन्हें या तो स्पेस नहीं मिल पाया या फिर भागमभाग में कभी लिख ही नहीं पाया या उन्हें जगह दूंगा जो दिल के आसपास मौजूद रहते हैं। कुछ तो ऐसा होगा ही न पूरे साल में। फिर जो बैठा तो बस चिपक सा गया। पर मैराथन नहीं। थोड़े थोड़े हिस्सों में। ब्लॉक या फांक बना बना कर एकएक को निपटाते चलने की सोचकर। कुछ देर बाद अपना ही लिखा पढ़ता तो लगता के इसे लिखने बैठा हूँ?? पर जैसे जैसे दिन बीतेंगे तब महसूस होगा मामूली ही सही पर थे तो अपने ही हिस्से।

शाम रात सबकुछ लिखा जो लिख सकता था। पर साल भर में देखी फिल्मों पर कहीं से मौका ही नहीं निकल पाया उद्वेलनों भावों के अतिरेकों में वह पीछे ही छूटता गया। जबकि कलतक इस दिन को लिखने की सोच रहा था तब भी ख़याल था के पहले सिनेमा पर लिखूंगा तब इस पर आया जायेगा। पर खैर। आगे कभी..

{जारी..}

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