जनवरी 24, 2013

सीधे एग्जामिनेशन हॉल से

दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का दूसरा पन्ना

पता नहीं सुबह आते वक़्त क्या सोच रहा था। शायद बाहर निकलते ही सड़क पर क्रिकेट खेलते उन बच्चों को देख कुछ कौंधा होगा। कि पीछे कुछ महीनों की दरमियानी में यहाँ की आबोहवा को जितना पास से देख जान सका हूँ उतने में यह तो पता ही चला की शिक्षा का मिथक धीरे-धीरे और टूटेगा। मिथक इस रूप में कि पढ़ लिखकर नवाब बनाने वाली सारी व्यवस्थाएं या तो पहले ही नहीं थीं या जिनका भरोसा उसके ऐसा कुछ कर दिखाने से है तो वह और सतह पर आ जायेगा। कि यह विशवास एक तरह का नवसामंती विशवास ही है। रत्ती भर भी इससे ज़यादा नहीं।

यह सारे विचार अगर कुछ भी सम्प्रेषित नहीं कर पा रहे हैं तो इसका एकमात्र कारण मेरा इस कमरे में होना है, जहां बैठ कर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। इतना लिखने के दरम्यान ढाई तीन बार उठकर चीखना चिल्लाना पड़ा है। अगर मैं बता दूँ के यहाँ बारहवीं क्लास का प्री-बोर्ड का इम्तहान चल रहा है तो कई शिक्षाविद 'अध्यापक' की इस 'बदलती भूमिका' पर कुछ सोचने से पहले वहाँ हो रहे पर्चे की 'वैधता' पर सवाल उठायेंगे। पर क्या करूँ यह सब जो लिखा है सब सच है। चाहते हुए। न चाहते हुए।

पहले पहल बड़ा अजीब सा लगता था अब शायद आदत हो चली है। इस लिजलिजे गिजगिजे वातावरण में अपने को बचा कर रखने की जद्दोजहद कुछ ज़यादा ही करनी पड़ रही है। खुद को ढालना नहीं है पर उसी में सहना-रहना है। बिन भागे। भागने वाले सारे रास्ते फिलहाल बंद हैं। उन सारे आदर्शों में व्यवस्था लगातार पुराने अर्थों की आत्मा से निकल नए की तरफ कूच कर गयी है। इस कमरे में सैद्धांतिक स्तर पर परीक्षा हो रही है। परचा बाहर से आया है।

थोड़ी-थोड़ी देर बाद असहनीय हो जाती स्थिति से बचने के लिए कुछ-कुछ अंतरालों में दरवाज़े पर ऐसी घुटन से निकल बाहर खड़े हो जाते हैं। लगता है थोड़ी देर के लिए ही यह सब हमारी आँखों के सामने नहीं हो रहा है। दूसरे तीसरे शब्दों अर्थों में पलायन और अध्यापक शब्द के चुक जाने जैसा भाव भी घेर ले, तो भी कुछ नहीं कर सकने की कसमसाहट लिए अन्दर दाखिल हो जाते हैं। फिर होता यही है के गालियाँ अपने को पुनःपरिभाषित करती हैं और नामों के स्थानापन्न की तरह इस्तेमाल होती सुनी जा सकती हैं। इसके परम्परागत रूप में भी कईयों की माताएं बहनें इस कक्ष में बराबर उपस्थित रहती हैं।

मेरी, मेरे साथ अजय की सत्ता सिर्फ और सिर्फ व्यव्स्थापक की है और इस पूर्वधारणा के साथ इस कमरे में आये सारे लड़के इस पर्चे को कर रहे हैं। करवा भी रहे हैं। इस लिहाज से यह उत्तरआधुनिक कक्षा है जहाँ 'सपुस्तक परीक्षा' (ओपन बुक एग्जाम) से पहले के प्रयोग इनके कर-कमलों द्वारा संचालित हो रहे हैं। एक की शीट किन-किन हाथों से होते हुए आखिर में हमारे पास पहुचेगी। इन्हें शायद पता नहीं है, न ही कभी आदत जैसी व्याधि से ग्रसित हुए कि ऐसी परीक्षाएं इनके बौद्धिक-भाषिक कौशलों का परिक्षण है। इनकी समझ में यह सिर्फ एक विशेष संख्या वाली मद को पारकर इस कक्षा से लांघने की व्यवस्था भर है। जिनके बाद इन सबको बारहवीं पास मान लिया जाएगा।

कभी-कभी बीच में तकरीरे भी हो ही जाती हैं और हर बार यहीं आकर वो सारे हमें लाजवाब करने की गरज से कहते पाए जाते के इतनी सख्ती तो बोर्ड में भी नहीं होने वाली सरजी! वहां तो पाँच-पाँच सौ रुपये देंगे और पास हो जायेंगे। पर उन्हें खुद नहीं पता कि अगर सच में ऐसा होता भी है तब उनकी क्लास में पिछले साल के फेल छात्र क्या कर रहे हैं? तब एक उठता है और कहता है, 'सरजी! वो तो उस प्रिंसिपल की हमारे प्रिंसिपल से ठन गयी थी। वरना पास तो पिछली बार में ही हो जाते।

लगातार इन्ह तरहों की नक़ल करती कक्षाओं में नहीं समझ पाता के अभी भी 'पास' हो जाने में ऐसा क्या है? जब इन सबके पास उस किताब के अक्षरों का भी अता पता नहीं मालूम- शायद यहाँ मैं गलत हो गयी, खारिज हो गयी बात की बात कर रहा हूँ। शायद इसे ही अपने मूल्यों को घसीटना भी कहते हैं। यहाँ यह सवाल बेमानी सा है के परीक्षा को लगातार कमज़ोर किया जा रहा है और साल दर साल इन चारदीवारियों से निकलती भीड़ की भीड़ का कोई भी अर्थ नहीं है। एक अर्थ में सत्ता इन्हें कहीं का भी नहीं छोड़ती। जो रहे सहे परम्परागत कौशल इस समय अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहें हैं, उनसे भी यह पीढ़ी दूर होती जा रही है। यह रोना नहीं इस नवउदार व्यवस्था के सह-उत्पाद में अपने जीवन को दीर्घजीवी बनाये रखने की एक युक्ति ही ज़यादा लगती है।

समझ नहीं आता के राजेश जोशी की कविता क्यों बच्चों को काम पर जाता देख उदास हो जाती है? उन्हें शायद किसी ने गलत स्कूल का पता बता दिया होगा। जहाँ से निकले बच्चे, बच्चे नहीं कुछ और ही होंगे। अभी एक अपने हाईटेक सैमसंग मोबाइल से एक थोड़ा पढ़ लिख गए बच्चे की आंसर शीट की तस्वीर उतार कर पानी सीट पर जाकर बैठ गया है। वहां 'ज़ूम' कर उस तस्वीर से नकल करेगा। सवाल यह उठता है फिर हम वहां क्या कर रहे हैं हमारी ज़रूरत क्या है? यही सवाल तो अपने से भी कर रहा हूँ। पर कुछ समझने लायक बात आती इससे पहले ऊपर आसमान में छब्बीस जनवरी की परेड में उड़ने वाले लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट से नीचे ज़मीन से एक मंज़िल ऊपर इन बच्चों को कौतुक से नहीं नहीं गालियों की बौछारों से भर दिया है। पता नहीं यह सब क्या कह डाला। खिड़की से नीचे मैदान में 'खिलाड़ी 786' का 'बलमा' गाना बज रहा और ये सब कह रहे हैं आज 'गोट्टेया' इस पर नाचेगा।

11:23 A.M.


{आज तारीख़ चार फ़रवरी, दो हज़ार तेरह।  'जनसत्ता 'के 'समांतर 'में यह ब्लॉग पोस्ट 'नाम की परीक्षा ' शीर्षक के साथ आई है। वहां पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएँ..}

1 टिप्पणी:

  1. कमोबेश हर दिहाड़ी शिक्षक की यही पीड़ा है, सभी लगभग एक जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझ रहा इससे निकलने का।

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