जनवरी 02, 2013

रात आखिरी

पीछे से आगे..

लिखने के बीच मोहित का हॉल्ट भी आया। के पापा नॉर सूप नहीं मैगी के मिक्स वैज सूप लाये हैं। चालीस का एक। तब थोड़ी देर बाद रुक गया। ग्यारह बजे की बात थी। दस मिनट पहले ही लिखना रोक दिया। इस बार कुर्सी को छत से नीचे नहीं कुदाना था। अब तो गार्ड भी यही रहते हैं यहाँ। मोहित सीढियों के वहां जहाँ हर्षवर्धन के पापा साइकिल रखते हैं वहां से एक टूटी फूटी कुर्सी उठा लाया।

ऊपर तसले में आग लगायी जाएगी, यह पहले से ही तय कर लिया था। पहले धोबी पछाड़ से राजकुमार ने कम, मोहित ने ज़यादा कुर्सी का कचूमर निकाल, उसे लकड़ी में बदल दिया। उसका स्वरुप विखंडित कर दिया। कोई वैसी ही कुर्सी दोबारा बड़ी मुश्किल और महारत से अपना वक़्त खर्च करके ही बना सकता था। पर इतनी जटिल प्रक्रिया के लिए उसे खंड खंड तोड़ा नहीं था। हमें तो उसे जलाना था। इसलिए हम निश्चिंत थे। 

उसमे फोम तो था ही, जलने में रबड़ जैसी गंध दे रहा था। उसका सहारा पाकर जल्द ही उस ढेर ने आग पकड़ ली। फूँकने धोंकने पंखा बना करने कागज़ ढूंढने की नौबत नहीं आई। रामकुमार थोड़ी देर बाद फोन पर बुलाने के बाद आया। बैठे बात करते करते विश्लेषण होते हवाते साढ़े ग्यारह बज गए। अब आठ पैक वाली मैगी भी बना ही लेनी चाहिए। यही सोच विचार कर मोहित को कढाई लाने के लिए कहा। घर से। पानी के साथ।

पर दिक्कत ये के कैसे उन पहाड़ीनुमा उबड़खाबड़ लकड़ियों पर जलते तसले में कढ़ाई को टिकाया जाये। तत्काल कुछ आड़ी तिरछी बिदुरी हुई लकड़ियों को निकाल कर किनारे कर दिया। जगह बना कर उसकी पेंदी को टिका दिया।। और यही कामना करने लगे के कहीं कढाई हिल न जाये। अब रसोई विमर्श यहाँ आकर रुक गया के मैगी मसाला पानी उबलने के साथ ही डाल दें या मैगी डालने के बाद। पहला विचार विजयी हुआ। पानी खौल रहा था। बुलबुले उठ रहे थे। आग भड़की हुई थी। मसाला पानी में मिल रहा था।

कढ़ाई का वो हाल न हुआ होता अगर उस गैस स्टोव का परिक्षण उसी समय करने के बजाये पहले ही शाम को कर लिया जाता। दो ढाई किलो गैस तो होगी ही। ऐसा मोहित ने कहा था। हम आश्वस्त भी थे के चलो ठीक है। पर उसके कान ऐठने के बाद भी सिर्फ हवा के अन्दर ही अन्दर पाइप से टकराकर गुजरने की आवाजें ही बाहर आयीं। गैस नहीं। और न उस रात को अपनी ज़िंदगी की आखिरी शब बनाने की ही कोई मुकम्मल दरहम बरहम फैसला किया था। इसलिए तुरंत उस सिलेंडर बर्नर को किनारे कर दिया। लौट आये तसले पर।

इन सारी बातों को पढ़ते वक़्त ये न सोचें कि एक क्षण के लिए भी ठण्ड हमसे अलग हुई होगी। खुले आसमान के नीचे। छत पर पांच लड़के मैगी बना रहे हैं। हम सब जहाँ बैठे थे उस तसले की गोल परिधि के एक निश्चित दायरे में तापमान ज़रूर पांच आठ डिग्री कम होगा। लेकिन जैसे जैसे लकडियाँ जलकर राख में बदलती गयीं वैसे वैसे ठण्ड जो अभी तक हमारे पीछे पीठ की तरफ दुबकी थी अब सर उठा कर अब आगे आ चुकी थी..हम सरक कर उस आग वाले तसले की तरफ और खिसकते जा रहे थे। अपने आप। 

बीच बीच में मोहित कढ़ाई के लगातार धुएं से काले होते जाने के बाद अगली सुबह की त्रासदियों से घिर जाता। हम ढाढस तो क्या बंधाते, मज़ाक जैसा ही उड़ा रहे थे। के हम भी धोने में हाथ लगा देंगे। अगर गैस जल जाती तो ये हाल न होता। दूसरा कोई बर्तन पहले से काला होता तो और पता नहीं क्या क्या। मैंने सूप बनाने वाले कर्यक्रम को इसलिए भी रद्द करने की बात कह दी। पर नहीं। बनाने की पहले से ही ठान चुके थे। रामकुमार बोल मोहित सोच रहा होगा के आज रात को कभी याद कर यही सोचेगा की किसी ढाबे पर काम कर रहा था। बार बार कभी चम्मच प्लेट कभी कांटे कभी पानी कढ़ाई के लिए दौड़ाये जा रहे हैं। चैन से बैठने नहीं दे रहे।

फिर बात घडी पर आ कर रुकी। दो मिनट हैं तीन मिनट हैं। सबकी अलग अलग वक़्त बताती मोबाइल डिजिटल वॉचें। पर एक एक कर सबने बारह बजा दिए। कुछ दिवाली वाले पटाखे अब छोड़ रहे थे। दूरदर्शन ने सुनामी के बाद इस साल राष्ट्रीय शोक मनाते हुए तब राजेश खन्ना की मृत्युबोध की छाया वाली आनंद दिखाई थी। इस बार अपने नए साल के सारे विशेष कार्यक्रम अपराजिता निर्भया अमानत की सिंगापूर में मृत्यु के कारण रद्द कर दिए थे। मैसेज भी कम ही आये। हमें दो हज़ार तेरह में आये एक दो मिनट हो चुके थे पर इसका मुगालता न पहले था न तब, के कुछ भी बदला है सिवाय गिनती में एक और साल के जुड़ जाने के। हमारी सलाहियत के लिए ही है। खैर।

तुमने कहा था देखते हैं कौन पहले फोन करेगा। बारह बज कर चार मिनट पर इधर से नंबर मिलाया। के अब तक तो वहाँ सब सो गए होंगे। एक दो घंटी बाद फोन काट दूंगा। पर वहाँ सब जाग रहे थे। 'स्टार परिवार' देख रहे थे। शुभम को भी बुखार था। दवाई ली है। राकेश ने इस बार फोन नहीं किया। फोन घरघराया होगा। तुम स्कूल में अकेले थे। बिहू भी नहीं है अभी वहां। ओ' हेनरी की कोई कहानी पढ़ रहे थे तुम। नाम अभी याद नहीं आ रहा। भाई तब कढ़ाई धो रहा था। फिर अजय को फोन खड़काया। रजाई में लेटा टीवी देख रहा था। फिर सोचा के अभी रत में नहीं कल बात करूँगा। पर राजकुमार ने तो रिकॉर्ड ही तोड़ दिया। पंद्रह अट्ठारह लोगों को नींद से जगाकर उठाया और बोलता सो तो नहीं रहे थे सर!!

कई सालों बाद यह रात आई थी जब हम बाहर आग जलाकर बैठे थे। उस बीच गंजी - शकरकंद रह ही गयी। मूंगफली रेवड़ी की बात आगे कभी के लिए दिमाग में रख ली गयी। एक बीस अन्दर कमरे में रजाई सोझा रहा था। मोबाइल इतना ही बजा रहा था तब। तसला वहीँ बाहर जल रहा था। ठिठुर रहा था। ज़मीं के चिटकने के डर के बिना। एक छोटा सा वीडियो भी यू-टयूब पर भी डाला। लास्ट विडियो :2012 ग्यारह चालीस के आसपास का। उसमे जो गाना बज रहा है वो एफ़ एम के किसी चैनल से है, जो उस वक़्त बज रहा था। हमारा स्पेशल इफेक्ट नहीं।

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