जनवरी 12, 2013

तुम अपना नाम मत पूछना बस

मैं अभी भी लिख नहीं रहा हूँ, बहाने बना रहा हूँ। इसीलिए तो सबसे बाद में किया जाने वाला काम इस दफे सबसे पहले किया। के बाद में दिक्कत न हो। दिक्कत पढ़ने वालों को नहीं, इस लिखने वाले को है। कि क्या लिखना है और क्या नहीं, उसे बाँध कर खूंटे से रख लूँ। खैर, ये सब तो चलता रहता है। आते हैं उस रात पर जब तुमने कहाँ मैं कहाँ हूँ। मतलब 'तुम कहाँ हो?' तुम ढूंढ़ रहे हो अपने आप को। गुम हो जाने के बाद जैसे। पर मैं गुमशुदा तलाश केंद्र की रिसेप्शन पर तो बैठा नहीं हूँ के खोने वाला खुद पूछ बैठे, 'कहाँ से चल, कहाँ आ गया हूँ?'  पर इस सवाल का जवाब शायद मेरे पास शायद ही हो। दो बार 'शायद' इसलिए भी, के, जो सब तबसे मेरे दिमाग में चल रहा है उसे कह तो दूँ.. पर डरता हूँ।

डर लगता नहीं, उसका एहसास होता है। इसलिए अभी पर इतना डरूंगा तो चलेगा कैसे, इसलिए बिन हीला-हवेली आता हूँ सीधे तुम पर..

बढती उम्र के साथ सपने देखना न कम होता है न उनका आना। बल्कि वे जादा आते हैं बेखटके। कहीं अटके अरझे हुए हो जैसे। किसी डाड़ पर। किसी बिलजी के खम्भे पर। तुम्हारे कई सपनो में से तुमने चुना साथ रहना सपनो के। उस सपनो वाली दुनिया को बिलकुल उन्ही की तरह नाज़ुक हाथों से बनाया। जैसे बुन हो उन्हें। आहिस्ता आहिस्ता। करीने से। सपना थोड़ा दूर था। पर पीछे हटना, उस बढ़ा दिए कदम के खिलाफ होता। शायद इसलिए भी पीछे नहीं हटे। हटना किसी भी तरह से मोर्चे से भी है और उन क्षणों में हमारे भविष्य की रुपरेखा जैसा भी। जहाँ बेफिक्री है। अपना मन है। समझौते जैसा कोई सवाल तब न मन में उठता है। न लगता है। हम पूरी कोशिश करते हैं उसे सच करने की। और यहाँ एक क्षण रुक सहसा कई साल पहले आये सवाल पर दोबारा लौट पड़ता हूँ के अगर तुम दोनों सजातीय न होते तब क्या होता?

तब शायद होता ये के.. मैं होता कौन हूँ किसी भी सम्भावना को लिखने कहने वाला? मुझे अधिकार क्या है? उनकी ज़िन्दगी थी वही सबसे पहले वहां तक पहुचते। आज ये क्या कलम घिस्सुओं की तरह पिल पड़ा हूँ। और लगा हूँ कीबोर्ड से शब्दों को खटकाने। पर नहीं। इसे उनका कह भी कौन रहा है? ये सब तो मेरा है। किसी के कहने पर तो जाता भी नहीं। जो मन में आएगा कहूँगा। पता नहीं क्या हो जाता है बीच बीच में। अपने को सतर्क कर रहा हूँ। जहाँ अगली बार ऐसा हुआ वहीँ पोस्ट बंद।

वापस सपनों पर। सपनों के साथ दिक्कत यही है वो हमारे सामने घटित तब होते लगते हैं जब हम उनसे काफी दूर चले जाते हैं। मतलब ऐसा बिलकुल नहीं है के हम उनको चाहते नहीं हैं। पर कभी-कभी होता ये है के उनको हू-ब-हू होता देख अपने से रश्क तो नहीं, पर उनकी इतनी देरी पर गुस्सा ज़रूर आता है। कई बार उसके चरित्र (कैरेक्टर) बदलने का भी मन करता है। इंतज़ार वह बेकरारी सब पीछे कहीं छूट जाता है। रह जाती है खुरदरी सी लगती जमीन। जिसपर रेंगने का मन नहीं होता। पर पिछली ही किसी पंक्ति में कहा जा चुका है यह देर से सच हुआ सपना है। जहाँ उसके बिलकुल वैसा ही घटित होना है, जैसा वह देखा गया। ऐसा भी नहीं है के वह जबरिया हम पर थोपा जा रहा है। पर कुछ-कुछ रूमानियत कम ज़रूर हो जाती है क्योंकि उसी के समानांतर कई ऐसे सपने चल रहे होते हैं जिनको अभी काफी लम्बा सफ़र तय करना है। और तब वह क्षण आता है जब हम अपने उस सच होते सपने को थोड़ी देर के लिए स्थगित भी करना चाहे तो नहीं कर सकते। अंग्रेजी वाला 'रेक्टिफाय' भी नहीं कर सकते। न पॉज। फिर वहीँ से 'रिज्यूम' वाला फंक्शन भी अब तक सपनो के सन्दर्भ में इस्तेमाल करने होने वाला कोई प्रमाण भी सामने नहीं आया है, इसलिए इन पर चर्चा अभी सिर्फ विषयांतर ही होगी इसलिए फिलहाल अभी यहीं तक। 

पर तब क्या हम अपने उस आने वाले कल को कुछ देर रोकने की नाकाम कोशिश नहीं कर रहे होते हैं। कुछ-कुछ यह ऐसा ही लगता है। जहाँ हमने जिसके साथ जिंदगी बिताने के ख्वाब देखे थे, उसमे दूसरे के साथ लगता है, इतना वक़्त पहले ही बिताया जा चुका..पता नहीं क्या..क्या लिथारता हुआ आ रहा है..कह नहीं सकता के पहले सपने से तुम भाग रहे थे या तुम्हारे मन में क्या चल रहा था। पर इतना तो कह ही सकता हूँ के वो भागना नहीं किसी तरह मन को तैयार न कर पाना था। इसमें सच कितना है कभी तुमसे पूछा नहीं। पर पता नहीं क्यों ऐसा ही लगता रहा है अब तक। जहाँ हम खड़े होते हैं उसे फिर हर तरह से बचाना चाहते हैं। पता नहीं फिर ऐसा क्यों लग रहा है के इन सपनों के पीछे बहुत कुछ है किसे छिपा रहा हूँ। कहना चाहता हूँ, पर..बहुत कुछ जो स्थूल रूप में दिखाई देता है उसे अमूर्त कर कहीं गायब कर पोटली बंद कर देना चाहता हूँ। ऐसा लिखना मुझसे न होगा। कभी फिर आऊंगा। तब लिखूंगा। बिन पर्देदारी। अभी जाते जाते इतना ही के जहाँ आज तुम हो मन के बिन मन के वहाँ ही तुम्हे अपने लिए रास्ते खोजने हैं।

सपने देखना बंद मत करना मेरे दोस्त!! वही तो हैं, जो हमें जिन्दा रखते है। वरना सांस तो सभी ले ही रहे हैं। लेते रहेंगे। तुम जब तक अपने अंदर की सोयी चुप्पी से डरते रहोगे, तब तक यूँ ही घुटते-घुटते दिन तुम्हे काटते रहेंगे और रातें किसी ओ' हेनरी को पढ़ते पढ़ते गुज़र जाएँगी। उस रात भी कहा था उसी को दोहरा रहा हूँ। कोई बाहर से नहीं आएगा चुप्पी तोड़ने। उससे डरना भी बंद करना पड़ेगा। बहुत हो गया डरना वरना। लिखो। वही तुम्हे फिर खुद के पास तक ले जायेगा। नहीं चाहते तो यूँ ही चुप्प रहो। तुम्हे शायद याद न रहा हो इसलिए फिर लिख रहा हूँ के अगर हम यही सोचने लग जाएँ के सही वक़्त आएगा और तब मैं लिखना शुरू करूँगा तब न मालूम मुझे लगता है हम कभी लिख ही न पायें। लिखना अशांत मन की उत्पत्ति न भी माना जाये पर लिखने की कोशिशें लगातार होती रहनी चाहिए।

तुम्हारे संदर्भ में लगता है न लिखने का वक़्त कभी नहीं आ पायेगा, अगर तुम सिर्फ न लिखने के बहाने बनाते रहे। लिखो। वह हमारी इस ख़तम होती मानसिक उर्जा को शक्ति भी तो देता है। न भी देते हों पर भ्रम तो हो ही जाता है। बस उसे जानने की ज़रूरत है। शुरुवात करके तो देखो। मुश्किल है। पर करना तो पड़ेगा तुम्हे ही। खुद को दोबारा ऐसे ही पाया जा सकता है। और जहाँ तक असफल होने का मामला है, उसमे स्थायित्व की बात है उसपर यहाँ अभी नहीं..

सोच रहा था तुम्हारी किला-ए -कोहाना मस्जिद  वाली तस्वीर लगाऊंगा। पर नहीं। नहीं लगा रहा। इस बार फिर तुम बच गए

1 टिप्पणी:

  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

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