जनवरी 21, 2013

पानी पर कुछ फुटनोट

बिलकुल भी नहीं सोच रहा था के आज लिखूंगा। पर नीचे सप्लाई का पानी भरते हुए ख़याल आया, उन बोतलों का, जिनमे पानी भर रहा था। और उस पानी की पाइपों का। जिनसे गुज़र कर पानी की पीने लायक व्यवस्था की गयी है। यह शहर जिस तरह से बस गए हैं या वे इस वर्तमान संरचना को पा गए हैं, उनमे पानी को इसी रूप में पहुँचाया जाता है या जिनकी जेबों में पैसा कुलबुलाता है वह फोन कर इन टैंकरों को बुला लेते हैं। जिनकी जेबें फटी हैं उनकी भीड़ की भीड़ कहीं रेल की पटरी के किनारे बसी किसी कबीर बस्ती में टूट चुकी टूटी और बजबजाते नालों के ऊपर खड़ी अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं। 

इसी पानी की आड़ में कई नेता बड़े-बड़े चुनावी वादे भी करते हैं और कई स्वप्रबुद्ध जन इन्ही झुग्गी झोपड़ियों को पहले तो अवैध कहते हैं और फिर ये के इन्हें इन नेताओं ने ही पाला पोसा है। और हमारे यहाँ पानी भले न आये पर बजबजाती गन्दी नालियों के नीचे से गयी लाइनों से इन्हें चौबीसों घंटे पानी पहुँचाया जाता रहा है। फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब पर्यावरण के नाम पर उन्हें वहां से खदेड़ दिया जाता है। अभी पीछे यह ख़बर भी आई गयी हो गयी के दहिसर, गणपत पाटिल नगर में बम्बई नगर पालिका ने समुद्र किनारे उगे मैन्ग्रोव को बचाने के लिए वहां बसी रिहाइश को उजाड़ दिया है। यही सत्ता है जिसको लवासा में पहाड़ों के बीच बनती टाउनशिप कायदे से हजम भी हो जाती है। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़ी-बड़ी नदियों को साफ़ करने के एवज़ में योजनायें तो टेम्स का ख़्वाब दिखाती हैं पर पैसा पानी की तरह बहता दिल्ली के ख़ास लुटियन इलाके में पहुँच जाता है। ख़ैर। वापस। ज़यादा नहीं सत्ता जाग जाएगी। उसे सोने दिया जाये।

इस पानी को लेकर कई भविष्यवाणियाँ यहाँ तक भी पहुंची के तीसरा विश्व युद्ध इसी के इर्दगिर्द लड़ा जायेगा। पर बड़ी-बड़ी हथियार बनाने वाली कंपनियों ने इस इंतज़ार करने के बजाय देशों के बीच युद्ध प्रायोजित करवाने के कई तरीके इज़ाद कर लिए हैं। वर्ना कब तो जंग छिड़ती और कब उनके दलाल सक्रीय होते। उस इंतज़ार में खतरा उनके कारखानों पर ताले लगने का भी तो था। तब जंग उन कारखानों पर लगे तालों को खोखला करता, देशों को नहीं।


यह पानी कभी इस नागर संस्करण में उन जगहों में नहीं पाया जाता जहाँ राज्य की या विचारों की व्याप्ति आधुनिक अर्थों में न हो। वहाँ यह पानी इलाहबाद के कुम्भ की डुबकियां हैं। 'हर हर गंगे' की पाप हरती धार्मिक उदघोषणायें हैं। पर उन सड़ी गली नदियों में नाक हथेली से बंद कर नहाने वालों की त्वचा किन चर्म रोगों से संक्रमित होगी इसका कोई लेखाजोखा कहीं कोई स्वास्थ्य विभाग नहीं जुटाता, न रखने की सोचता है।

इसे जितना कम जटिल करने की सोच रहा था उतना ही इस पिछली पंक्ति से गुज़रते हुए महसूस हुआ के काँटा फँस गया। बिलकुल इसी क्षण अभी पार साल हज़रतगंज के साहू की याद हो आई जहाँ सिनेमा हॉल के अन्दर मेरे हाथ में बोतल देख एक अजान व्यक्ति को भी प्यास लगती है और मेरे अन्दर यह विचार कुलबुलाने लगता है यह मेरी खरीदा हुआ पानी है और इसपर उसके गले से ज़यादा मेरे हलक का अधिकार है। इसलिए हाथ की पकड़ मजबूत करने के साथ ही गर्दन भी नब्बे डिग्री के कोण पर कहीं दूसरी दिशा में फेर ली थी।

इस 'अधिकार' को विखंडित करें तो पाएंगे यह भी आधुनिक पद लगता है और जिसका जन्म स्वाधीनता आन्दोलन के प्रकारांतर हम भारतियों में हुआ लगता है और इसकी सत्ता मेरे इर्दगिर्द 'अर्थ' या 'पूंजी' के रूप में जुड़कर साथ मंडरा रही थी। कभी हम सोमवार पहाड़गंज जाते थे तो 'इलीट शूज' के बाहर पानी एक लोहे के ड्रम में गिरता रहता था। जिसे पीना है भरना है भर ले, पी ले। पीछे वहां गया तब उस जगह नल लगा दिया गया है और पानी की कटौती को पानी की बचत कह दिया गया है।

हज़रतगंज औरमपार घूमने पर एक भी प्याऊ नामक व्यवस्था न मिली। मिला हमारे गोल मार्किट, शहीद भगतसिंह मार्किट में। एक पियाऊ लगा है, पर कई साल पहले टूटियाँ गायब हुई फिर धीरे-धीरे पानी। अब वहाँ धूल है और कुछ नहीं। 
भले उसमे धार्मिक पुण्य और बहीखाते में प्यासे को पानी पिलाने की संतुष्टि ज़यादा थी। वह जगह किसी लाला की स्मृति में 'श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस' ने किसी परिवार को दी होगी। पर अब न उनकी संतानों ने उनकी याद में लगे इस जगह की याद है, न उन धार्मिक संस्थाओं के लिए यह अब कोई ध्यान देने लायक बात ही लगती होगी। यह बिलकुल उसी वक़्त हुआ होगा जब उस 'जैन भवन प्याऊ' लिखने वाले पेंटर की दुकान उजड़ चुकी होगी और उसे 'चूना मंडी' फ्लेक्स प्रिंटिंग की मशीनों को संभालने के लिए नियुक्त किया जा चुका होगा।

पर अगले ही पल इस पर 'अधिकार' वाली बात जो ऊपर बड़ी 'आधुनिक चेतस' लग रही थी 'प्रेमचंद' की कहानी के आगे धराशाही हो पानी भरने लग जाती है। कहानी है, 'ठाकुर का कुआँ'। उस पर अधिपत्य। शोषण के औज़ार के रूप में एक मनुष्य के स्पर्श को भी वह कुआँ स्वीकार नहीं कर सकता। उन विकट होते क्षणों में पानी की एक-एक बूंद की कीमत का एहसास होता है और तभी उसी क्षण दोबारा 'आधुनिकता' के छद्म को ओढ़ दिखाई देती है बाज़ार में बिकती पानी की बोतलें। इस पानी पर यहाँ के नागरिकों का स्वाभाविक अधिकार है, उसे अपदस्थ कर इसे इन बड़ी-बड़ी दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को 'एफ़डीआइ' पर बहसों के कई बरस पहले ही हस्तगत किया जा चुका है। पर इसपर कहीं कोई बात भी करना 'पसंद' नहीं करता। 'पसंद' उनका स्वाभाविक संवैधानिक अधिकार है।

इसे दूसरे रूप में भी पढ़ सकते हैं। जहाँ यह पानी धीरे-धीरे बिलकुल उसी तरह गायब होता गया जैसा अनुपम मिश्र यह बताते हैं के लोधी गार्डन के अठपुले से होते जो झील आज वहीँ तक सिमट गयी है, कभी वह आज के खान मार्किट से बहते हुए पुराना किला की उस झील से जुड़ती थी जो किले के पीछे से होते हुए यमुना में जा मिलती थी, आज कहीं किसी की याद में नहीं है। हमने उसे उन्ही आठ सौ छोटे बड़े तालाबों की तरह पाट दिया विकास की आधुनिक परिभाषा में कहीं किसी भी तरह अटते नहीं थे।तब हमें मिली भागती दौड़ती सड़कें आसमान छूती इमारतें। और गायब हो गयीं वहाँ रहने वाली मछलियाँ और इसी विकास के सहउत्पाद के रूप में हमें मिले, डेंगू के मच्छर।


{बाद की एक और पोस्ट:  पानी की देशज व्याख्या }

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