जनवरी 22, 2013

जहाँ मैं कहीं नहीं था

{यह छोटा सा पुर्जा सत्ताइस जुलाई, दो हज़ार ग्यारह का है जब अगले दिन साउथ कैंपस जाने न जाने के बीच उलझ रहा था। इधर इसलिए भी याद आया के इन्ही दिनों के साथियों से दोबारा मुलाक़ात इस हफ्ते होने है। देख रहा था तब क्या सब सोच रहा था। अपनी यादगारी के लिए भी और उनके लिए भी। उमर कैसे वहाँ बेगाना सा बना रही थी और मैं जुड़ने छिटकने के बीच लगातार वहां जाने से बचना चाहता था। पर कभी लगता है कैसे भी दिन हों, थे तो सब साथ ही..}

पता नहीं ऐसा इस बार फिर हुआ कि वो सारे फिर कहीं पीछे छूट गए। उनके साथ चलना न चलना दूसरी बात है। एम।ए। के सिर्फ दो तीन दोस्त रहे जिन्हें मैं जानता था। यहाँ भी उत्नो के करीब हूँ। फोन से बात करने का भी मन नहीं हुआ। कभी करता भी है तो मिला नहीं पाता। शायद उनसे जुड़ा भी सतही स्तर पर था। जहाँ उन्होंने मेरे लिए एक खांचा गढ़ उसमें मूर्ति की तरह रख दिया था।

माने सबको एक बारगी सर से नकार देने वाला ऐसा जीव जिसे निराशावादी जैसे शब्द नहीं बोले गए पर यह नजरिया उनसे मुझको जोड़े नहीं रख सका। उन्होंने सबने मिलकर एक अव्यवस्थित से दाढ़ी वाले के रूप में मुझे देखा। और वैसे भी जब आप किसी से किसी भी स्तर पर सहमत न होकर तीसरा पक्ष रख उसका राग अलापते रहेंगे, तो इसकी संभावना ज़्यादा है कि आपकी उपस्थिति उनके बीच अनामंत्रित अतिथि सी ही होगी। और ऐसा होता भी था।

मेरे लिए भी उन छिछली किसम की घोर आदर्शवादी बातें पचाना संभव नहीं था, इसलिए उनकी हर बात को काट अपनी सजाता गया। मैंने उनको बोलने का अवसर तो दिया पर मौका पाते ही उन्हें उल्टा टांगने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी। फिर शुरू हुआ प्रतिघात, काउंटर अटैक। उन्होंने भी मेरे किसी भी बात का समर्थन करना छोड़ दिया। मैं एक अतिवादी ध्रूव की तरह वे दूसरे सिरे पर अवस्थित मुस्काते। मुझे नहीं सुनते। खारिज करते। साथ रहते भी तो कैसे? जो मित्रता में होता है उससे अलग बुज़ुर्गवार की तरह ट्रीटमेंट कभी भी अच्छा नहीं लगा। इसके चलते दोनों सिरों ने एक दूसरे पर बिब सोचे समझे मानसिक-वाचिक-शाब्दिक अत्याचार किये।

कल शशि शेखर अपनी दुर्गति के बारे में उवाचेंगे। माने हिंदुस्तान हिंदी के सम्पादक पत्रकारिता की चुनौतियों पर व्याख्यान देने आ रहे हैं। सोचता हूँ चले चलूँ। एक बार फिर उन कैंपस वालों से मिल आऊं!!

27.07.2011, 08:54 P.M.

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