जनवरी 31, 2013

एक जो है आलोक

सोच नहीं पा रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ। चार बार तो रीड्राफ्ट कर चुका हूँ। लिखना क्या है और लिख क्या रहा हूँ, बिलकुल भी तालमेल नहीं बन पा रहा है। शायद ऐसा होता होगा। इसलिए दोबारा एक कोशिश। पर इतना आसान होता भी कहाँ है। हमारे आग्रह, पूर्वाग्रह हमारे सामने आने वाले दृश्य किसी भी व्यक्ति को कितना दिखा पाते हैं इसी को लेकर सोच रहा हूँ। छवियाँ हमेशा से ऐसी ही रहती होंगी। मॉडर्न आर्ट की तरह। सबके अपने-अपने पाठ अपनी-अपनी व्याख्याएँ। इसलिए भी लिखना खीर बनाने की तरह टेढ़ा है। और इधर कई बार आलोक भी पूछ लेता है, 'तुम तो मेरे बारे में लिखने वाले थे क्या हुआ?' तो आलोक आज तुम पर। खतरें हैं फिर भी।

दिन बड़ी जल्दी पुराने होते जाते हैं पर उनकी याद नहीं। और ऐसा ही एक दिन है जब आलोक और मैं एमएड का एंट्रेंस देने के बाद खालसा कॉलेज से निकलकर खाने की खोज पर पिल पड़े थे। अमित से बीच में जय जवान स्टाल के पास भेंट हुई थी। तुम्हे याद है क्या बात हुई थी? मुझे कुछ जयादा याद नहीं। खैर, यहीं से शुरू क्यों कर रहा हूँ इसकी भी एक वजह है। वह यह के हम दोनों को बिलकुल नहीं पता था के हम एक साथ इस कोर्स के लिए चुन लिए जायेंगे। और एक तरह से यह हमारी फिर से मुलाक़ात ही थी। कई सारी बातों मुलाकातों जैसा। जो अब हर रोज़ होनी थीं।

यह बात शायद तब शुरू हुई जब तुमने अपनी एक कहानी सुनाई। उसमे एक ऐसा ऑटो है जो लड़कियों से भरा है और तुम उसे अपने यमुना विहार ले जाते हो और एक-एक लड़की अपने हिस्से की कहानी कह रही है। और शायद तब भी जब हम क्लास में लिबिडो के बारे में फ्रायड को पढ़ रहे थे। समझ नहीं पा रहा था यह सब जो सामने हो रहा है, है क्या? क्या एक ही व्यक्ति एक ही समय में स्त्री के पक्ष में हो और दूसरे ही पल घोर देहवादी हो जाए। यह भी हो सकता है कि यह बायनरी मैंने खुद ही गढ़ ली हो। या हो सकता है एक पुरुष होने के नाते अपने सजातीय को कुछ छूटें देने का मन कर रहा हो।

जबकि दो साल पहले वाली छवियाँ एकदम से अचानक टूट रही थीं। बीएड में ऐसे सिलसिलेवार बातों के दौर कम ही थे। मुझे आजतक समझ नहीं आया के क्यों बार-बार तुम्हारे मैथिल होने के साथ ब्राह्मण होने की बात रेखांकित करते जाते। हाँ यह बात ज़रूर है के हम हिंदी वाले एक किसम से अंतर्मुखी बनते जाते हैं पर एक तुमसे मुलाक़ात हुई एक राकेश से मुलाक़ात हुई और एक मिले सीबी। तीनों विशुद्ध हिंदी वाले और तीनों मेरे से अलग। जितना मैं उस दरमियान अन्दर का प्राणी था, उतने ही तुमसब बाहर के। फिर लगा मैं अपनी उस स्थापना को संशोधित करने। आज काफी हद तक उससे खिसका भी हूँ। खुद उस अन्दर से बाहर आ गया हूँ। शायद।

तो जो बात ऊपर रह गयी उसमे यही कह रहा था के तुम जितनी आसानी से खुद को जता लेते हो वह मुझे  उतना ही मुश्किल लगता है। आज इस वक़्त भी। शायद यह अपने घर से दूर इस दिल्ली में रहने का 'बाय- प्रोडक्ट' हो। पर एक बात थी जो बिलकुल हिंदी वालों की तरह तुममे भी थी। वो यह के एक तरफ़ हम उन दो सालों में इस दुनिया को देखने भालने के नए औज़ार तो तेज़ करने लगते हैं पर यही व्यवस्था हमें 'मिसफिट' बनाती चलती है। फिर एक क्षण ऐसा आता है जब हमें यह लगने लगता है कि जितने के हम अधिकारी थे उतना हमें नहीं मिला! यह ओवरकॉन्फिडेंस है न आत्मशलाघा। पर कुछ अंदर ही अंदर सालता रहता है। फिर शुरू होती है अपने अस्तित्व की लड़ाई। इसे खुद को साबित करना भी कह सकते हैं। तुम्हारा पूरा बीएड शायद यही था।

अगर ऐसा नहीं होता वो अन्दर बैठा लेखक बार-बार यह नहीं कहता के 'हिंदुस्तान' के इतवारी पन्नों पर जो तुम्हारे साथ छपे थे वे आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए। यहीं 'क्षमता' और 'अवसर' तब हमें सबसे ज़यादा समझ आने लगते हैं। और लिखना इसी रूप में हमारे अन्दर किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहता है। तभी तुम्हारी कहानी पढ़ी थी 'एक चम्मच ज़िन्दगी'. कहानी तो याद नहीं आ रही पर अभी भी वहाँ तुम अपनी मूंछों के साथ चिपके दिखाई दे रहे हो। मूंछ उस रूप में जुड़े रहना है, अपनी ज़मीन से, अपने 'संस्कार' जैसी किसी अमूर्त सत्ता से। धीरे-धीरे तुम वहां से खिसके हो। अब तो बिलकुल यकीन से कह सकता हूँ के अबकी बार तुम्हारी माता जी दिल्ली आतीं तो तुम्हे बिन मूंछ ही पातीं। यह किन्ही 'परम्परागत चीजों' को 'गैर- परम्परागत' तरीकों से करने की तय्यारी जैसा है।

यहाँ जिस जगह हिंदी में दो ढाई साल से खटर-पटर कर रहा हूँ उसकी शुरुवात इससे पहले फ़ेसबुक पर हुई। एक दुपहरी 'संचेतना' के सम्पादन के लिए हम लोग तस्वीरें जुटा रहे थे। कंप्यूटर लैब में तब तुमने अपना प्रोफाइल खोल बताया के इसपर हिंदी में भी लिखा जा सकता है। यह बिलकुल फ़िल्मी संयोग है के कल से इस गूगल ट्रांसलिट्रेशन सेवाओं की जगह नयी व्यवस्था ने ले ली है और कल बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी फ्लाइट तुम्हे एर्नाकुलम उतारने वाली होगी। तुम आज भी फ़ेसबुक पर त्वरा टिप्पणियाँ करते रहते हो और उस अनुपात में मैं वहाँ से बिलकुल गायब हो चुका हूँ।

याद है वो शाम जब हम विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर बैठे आते जाते पॉपुलर कल्चर पर कुछ कुछ बोले जा रहे थे तब मैंने कहा था के मुझे लगता है कहीं न कहीं ये फेसबुक हमारी रचनात्मकता हमारे प्रतिरोध को एक सरल मार्ग निकासी उपलब्ध करा रहा है और वहां लिखना अब कुछ जँचता नहीं है। तब मैं वहां से हटने के बारे में सोच रहा था। पर कभी कभी तुम्हारे फेसबुक स्टेटस उस पत्रकारीय शैली को नए सिरे से रचते हैं। और सच कहूँ वहीँ तुम्हारे साथ बैठ-बैठ उन एमएड की क्लासों की बौद्धिक समझों को माँजना पोछना तेज़ करना एक बहाना जैसा लगता है, जिसकी आड़ में बैठ हम दोनों विशुद्ध पुरुषों की भूमिका में होते थे। भारतीय पितृसत्तात्मक पुरुष।

फिर कई शामें हैं उनकी यादें हैं जब मिश्रा जी की चाय पीते कई-कई दौर की वार्ताएं चलती थी। 'आर्ट्स फैकल्टी' के लम्बे रोचक शिखर सम्मलेन। वहां खून से लिखे प्रेम पत्र की खुनी प्रति। एक बार तो इसी की छत पर चढ़ गए थे। 'स्पिक मैके' कैंटीन। ऐसे ही एक दिन हम तीन जन हडसन लेन 'कावेरी' तक आये थे और वहीँ पार्क में बैठे कई किश्तों में सपनों की पोटली भरे जा रहे थे। इंतज़ार रहेगा उन सबके सच होने का। पता नहीं ऐसी कई यादें लगातार आ जा रही हैं। 'एफ़.एम.एस. कैंटीन' की थाली और उसमें कुरकुरी कुरमुरी पूड़ियाँ। बिलकुल एनसीइआरटी वालों जैसी। पर उन सबको लिखने का बूता खुद में नहीं है। इसलिए भी अब चलता हूँ। शायद कुछ लिख भी नहीं पाया। लगातार बचता रहा। अपने आप से। तुमसे। फिर कहते भी हैं न सबका लिखा जाना ज़रूरी भी नहीं। उसे रहने दो। किसी कोने अंतरे की कोमलता की तरह अनछुआ।

हाँ, इतना बताता चलूँ कि यह तस्वीर जो ऊपर बायीं तरफ लगी है, वहीँ बालकनी में इसी पीछे बीते इतवार सुशील और शरद खड़े हैं और हम दोनों परमानंद कॉलोनी से वापस लौटते हुए एक बार फिर उस अड्डे को देखते हैं। पिछले दस साल में दिल्ली की कई-कई साझेदारियों को एक बार फिर से देखने का वक़्त थोड़ा कम पड़ गया है आलोक के हिस्से। पर आलोक उस शाम तुम्हारा बनाया निमौना बार-बार याद आएगा। वो यमुना विहार जाकर 'आम्रपाली' और 'मल्लिका' आम खाना भी। ख़तम वहीँ कर रहा हूँ जहाँ सबसे पहले अपनी डायरी में तुम पर कुछ लिखने की सोच रहा था। तारीख है अट्ठारह अप्रैल, दो हज़ार बारह। बस जगह 'चाँदीपुर' के बजाय 'एर्नाकुलम' हो गयी है। बाकी सब वही।

'कई मुलाकातें जो आलोक के चलते गाहे बगाहे हो जाती थीं, उसके दिल्ली से चाँदीपुर चले जाने के बाद वैसी स्वाभाविक आकस्मिकता का आभाव हो जाएगा। उन लोगों से मुलाक़ात बात नहीं होंगी। अनूप 'सर' से लेकर मिश्रा टी स्टाल की बतकहियाँ गायब हो जायेंगी। सबकी किश्तें गट्ठर बनकर अपने अपने हिस्सों में तहबंद। मेट्रो स्टेशन की बैठकें सिरे से गायब हो जाएंगी। उन्हें गायब होना ही था। क्योंकि अगर वह नहीं भी जाता तो इधर तेईस मई के बाद की हमारी यारबाशी इतनी रोजाना होना ज़रा मुश्किल सी बात लगने लगती। पर उसका आगे अब कभी नहीं होना होगा।'

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