जनवरी 09, 2013

लिखे देता हूँ आड़ा तिरछा

आज न दिल भारी रखना चाहता हूँ न दिमाग। दिन ही कुछ ऐसा है। धीरे-धीरे या के चुपके से अपने पीछे बीत चुके सबमें उतर जाने का मन है। बिलकुल उस चुप्पे की तरह जो इतना चुप्पा है के सीढ़ियों पर बैठी बिल्ली भाग भी नहीं पाती। कल करीब रात होते होते बड़ा दार्शनिक होने का मन कर रहा था और लगा अँधेरा ऐसा कर भी रहा है। उस वक़्त धीरे क़दमों के बीच टकरा गया। क्या अपने आप को विचार में बदल देना चाहता हूँ और जितना भी अब तक जिया है उसे तुरंत किसी वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा मान भाग लेना चाहता हूँ। दर्शन के साथ दिक्कत सबसे बड़ी यही लगती है वह शुरू-शरू आपके सिवा किसी की समझ में नहीं आता और जब दूसरे समझने लायक होते हैं, आप अपने उस बिंदु से आगे खिसक चुके होते हैं। मुझे कम से कम आज तो इतनी घुमाफिरा के बातें नहीं करनी चाहिए। तकाज़ा कहता तो नहीं है पर कर लेता हूँ।

दरवाज़ा खुला है और बाहर अनाम पक्षी अपने किसी सभाषी को डांट रहा है। नहीं भी खुला होता तब भी आवाजें कान तक पहुचती ज़रूर। जिस कान से सुनता उसकी भी तो कोई न कोई उम्र होगी। बिलकुल होगी जनाब!! बिलकुल उसी तरह जैसी इस दरवाजे की है। और जब हम बहुत छोटे थे तब यहाँ झरोखेदार जालियाँ लगी थी। उसी की आड़ में छुपन-छुपायी खेलता मैं खड़ा हूँ। बहुत छोटा सा। नन्हा सा। मुलायम हाथ, मुलायम यादों की तरह। तब इस बरस की तरह चींटे हमारे एक कमरे वाले घर में नहीं आये थे। हमारे क्या किसी के घर की तरफ ये ऐसे खिसके भी नहीं थे। तब नीचे पार्क की तरफ ही घूमते सैर करते थे। हम चेन-चेन खेलते और ये चींटे कतारबद्ध एक के पीछे एक चलते रहते। कोई कभी अकाल मृत्यु हो भी जाती तब कोई बुज़ुर्ग चींटा अपने सधर्मी चींटे के पार्थिव शरीर को अपने मुह में दबाये अपने घर लौटते हुए कई बार देखा। हम ऐसे जाते चीटों को खूब परेशान किया करते। नहीं समझते थे उनके प्रेम को।

हम तो उन उड़ते फाहों को इक्कठा करने में लगे रहते जो गर्मियों की छुट्टियों में दूर देश से उड़ कर हम तक आते। सुनहरे सफ़ेद।चमकते दमकते। सेमर का पेड़ उसके लाल फूल दिल्ली में बसंत के साथ जुड़े हैं या नहीं ये बात अज तक नहीं पता। पर अभी बिलकुल अभी गूगल करने पर यह मालुम चला के जयशंकर प्रसाद की कहानी आँधी में मुसहरिन सेमर की रुई बीन लेती थी और रामविलास शर्मा निराला की साहित्य साधना के दूसरे खंड (पृष्ठ: दिवा-स्वप्न/457) में 'राम की शक्ति पूजा' के सन्दर्भ में 'हिरनी' कहानी के बाद जिस 'अर्थ' नामक कहानी पर आते हैं उसमे कुलीन ब्राह्मण पुत्र रामकुमार भीम का स्मरण करते करते उनकी गदा तक पहुँचता है और याद करता है कि कैसे भीम के गदा घुमाने पर भगदत्त के हाथी सेमर की रुई की तरह उड़ गए और कुछ तो अभी भी हवा में चक्कर काट रहे हैं।

इधर उम्र के साथ बड़े होने में दिक्कत सबसे बड़ी यही हुई के बात हो कही रही होती है, पहुँच कहीं जाती है। इसका एक तो कारण यह हो सकता है के अपने बचपने के बारे में खुद कुछ अब ज़यादा याद न हो या जो भी याद हो उसमे इतने सालों बाद शब्द ध्वनियाँ बचे ही न हों, बस बची हो बेतरतीब सी यादें, जिनको किसी ने करीने से लगाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। या वक़्त ही कौन निकाले इन सबके लिए। पर हैं तो यह सब हमारी थाती जैसा ही कुछ।

कभी-कभी इनके पार चले जाने का मन होता है जैसे आज सुबह से ही उस गायब हो चुके पार्क में रॉकेटनुमा झूले पर बराबर बेतहाशा भागे जा रहा हूँ। ऊपर नीचे।नीचे ऊपर। ढलान से लेटे लेटे उतारते थे। पीछे की दिवार पर चढ़ने में डर कभी नहीं लगा। वहां से बिरला मंदिर की दूरी बस एक सड़क पार थी। कितनी ही नन्ही शामे अँधेरा होते वहां से पैदल लौटते हमारे पैर थक जाते। बिलकुल बेजार। फिर हमें एक तरकीब सूझती। डीटीइए स्कूल के बाद जो तरणताल (आज तक हम उसे तरणताल ही बुलाते आ रहे हैं बोर्ड पर तब से यही लिखा पढ़ा इसलिए भी, और स्विमिंग पूल कहने में हम उससे जुडा महसूस नहीं कर पाते हैं। इसलिए भी तरणताल) आता उसके बाद कीकर के पेड़ के पास आते ही पापा से हमें कन्ना (गोदी) लेने की जिद करने लगते। थोड़ी देर बाद एक कंधे पर मैं होता दूसरे पर भाई। फिर वहीँ बिरला मंदिर से लौटते हुए कभी टिक्की खाते, कभी किसी चमकीली कलम पर चिपके शीशों पर दिल लुटाते उनपर मर मिटते। कभी यूँ होता के एनपी बॉयज स्कूल के बाद जो कूड़ाघर आता वहां से दोनों भाई रेस लगाते भागते पर जीना चढ़ने से डरते।

इसी जीने पर जलते रोशनी करते कई लट्टूओं पर पानी की दो तीन बूँदें  डाल उन्हें फोड़ चुके थे। पर डर तो डर होता है वो अँधेरे के साथ ही रोज़ रात आता हमें डरता और सुबह होते चला जाता। तब यही जीना हमें अँधेरे में छत पर जाने से रोकता। हम रुक जाते। इसे रुकना नहीं तब डरना कहता। तहकीकात के एक एपीसोड में जॉन परेरा की टब में नहाती लाश कई सालों तक हमारे पीछे पड़ी रही। इस टीवी से बहुत छुटपन से ही जुड़ गए थे। इतवार सुबह 'रंगोली' आता था। उसपर हेमा मालिनी होती थी। पर हमें तब गानों से मतलब था न कि बुढाती हिरोईन से। फिर 'स्ट्रीट हॉक' की भागती मोटरसायकिल उसके काले चमकते कपड़े अपनी तरफ खींच लेते थे। कहानी शायद 'ट्रॉन लेगसी' जैसी किसी फिल्म पर होगी।

पर शाम चार वाली फिल्म से ज़यादा इंतज़ार रहता था पीछे बीते दिन शनिवार को फिल्म से पहले आते धारावाहिकों का। विक्रम बेताल। 'सॉर्ड ऑफ़ टीपू सुलतान' की धुन तो बस!! 'हमलोग' के अशोक कुमार की ऐनक लगायी तस्वीर कभी-कभी बोलती दिख जाती है। इस टीवी वाले हिस्से पर गाँव शटर दरवाज़े वाला टेलीविजन भेजने, 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का' एल्बम की कैसिट, हमारा गर्मियों की छुट्टी पर महिना-महिना भर के लिए जाना। तब 'शरलाक होल्म्स' न देख पाने का एहसास आज भी बहुत करीब महसूस होता है। और भी काफी कुछ है जिस पर कभी तसल्ली बक्श काम किया जायेगा। भूल जाऊं तो याद दिला देना साहब!

ऐसी ही एक याद है जिसमे हमने बाबा खड़क सिंह मार्ग से बस पकड़ी थी। तब न दशकों तक रिलाइंस एअरपोर्ट मेट्रो लाइन वहां आनी थी न ही मल्टी लेवल ऑटोमेटिक कार पार्किंग बनने की किसी ने सोची थी। जबकी बात है तब न जगह का नाम मालूम था और न ये के हमलोग सब जा कहाँ रहे हैं। बिलकुल जफ़र पनाही की फिल्म 'द मिरर' की उस छोटी लड़की की तरह जो जगहों को नाम से नहीं बल्कि उनकी छवियों से याद रखती थी। मुझे भी बस दीवारें याद हैं लाल-लाल सी और खूब सी भीड़। एक बस हम लोग छोड़ देते हैं। दूसरी भी जाने देते पर जहाँ पहुँचना था वहां के लिए और देर हो जाती इसलिए मन मारकर चढ़ ही लेते हैं। बात इसी बस के अन्दर की है। हम दोनों भाई (तब तक बहन नहीं आई थी) खड़े थे, पापा ने एक बैठी महिला से कहा के बच्चे छोटे हैं इसलिए थोड़ी जगह दे दें तो बैठ जायेंगे। पर वो मानी नहीं। हम खड़े रहे। खड़े खड़े ही सारा रास्ता गुज़र गया। वो तो कई सालों बाद एल्बम में फोटो देख कर पता चला वह जगह जहाँ हम उस दिन जा रहे थे वो सूरजकुंड मेला थी। शायद पाँचवा या छठा साल होगा इसका।

हमरी स्काफ़ पहने फोटो हाथ में छोटे-छोटे लेम्प। कई सालों तक वो 'बाबा वाले डब्बे' (इसकी भी कई कहानियों में महत्वपूर्ण भूमिका है पर अभी नहीं) की बगल में रखे रहे। कभी मिट्टी तेल डाल उन्हें जलाया नहीं। पता नहीं कई साल हुए अचानक वे गायब होकर कहाँ खो गएतब से हमें कभी नहीं दिखे। न साल दर साल बड़े होते हमने उन के यूँ गुम हो जाने की बात मम्मी पापा से पूछी। पीछे सूरजकुंड है और हम दोनों खड़े मुस्का रहे हैं। साल शायद वो रहा होगा जब मेरा मुंडन हुआ था और सर पर बाल कम हैं। या एक दूसरी तस्वीर को इस के साथ गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ, पता नहीं। पर स्काफ का रंग ज़रूर याद है। महरून।

तुमने अभी चार बजे बात करते करते पूछा था न के अपने बारे में बताऊँ। उसी अपने में से थोड़ा सा लिख पाया हूँ। मुझे जिन्दगी जीना ज़यादा आसान लगता है बनिस्पत इसके के उसे लिखते लिखते जिया जाये। और फिर कभी-कभी खुद को इतना काबिल भी नहीं पाता के कुछ अपने बारे में उन बीत गयी नाज़ुक सी यादों के लिए शब्द जुटाऊं। उन सबको साधना मेरे बस की बात नहीं लगती। कोशिश करता हूँ उनको एक तरतीब से सहेजे रखूं। पर डरता हूँ कहीं कभी अल्जाइमर का शिकार हो गया तब कौन याद दिलाएगा इसलिए भी लिखे देता हूँ। आड़ा तिरछा। और जो फोन रखते वक़्त कहा था न के आज की तारीख याद रखना। तो मोहतर्मा आज अपनी सालगिरह है। पता नहीं मैं तुम्हारे फोन का इंतज़ार करता रहा और जब आया भी तो तुमने याद न दिलाया। खैर।

तो साहिबा सूरजकुंड से लौटते वक़्त सीन बिलकुल उलट था। इसी फ़िल्मी भाषा में संयोग कहेंगे शायद। के तब हम बैठे हुए थे और वे महिला अपने पूरे परिवार के साथ खड़ी थीं। पापा ने हमें गोदी में ले लिया और थोड़ी जगह बनायीं ताकि वो छोटी लड़की तो बैठ ही सके। फिर पता नहीं हमें कौन सी सड़कें कब वापस ले आईं। जबकि पूरे रस्ते मैं खिड़की के बाहर ही झाँकता रहा था। और ऐसी पता नहीं कितनी बातें इधर जबसे लिखने बैठा हूँ दिमाग में दौड़ भाग रहीं है। पर अभी मुझे इस पोस्ट के लिए एक अदद तस्वीर भी खोजनी है। इसलिए इसे यहीं समेटते हुए बस इतना ही याद आ रहा है के तब बिरला मंदिर से दो सौ पंद्रह दो सौ सोलह चलती थी। इन्ही बसों ने लाल किले से पहले पहल हमारी मुलाकात करायी थी और वहीँ से चालीस नंबर बदरपुर बॉर्डर जाती थी और गुप्ता जी वहीँ से कई इतवार आते थे।

वहां तब अस्तबल भी था और बारह पंद्रह दुकाने भी। पता नहीं तब बहुत छोटा था, वरना तभी उनको ढूंढ़ निकालता। अब तो पता नहीं कहाँ कहाँ होंगे। वो रॉकेट नुमा लोहे का ढांचा भी कबका पिघलाकर पता नहीं क्या बना लिया गया होगा। फिर याद आ रही है उस मेले में बांस के पैरों पर चलता लंबा आदमी और भी पता नहीं क्या क्या..

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. कभी कभी जीने उसमें डूबने ख़ुद को जानने के लिए यह पुराने दिन भी ज़रूरी हैं। इसलिए।

      हटाएं

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...