फ़रवरी 02, 2013

शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में सिनेमा

{यह उस प्रस्तावना का संशोधित अंश है जो पिछले साल मेरे एमएड के लिए लिखे गए लघु-शोधपत्र 'शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में सिनेमा ' (Cinema as a pedagogical tool)की भूमिका बनते-बनते रह गया। थोड़ा सैद्धांतिक है पर भाषा के स्तर पर उस शोध की जटिल भाषा से बचने की कोशिश लगातार करता रहा। जूझना सही शब्द होगा, पर नहीं लिख रहा। इसकी मानसिक तय्यारी विनोद अनुपम के लेख सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ पढ़ने के बाद से ही चल पड़ी थी, जिसे बीते साल विद्यालयी स्तर पर इस माध्यम की संभावनाओं को टटोलते जाँचते परखते पहुँचा था। 

आप यह लघु-शोधप्रबंध दिल्ली विश्वविद्यालय के सी.आई.इ.लाइब्रेरी (केन्द्रीय शिक्षा संस्थान) और सीआरएल, में आसानी से खोज सकते हैं। इसलिए भी कॉपी पेस्ट करने की न सोचे। क्या करेंगे, ऐसे तो कितने ही ड्राफ्ट अभी भी पड़ें हैं, ठीक से सन्दर्भ भी नहीं दे पा रहा हूँ ..बस सौ साल के होते सिनेमा के मौके पर यहाँ चेप दिया। देखिये कैसी जिरहें करनी पड़ती हैं..}

सिनेमा समकालीन विश्व में मीडिया संचार के तंत्र में सबसे प्रभावशाली तरीके से फैला है व उसकी व्याप्ति बढ़ी है। वह सूचनाओं को बनाते एवं पहुँचाते ही नहीं है अपितु ध्वनि, चित्र और शब्दों के द्वारा सूचना के जरिए समझ बनाते हैं। इस समझ के जरिए हमारी इन्द्रियाँ इस विश्व के साथ हमारे संबंध को भी स्थापित करती हैं। निश्चित ही यह जनता के काफी बड़े हिस्से के लिए अभी भी मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया है लेकिन इसे सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना जा सकता। मानसिक रूप से अपने आप को दृश्य के अंदर महसूस करवा लेने की क्षमता ही है जो सिनेमा को इस कदर संप्रेष्य बनाती है कि लोग बिना फिल्मी भाषा व तकनीक के समझ, उसे देखते हैं, और समझते स्वीकारते हैं। फिल्म देखते हुए वे अपना मन ही नहीं बहलाते, वे अपने साथ अपने समय समाज के बारे में नए अनुभव और नई समझ भी लेकर जाते हैं। ये अनुभव और समझ जीवन और समाज संबंधी अपनी पहले की समझ को किसी न किसी रूप में प्रभावित जरूरत करते हैं। या तो जाने-अनजाने उनका नजरिया बदलता है या पहले से बनी समझ और मजबूत होती है।

इसके साथ यदि हम एम.एन. श्रीनिवास को 'लौकिकीकरण'[1] या 'पंथनिरपेक्षीकरण' [2] की प्रक्रिया के संदर्भ में पढ़े तब हम इसे इस माध्यम को इसकी प्रत्यक्ष प्रभावशीलता के साथ और स्पष्ट रूप से समझ पाएंगे, जहां वे द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम  के लेखकों द्वारा जाति और पारंपरिक धर्म के विरूद्ध प्रचार के लिए फिल्मों के उपयोग और मैसूर में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय होने, कस्बों में शहरों में उनके हफ्तों चलने के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए मैककिम मैरियर  को उद्धत करते हैं कि 'जनवादीकरण'[3] से, चाहे फिल्मों के द्वारा हो, आकाशवाणी के द्वारा हो, अथवा लोकप्रिय पुस्तकों तथा पत्रिकाओं में हो, पारंपरिक संस्कृति के तत्व में मूलभूत परिवर्तन आते हैं।’

वस्तुतः सिनेमा हमारे समय के यथार्थ का हिस्सा भी है और उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम भी। यह समाज के विभिन्न वर्गों, समुदायों, गतिविधियों के प्रतिनिधि बिंब निर्मित करता है, उसे रचता है। फिल्म जिस हद तक यथार्थवादी है उस हद तक तात्कालिकता के साथ इसकी समानता से नहीं बचा जा सकता। इसका कोई ऐसा सौन्दर्यबोध नहीं हो सकता जो सिनेमा के समाजशास्त्र को शामिल न करे। फिल्म ही दैनिक जीवन के सौन्दर्य का आविष्कारक है।

मीनाक्षी तापन इस समकालीन वैश्विक विश्व में प्रसारित छवियों ध्वनियों, वस्तुओं को इस परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं जहां इसका प्रत्यक्ष प्रभाव राश्ट्रीय अस्मिता और जातीय संबद्धता के साथ-साथ लैंगिक अस्मिता पर भी पड़ रहा है [4]। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है. फिल्म 'सन ऑफ इण्डिया ' (1962) के एक गीत में जहाँ लड़का गाता हैः ‘नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ ’ वहां इस गाने का सारा बल भविष्य की स्थिति और इच्छा पर है जिसने उस छोटे से लड़के को सिपाही में बदल दिया। एक तरफ यह बतला रहा है कि देश की रक्षा सभी के लिए महत्वपूर्ण बात है 'यहां तक कि बच्चे के भी', वहीं दूसरी तरफ यह भी संप्रेषित कर रह है कि भारत की एवज में वह स्वयं की इच्छा को पूरा करना चाहता है। बच्चा अपनी पुरूष छवि से भली भांति परिचित है कि वही भारत का सिपाही बन सकता है। यहां उस नन्हें मासूम लड़के और उस परिपक्व सिपाही का द्वय रोचक है जिसमें सिनेमा से लड़की गायब है।

यह एक साथ कला माध्यम, सम्प्रेषण का सशक्त स्रोत, दृश्य-श्रव्य माध्यम, एक लोकप्रिय मनोरंजक, सूचनाओं और सामाजिक मूल्यबोध को संचारित करने वाला माध्यम ही नहीं है अपितु सांस्कृतिक वातावरण निर्मित करने वाले अभिकरण के रूप में यह परिप्रेक्ष्य सिनेमा पर विस्तार से विचार करने की अपेक्षा करता है। यही वह क्षण है जब सिनेमा को शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में प्रयोग करने के संदर्भ में अध्ययन करने की सबसे ज्यादा महसूस होती है।

यहां हमारे सामने सवाल यह है कि ऐसे विकासशील समाज में, जहाँ इजारेदार वर्ग की प्रबल उपस्थिति हो, वहाँ जनसंस्कृति और मनोरंजन की परिकल्पना के बीच शिक्षा के साथ उसे एक रचनात्मक अन्विति में कैसे गढ़ा जाए? इस पूर्वपीठिका में जब हम विद्यालय आने वाले संभावनाशील मस्तिष्कों को देखते हैं तब यह प्रतीत होता है कि बच्चों की न सिर्फ तात्कालिक आवश्यकता की पहचान बल्कि जिस समाज में वह तैयार हो रहे हैं उसे संबंधित उनकी भविष्यकालीन आवश्यकताओँ की भी पहचान जरूरी है। तब उस ज्ञान को केवल केंद्रीय स्रोत द्वारा उत्पन्न होने वाले के रूप में न देखकर इसे हमारे अपने ही आसपास उत्पन्न होन वाले के रूप में हम देख पाएंगे। शिक्षित करने का मतलब है, दिशा देना। जैविक व जीवंत तरीके से जीवन से जोड़ने को प्रोत्साहित करना। आज जब सिनेमा हमारी जीवनशैली में शामिल हो चुका है तब दिमाग को ऐसे साधनों से सम्पन्न किया जाना चाहिए कि वे इस गूढ़ दुनिया को समझ सकें। सिर्फ फिल्म को बिन दिमाग देखने के बजाए एक स्वस्थ्य आलोचकीय समझ के साथ ग्रहण करें।

जहाँ सिनेमा एक तरफ संस्कृति समाज की उपज है तो दूसरी तरफ अपनी संस्कृति भी निर्माण करता चलता है. यह एक सामाजिक उत्पाद के रूप में हमारे लोक में व्याप्त है. इस रूप में सिनेमा अपने समय समाज के बीच आकार लेता है उसकी प्रवृतियां उसे सामजिक दस्तावेज़ बनती हैं. इसमें एक साथ किस्से है कहानियाँ है लोक, संवाद, घटनाएँ, भूमिका-निर्वाह, साधारणीकरण है और एक सीमा तक यह रंगमचीय विधियों के प्रयोग के कारण इसमें समानता भी है लेकिन दूसरे ही क्षण तकनीकी के कारण यह उससे पर्याप्त भिन्न भी है.

अब हमें इसको शिक्षा शास्त्रीय उपकरण के रूप ने संभावनाओं के अन्वेषण के क्रम में शिक्षाशास्त्र का परिचय प्राप्त करना इस उपक्रम में सहायक होगा ताकि शिक्षा शास्त्रीय उपकरण के रूप में इसकी संभावनाओं को देख पायेंगे.

शिक्षा शास्त्र क्या है? यह शिक्षक-विद्यार्थी-समाज के मध्य एक अंतः क्रिया है जिसके बीच शिक्षाशास्त्र निर्मित होता है। शिक्षाशास्त्र कई स्तरों पर बनता-बिगड़ता रहता है. यह जीवंत है और हर कक्षा की चारदीवारी के भीतर अपना स्वतंत्र आकार-प्रारूप लेता है। इसमें निरंतर परिवर्तन की संभावनाएं समाहित हैं। ज़ेरोम ब्रूनर के अनुसार (1996 ) इस समाज से ही शिक्षक के पूर्वाग्रह, धारणाएं, मान्यताएं जन्म लेती हैं, जिसके द्वारा वह अपने सामने बैठे छात्र विद्याथी की छवि गढ़ता है। वह सोचता है कि बच्चों तक कैसे पहुंचा जा सकता है? अगर हम कक्षाएं कैसे ली जाती हैं, इसका अध्ययन करें तो दिखाई देगा कि अध्यापक  हमेशा ऐसे सवाल पूछते हैं जिनके जवाब ‘हाँ’ या ‘न’ में प्राप्त हों। अपने अध्यापन को वह हमेशा छात्रो की क्षमता, प्रकार, रूचियों के आधार पर समायोजित करते रहते हैं। [5]

इसे हम अल्थ्युज़र की ‘व्यावहारिक विचारधारा’[6] से भी समझ सकते हैं जिसमें एक तरफ प्रत्यय-प्रतिनिधानों-बिंबों के मोंताज हैं तो दूसरी तरफ व्यवहार - आचरण रूझान और संकेतों की जटिल संरचना। इन प्रत्ययों (नोशन ) - जो कि मस्तिष्क में हैं और व्यवहार-जो सामने प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं - की समग्रता ही वस्तुओं, वैयक्तिक और सामाजिक समस्याआं के प्रति अध्यापक के कुछ रवैयों को अपनाने के मानक होती है। यह वह ढांचा है जिसमें विचारधारा मात्र वह रूप है जो अवधारणाओं, विचारों, मूल्यों और मानदण्डों के स्तर पर यथार्थ स्थिति के अंतर्विरोधों पर पर्दे डालता है। इन सबके बीच यह भी देखना होगा कि वह कक्षा किस स्थान, समय, समाज में स्थित है। उस स्कूल के अनुभव तथा बच्चे की बाहर की दुनिया के अनुभव को मल्पनापूर्ण ढंग से जोड़कर हम वहां के वातावरण के अजनबीपन को कुछ कम कर सकते हैं। बच्चे के अनुभवों को शामिल करके शिक्षाशास्त्र समृद्ध होगा। बच्चे हमेशा अपने अनुभवों और मान्यताओं के प्रति सचेत रहते हैं। अतः उनको मानसिक कौशलों के विकास की तरफ प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे उन पर चिंतन कर सकें व स्वतंत्र रूप से तार्किक दृष्टि रख सकें।

इस प्रयत्न की सफलता इस बात पर निर्भर है कि अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और अपने अनुभव पर विचार करने का अवसर देते हैं। सीखना अपने आप में एक सक्रिय व सामाजिक गतिविधि है। इवान इलीच इस अध्यापक के लिए कहते हैं कि वह केवल एक वचन में एक व्यक्ति नहीं है बल्कि वह स्वयं में बहुवचनीय व्यक्ति है। इसलिए उसके तीन रूप हैं जिनमें पहले में वह मात्र शिक्षक नहीं, बालक का मेंटर, कस्टोडियन भी है। दूसरे में उसकी नैतिकता का स्तर ऊंचा होता है और वह ‘उपदेशक शिक्षक’ राजा की तरह प्रजा को समान मानते हुए सब बच्चों को समान मानता है। तीसरे, वह चिकित्सक शिक्षक है ऐसे शिक्षक में वह थेरेपिस्ट को देखते हैं जो बच्चों की जिन्दगी में झांक कर उसमें हस्तक्षेप का अधिकारी बनता है। जबकि आज हम देख रहे हैं कि अध्यापक-छात्र की भूमिकाएं बदली हैं। शिक्षा कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसे शिक्षक या डाक के जरिए कहीं पहुंचा दिया जाए। यह ज्ञान की अवधारणा को पुनः रचित करने का समय है जिसमें बालका/बालक के अपने साथ लाए अनुभव उनका सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जितना अध्यापक के दिमाग और किताब में छपे शब्द ।

हमें उस चारदीवारी के भीतर लगातार ऐसी परिस्थितियां बनानी चाहिए जहां वह अपनी बात को रख सके, उसे ऐसे कौशलों से सम्पन्न किया जाना चाहिए ताकि वह स्वयं सोच सके और पूर्वज्ञान को संरचित करने के लिए तर्क क्षमता से स्वतंत्र कुछ रच सके। इतना ही नहीं कक्षा के भीतर लैंगिक, वर्ग और वैश्विक असमानताओं के प्रति भी संवेदनशीलता को प्रोत्साहित करना होगा. ज्ञान कोई एकात्मक संकल्पना नहीं है, उसके कई तरीके व प्रकार हैं। साहित्यिक-रचनात्मक-कलात्मक भी ज्ञानात्मक उपक्रम का हिस्सा हैं। इसे हमेषा रचनात्मक खोज करने वाले संसाधनों पर निर्भर होना चाहिए।

अब हम बिलकुल उस स्थान पर पहुंच चुके हैं जहां हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या माध्यम विशेष अपने साथ सीखने-सिखलाने के तरीके भी लाते हैं? क्या शिक्षा शास्त्रीय उपकरण भी समय के साथ बीतते पिछड़ जाते हैं और उन्हें दोबारा मांजना-पोंछना तेज करना होता है? अर्थात् क्या उन्हें किन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनाया गया था और अब वे वैसा करने में असफल हो रहे हैं? इन लगातार घटित होती प्रक्रियाओं में शिक्षक-छात्रा/छात्र की भूमिकाएं क्या रूपाकार लेती हैं? इस तरह उपरोक्त भूमिका के आलोक में इस शोध का उद्देश्य ‘शिक्षाशास्त्रीय उपकरण’ के रूप में सिनेमा की संभावनाशील संभावनाओं का अन्वेषण करने के साथ-साथ ज्ञान सृजन में माध्यम के रूप में सिनेमा की भूमिका को देखना है।

टिप्पणियाँ:-

[1]‘लौकिकीकरण' की जगह ‘पंथनिरपेक्षीकरण’ शब्द का प्रयोग एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं की पाठ्यपुस्तक में किया गया है। यह अंग्रेजी के ‘Secularization’का अनुवाद है।

[2] ‘जनवादीकरण’ Democratization का अनुवाद है।

[3] पंथनिरपेक्षीकरण - ऐसे प्रक्रिया जिसमें धर्म के प्रभाव में कमी आती है। इसमें सभी सूचक मानव के धार्मिक व्यवहार, उसका धार्मिक संस्थानों से संबंध, लोगों की आस्था, विश्वास, सभी को ‘विचार’ में लेते हैं। माना जाता है यह सूचक आधुनिक समाज में धार्मिक संस्थानों और लोगों के बीच बढ़ती दूरी के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। लेकिन हाल ही में धार्मिक चेतना में अभूतपूर्व वृद्धि व धार्मिक संघर्श के उदाहरण सामने आए हैं।

[4] मीनाक्षी तापन इस लेख में युवा मध्यवर्गीय लड़कियों की किषोरावस्था में उस प्रक्रिया को समझने का प्रयास है जिसमें परिवार-विद्यालय जैसे पुनरूत्पादन और वर्ग लिंग केो कैसे ‘ हैबिटस ’ के रूप में स्थापित करते हैं। साथ ही उनमें मूलतः लैंगिक अस्मिता के प्रकारों को वर्तमान समय, समूह, संस्कृति, पितृसत्ता के संदर्भ में देख्ना था कि वह इनमें कैसे रूपाकार लेती है।

[5] ब्रूनर लोकप्रचलित मान्यताओं को शिक्षाशास्त्र गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका में देखते हैं। उसमें अध्यापक के अपने प्रत्यय-धारणाएं-उसकी सामाजिक सांस्कृतिक स्थिति भी उतनी ही निर्णायक होती है। वे इसे 'फोक पैडागौजी' कहते हैं। जहां संज्ञान संस्कृति द्वारा प्रदत्त मनोवैज्ञानिक व तकनीकी औजारों के बीच प्रकार्य से उत्पन्न होता है। उनके यहां भाषा महावृतांत चिंतन के सामूहिक तार्किक प्रयास है।

[6] Althusser defines “Practical Ideologies” in opposition to “theoritical ideologies” as the “Complex formation of montages (sets) of notions – representations – images on the one hand, and of montages (sets) of behaviour – conduct – attitudes and gestures on the other"

[जारी..
आगे की ज़रूरी कड़ी..]

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