फ़रवरी 20, 2013

दिहाड़ी डायरी की तारीख एक अगस्त

{जब पहले पहल आदर्श और सिद्धांत का द्वंद्व कुछ ज़यादा ही सर चढ़ कर बोलता था। धीरे धीरे अब बुखार उतर रहा है। वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश अब दिखती है। किसी बने बनाये ढाँचे में कहीं से आयातित शिक्षाशास्त्र थोपा नहीं जा सकता। उसे वहीँ की चारदिवारी के बीच बनाना होगा। बस उन्ही दिनों कुछ-कुछ दिमाग में चल रहा था। 

पढ़ाने की दरमियानी के बीच अपने आपको बचाए रखने की जद्दोजहद है या वैचारिक विलास यह तो तय नहीं कर पाया हूँ पर इतना मालुम है के इन स्थापनाओं को अब और निकट से जान पाया हूँ। और इतना भी पता है के अगली पोस्ट वहां देखे झेले अध्यापकों पर ही होने जा रही है। दिमाग में काफी कुछ चल रहा है, उन्हें ही जुटाउंगा..बस अभी तो यही एक दिन की जूझती डायरी एंट्री..!! }

दशहरा शहादरा हो जाता है। आज तक उन्हें किसी ने पढने के लिए नहीं कहा। ऐसा उन्होंने ही कहा। उन्हें मेरा पढ़ाने का तरीका भी अजीब लगता है। धीरे धीरे मेरा मन भी घंटी के इंतज़ार में निकलने लगा है। उस पहली क्लास में औपनिवेशीकरण, औद्योगिक क्रान्ति, संघर्ष, गांधी के हिन्दुस्तान आने तक का समय उन्हें नहीं मालूम..या मुझसे पढ़ने का मन नहीं था..पता नहीं।

सब इसलिए आते हैं जैसे एहसान कर रहे हों। उन्होंने तय कर लिया है कि मेरे साथ नहीं जायेंगे।
10:47 pm

क्लास में हवलदार हो गया हूँ। जहाँ से हरकत उसका चलान। पता नहीं बाहर होती बरसात कैसे इनके दिमागों में घुस कर सीलन की तरह बन गयी है। हो सकता है बारहवीं का गुस्सा यहाँ निकल रहा है। मज़ा भी तो नहीं है। क्लासें कुत्ते की पूंछ से भी बदतर हालात में हैं। पाण्डे ग्यारह पाँच पर आया और किन्ही मिश्र जी के पैसे लहराने लगा।

इन सरकारी स्कूलों में यह सब चलता है। उन टीचरों को कोई फरक नहीं पड़ता की किसी का हर्जा हो जायेगा। छात्र भी उनसे बनाने के चक्कर में चेले बनने की जुगत भिड़ाने लगते हैं। यह परस्पर लेन देन का सौदा है। हम तुम्हें अपना वक़्त देंगे तुम हमें नंबर दो या दिलवाओ।

अभी पौन घंटा पहले इस बैंच के इर्द गिर्द ही मंडरा रहा था। के देखूं क्या लिख मार है सर जी ने!! थोड़ा डरपोक टाइप का हवाबाज़ है। फड़फड़ाता ज़यादा है। उसी के उसी जैसे दोस्त भी हैं। सब राम भरोसे बारहवीं तक तो खिंच ही जायेंगे।
11:25 pm

पता नहीं लग रहा हूँ ज़यादा नैतिक होता जा रहा हूँ। क्या यह अध्यापक के साथ आया कोई सांस्कृतिक मूल्य है या उसमें किसी किसी सुधारक की आत्मा प्रवेश कर जाती है..?? शायद कहीं पढ़ाने को लेकर अंदर कोई रौशनी जल रही होगी, जिसे सीआइइ वाले दिया जलाना कहते हैं। पर यही भभकता प्रतिक और उससे पिंड छुड़ाने के चक्कर में फंस सा गया हूँ। इस तरफ सिद्धांत जैसे भारी भरकम आदर्श नुमा बोझ टेल दबने को अभिशप्त हूँ।
11:57 pm

मॉनीटर जैसी उपव्यवस्थाओं से अनुशाशन की पहेली सुलझा रहा हूँ। इनको क्या खुद महसूस होगी किसी गूंगे की संवेदना? क्यों किसी अधायपक के ज़रिये ख़ून में सुर्ख हरारत हो? क्यों यह सब चाहते हैं कि अध्यापक ही सब घोल घोल कर घुट्टी की तरह ब्लैक बोर्ड पर लिखता रहे?

क्या इन सबका इयत्ता अमानुषीकरण सिर्फ आदेशों के पालन के लिए ही रह गया है? सारे के सारे मेरे सामने उद्दंडता की सीमा पार करे जा रहे हैं।

गिनके चौदह बच्चे हैं दो चार बाहर हैं। इतने में बातचीत कब शोर में बदल जाए उन्हें नहीं पता। क्लास में एक हकलाता है उसे तो छोड़ते नहीं हैं पर जब कहा है गूंगे के बारे में लिखो तो सब के सब उस लड़के की तरफ मुड़ गए।
12:09 pm

छठा ख़त्म होने को है। टीचर नहीं बच्चे नहीं। सारी क्लासें बेगानी सी किसी इंतज़ार में हैं कि कभी तो बैठा करें, कुछ आकर लिख पढ़ लें। कॉमर्स की क्लास है। कुल चार हैं। तीन खिड़की से निचे प्रायमरी विंग और मेन गेट की तरफ झांक रहे हैं। चौथा सिर निचे करके सो रहा है। उसकी शर्त के पीछे कन्धों की तरफ शाहिद लिखा है। उसका असली नाम मनीष है। पर कोई जानता नहीं।
12:39 pm
***

पीछे के दो-चार पन्ने:
सीधे एग्जामिनेशन हॉल से
न समाज एकरेखीय है न बच्चे
दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का पन्ना

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...