फ़रवरी 25, 2013

जुगाली करता प्रेम और एक कमज़ोर सा चुप्पा नायक

कभी-कभी मुझे लगता मैं बंगाली क्यों नहीं हुआ। हो जाना चाहता था तुम्हारी तरह। बिलकुल तुम्हारी तरह। क्यों नहीं हो सका पता नहीं। तुम्हारी तरफ झुक गया। समझ नहीं पाया। कुछ भी पता चलता वैसा ही सोचता। पर यह भी तो है के कभी तुमसे पूछा भी तो नहीं। बस अंदर ही अंदर तुम्हे देखता रहा। बिन बताये। दिन रातें में तब्दील होती गयीं। रात दिन बनते गए। और मैं वही उन दोनों के बीच तुम्हे ढूंढ़ता रहा। तुम्हे नहीं आना था तुम नहीं आई। मुझे इंतज़ार करना था। इंतज़ार करता रहा।

सोचता कभी मिलेंगे। बैठेंगे। तब बता सकूँगा। अपने अंदर की झिझक। और गले में फंसी हुई कई सारी ढेर ढेर बातें। उनमें सिर्फ तुम होती। उनमे सिर्फ मैं होता। उनमे सिर्फ हम दोनों होते।

एक बार ऐसे ही ख़याल आया के तुम्हे कहूँ के इस शनिवार ओखला स्टेशन पर मिलना। हम दोनों किसी बेंच पर होते। बिलकुल अगल-बगल। तब कहता अपने दिल के पीछे की सारी कहानियाँ। के कब से तुम्हे सब बताना चाह रहा था। बताने में मेरे हिस्से बहुत कुछ होता। तुम्हारे जिम्मे सिर्फ सुनना होता। बोर होने ही नहीं देता। ऊबने लगती तो तुरंत उस जारी वाले कुर्ते की बात करने लगता। जो हम दोनों ने किसी दूकान पर देखा था। और तुमने उसकी कीमत देख सिर्फ हलके से दायीं तरफ मेरे आँखों में कुछ कहा था। सुनाई सिर्फ मुझे दिया था। उन दो बहनों को नहीं। जो घर जल्दी जाने को कह रही थीं।

वो दोपहर कभी नहीं आई। आई वो दोपहर जब ऑटो कर हमने वक़्त से पहले फैकल्टी पहुँच जाना था। फिर हमें कभी नहीं मिलना था। मेरे पास सिर्फ रह गयीं कुछ यादों की कतरनें। कुछ सपनों के टुकड़े। कुछ आड़ी तिरछी अपने हिस्से की कहानियाँ। और सबसे ज़यादा रह गयी तुम।

उन दिनों रात हो जाने का इंतज़ार करता और हाथ में फोन लेकर कई-कई बार छत नाप चुकने के बाद एक बार फिर खुद को मना करता और चुप, गर्दन झुकाए कमरे में आकर बैठ जाता। हिम्मत शायद गलत शब्द होगा। पर शायद मुझमे यही कुछ कम रह गयी थी। आमों के पेड़ हर साल बौराते पर उस साल मेरे मन में पतझड़ ही रहा। सिर्फ उसी साल नहीं। आगे आने वाले कई कई सालों तक। उन सालों तक जहाँ मुझे जूझना था। खुद से उन सारे दिन रातों से जहाँ मैं हर रोज़ सिर्फ हार रहा था। खुद से। खुद से कई जवाब मांगता। पर नहीं मिलते। मिलती उलझी हुई उलझने।

तुम्हे कभी फूल देने की सोचता। उस दिन भी नहीं जब पता चला कल तुम्हारा जन्मदिन है। चुप रह गया। के कुछ नहीं मालुम। किसी चुप्पे की तरह बैठ गया था जाकर सीढियों पर। हाथ में न पता कौन सी किताब थी। पर तुमने पास आकर सबसे पहले वही किताब देखी। और पूछने लगी के कहानी अच्छी लगती है मुझे। पता नहीं क्या कहा था। मैंने तुम्हे। शायद कुछ देर के लिए तुम्हे देखता ही रह गया था। कह नहीं पाया। के एक कहानी लिखना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ। तुम्हे पता ही नहीं चलने दिया।

बस यही चाहता था के तुम साथ कुछ देर बैठी रहो। बिन बोले। मैं देखता रहूँ। तुम्हारी तरफ। ऐसा नहीं है हम दोनों उन दरमियानों में पहले कभी नहीं मिले थे। पर उधर कुछ दिनों से कुछ कुछ सोचने लगा था तुम्हे लेकर। बस्स यहीं आकर तो मैं चुप हो जाता। बिलकुल उस चोर की तरह जिसकी चोरी न पकड़ी जाए। इसलिए वो बस कनखियों से बस अपने बचे रहने की जुगत भिडाये रहता है। वो तो मैं आज समझ पाया हूँ के वो दोनों बहनों की जुगलबंदी हॉल्ट कर देर से क्यों आती थी। बस अगर उन दिनों कुछ भी ऐसा पता होता तो अपनी कहानी ऐसी किसी मोड़ पर अटकती नहीं।

मोड़ कभी चाहा नहीं था। न ही कोई खुबसूरत मोड़ था। जहाँ से छूटने चले जाने की प्रक्रिया को शुरू किये जाने का मुहूर्त देख लिया गया था। पर ज़िन्दगी किसी ढर्रे पर नहीं चलती वो बस चलती रहती है। चलती रही। और हम बिन बताये छूटते रह गए। कभी न मिलने के लिए। आज तक हम दुबारा नहीं मिले हैं। न कभी लगता है मिलेंगे। मिल भी गए तो पहचानने में मैं ही पीछे हट जाऊं। शायद। या उतना ही तुम भी खिसक जाओ। पर उन दिनों के हिस्सेदारी में तुम्हारा भी उतना ही हिस्सा है जितना मेरा। भले तुम्हे पता नहीं चल पाया। पर आज भी लायब्ररी तुम्हारे साथ ही जाने के मौके ढूंढ़ता था। के कहीं कोई याद का टुकड़ा मेरे हिस्से के साथ तुम्हारे यहाँ भी चला जाये। के कभी हमें भी याद कर लेने के कोई दो चार बहाने तो हों।

सोचता हूँ अच्छा हुआ हम नहीं मिले। मिलना ज़रूरी भी नहीं। हम न मिलने के लिए ही मिले थे। यह पिछली पंक्तियाँ मुझे ढक भी नहीं पा रही है। क्योंकि झूठ ऐसे ही होता है। लिजलिजा। कमज़ोर। झीना। उस दूकान पर आज भी अटका हुआ हूँ जहाँ वो ज़रीदार कुर्ता टंगा हुआ है। मुझे ही पता है यह अलगनी भी मेरा ही एक झूठ है तुम्हे ढकने के लिए।

{खैर इसे हफ़्ता दस दिन पहले आना था। पर कुछ नहीं। अब सही। }

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