फ़रवरी 03, 2013

सिनेमा की संभावनाओं का शैक्षिक पाठ

{पीछे से जारी..} प्रस्तुत शोध से यह बात बिलकुल स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आयीं हैं कि सिनेमा को लेकर पुरानी प्रस्थापनाओं की जगह अब नयी व्याख्याओं को स्थान देना होगा। सिनेमा संभावनाओ से भरा संसाधन है जिसके रचनात्मक उपयोग की तरफ हमें बढ़ना होगा। फिल्म दूसरे माध्मों की अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली माध्यम इसलिए है क्योंकि आवाज, चित्र, दृश्यों के साथ मानव अनुभव का सम्पूर्णता में सम्प्रेषण कर पाने में सक्षम है। फिल्म सामान्य साधारण मनुष्यों की भाषा बोलती है। यह एक शक्तिशाली संसाधन है जिससे अधिगम-अस्मिता निर्माण और सामाजिक परिवर्तन को आकार देने की क्षमता है।

बच्चे फिल्म के साथ अन्तःक्रिया करते समय निष्क्रिय न होकर उसे अपने जीवन से भी जोड़ते चलते हैं। उनके सामजिक प्रत्ययों पूर्वाग्रहों को फिल्म के उपरान्त परिचर्चा के माध्यम से सरलता से जाना जा सकता है। सिनेमा की तीव्रता, देखने की क्षमता और अनुभव कुछ ऐसे होते हैं जो उसे रोकेते हैं। दर्शक तेजी से आंखों के सामने से गुजर रहे फिल्मांकन से वंचित नहीं होना चाहता, अत: ऐसे में सुस्थिर चिंतन-मनन का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

लेकिन यहाँ हम देखते हैं कि बच्चे सक्रीय रूप से अपनी भागीदारी कर रहे थे। इस प्रक्रिया से यह भी ज्ञात किया का सकता है कि उनके संज्ञान में उनकी लिंगीय भूमिकाएँ क्या आकार ले रही हैं। यह उस वृहतर शिक्षाशास्त्रीय में शिक्षक की सहायक हो सकती है जहाँ आज जो विद्यालयों में जो प्रवेश करते हैं वे इन संचार माध्यमों के कारण बाहरी दुनिया के बारे में पहले से अधिक जानते हैं। उनकी जिज्ञासा ज्ञान सामग्री अभिवृत्तियों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। जीवन की स्थितियों के फलस्वरूप उनका मानसिक जगत पुराने बच्चों से अधिक चुनौती की मांग करता है।

फिल्म के शिक्षण का एक अर्थ यह भी है कि वे न सिर्फ उन बच्चों द्वारा लाए जा रहे अनुभवों का सम्मान करें अपितु विशिष्ट समस्याओं से उन अनुभवों को जोड़े भी। साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि वह कक्षा स्वयं में कहाँ स्थित है। इस शोध में यादृच्छिक रूप से चुने गए शिक्षकों ने सिनेमा को सशक्त माध्यम तो माना है परन्तु वे इसका उपयोग किसी भी स्तर अपने विषय से जोड़ कर नहीं कर रहे हैं। इस सन्दर्भ में वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए इसका एक कारण अतिरिक्त कार्यभार को बताते हैं, वहीँ इस माध्यम का उपयोग वे किस रूप में करें इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में स्वयं को असहाय पाते हैं। बच्चों को पाठ्यपुस्तक निर्धारित समयावधि में समाप्त करने के दबाव भी काम करते हों तब इसे एक अतिरिक्त कार्यभार की तरह ही देखा जाता रहेगा।

इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि जब व्यवस्था द्वारा 'कम्पूटर आधारित अधिगम कार्यक्रम', 'कैल लैब' को स्थापित किया जाता है तब समय सारिणी में उसके लिए स्थान भी निकाला जाता है और नियमित कक्षाएं भी होती हैं। इसी तरह वे सिनेमा के सन्दर्भ में कोई व्यवस्था चाहते हैं। यह भी देखने में आया कि जहाँ भी सिनेमा का उपयोग किया जा रहा है वहाँ उसके विषयगत प्रयोग को लेकर एक प्रकार की उदासीनता है। भाषा के अध्यापक ने तो इसकी किसी भी प्रकार की सक्रिय भूमिका से इन्कार ही कर दिया था। वहीँ जिन विद्यालयों में सिनेमा दिखाया जा रहा है वे इसकी उपयोगिता केवल और केवल सिनेमा के नकारात्मक प्रभाव को कुछ कम करने के उद्देश्यों में प्रयासरत दिखते हैं।

शोधार्थी को ऐसा इसलिए भी लगा क्योंकि एक तरफ वैश्विक होता संचार माध्यम है जिनके मूल्य शिक्षा के मूल्य के प्रतिपक्ष में समरूप संस्कृति के आग्रह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज रहे है वहां भले आप स्कूल में कुछ दृश्य काट दें पर यह विद्यालाओं की ही जिम्मेदारी है कि वे उन छात्रों में आलोचकीय चिंतन को प्रोत्साहित करते जिससे वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो पाते।

दूसरे शब्दों में यह उतना ही सच है कि कहीं न कहीं माध्यम भी अपने साथ सीखने-सिखलाने के तरीके लाता है। पर इस माध्यम का उपयोग आलोचनात्मक रूप से करने की जरूरत है क्योंकि एक तरफ मानवीय मूल्यों की तरफ ले जाते शिक्षा के वृहत्तर लक्ष्य हैं तो दूसरी तरह इस माध्यम पर नियंत्रकों के लक्ष्य। जो विपरीत दिशा में जाते हैं। एक तरफ वैविध्यपूर्ण संस्कृतियाँ हैं तो दूसरी तरफ समुदायों के समरूपीकारण का आग्रह। दोनों के बीच द्वन्दात्मक संबंध हैं। जिसके बीच हमें यह देखना होगा कि कैसे इसे विवेकीकरण की प्रक्रिया का साझेदार बनाने की तरफ मोड़ा जाए एवं शिक्षा के साथ उसे एक रचनात्मक अन्विति में कैसे गढ़ा जाए? एक और बात जो यहाँ ध्यान देने वाली है कि विद्यालय सिनेमा का उपयोग करते समय वे 'प्रद्योगिकी सापेक्ष' चिंतन से आगे नहीं बढ़ पाते हैं न ही अपने विषय विशेष के लिए इसके रचनात्मक प्रयोग की रूपरेखा प्रस्तुत कर पाते हैं।

यहाँ शैक्षिक तकनीकी आधार पत्र को उद्धृत करना अति आवश्यक हो जाता है जहाँ वह कहता है कि "शैक्षिक तकनीकी सिर्फ उपकरण आधारित कार्य नहीं है वह वैकलिपक पद्धतियों-माडलों का समुच्चय है। शिक्षक को लेकर चली आ रही धारणा भी पूरी तरह बदलनी होगी। उसे पुरानी भूमिका से निकल आगे का एक मददगार या मार्गदर्शक बनना होगा। यह तकनीकी के बदले 'सीखने की संस्कृति' पर ज्यादा बल देती है।" जबकि पाठ्यपुस्तकें ऐसे उदाहरणों के साथ यहाँ उपस्थित हैं जो फिल्म को फिल्म की ही तरह नहीं देखते बल्कि वे फिल्मों को 'पाठों'(टेक्स्ट) की तरह प्रस्तुत करते हैं। वहां इन वैकल्पिक युक्तियों, प्रयोगों, प्रवेशद्वारों की श्रृंखला हैं जिनमें गीत हैं , दृश्य हैं , घटनाएँ हैं , जीवंत भाषाएँ हैं, किस्से कहानियाँ हैं।

इस तरह फिल्म को रुढ़ शब्दावली में केवल दृश्य श्रव्य माध्यम के रूप में देखने के अलावा इन्ही रूपों में और रास्तों की खोज में निकलना होगा। जिसकी तरफ 'अंकुर' जैसी संस्थाएं बढ़ कर वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र निर्मित करने के प्रयास में हैं। आधारभूत ढाँचे और पाठ्यपुस्तकों के उदाहरण भारतीय परिप्रेक्ष्य में विद्यालयों में मूलभूत संरचनागत संसाधनों के अभाव में दूसरा अर्थ भी देती हैं जिसे इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए कि उन विद्यालयों में वह तकनीकी जो यंत्र आधारित है उसकी कोई ज़यादा उपयोगिता नहीं रह जाती। वहाँ यह पाठ्यपुस्तक ही है जो उन क्षेत्रों में सिनेमा और पाठ्यपुस्तकों की रचनात्मक अन्विति की तरफ भी हमें ले जाती है।

सतही तौर पर यह विरोधाभासी स्थिति प्रतीत होती की जहाँ मूलभूत विद्यालयी ढाँचा तक नहीं वहाँ सिनेमा किस रूप में पहुँच रहा होगा। लेकिन ध्यान से देखने पर हमें पता चलेगा कि हम दो भिन्न भिन्न प्रक्रियाओं को एक ही दृष्टि से देख रहे हैं। विषयांतर से बचने के लिए इसे स्पष्ट करता छोटा सा उदाहरण ही काफी होगा कि जहाँ राज्य की व्याप्ति सड़क के रूप में दूर दराज़ के इलाकों में नहीं है वहाँ किसी निजी कंपनी का मोबाईल टावर भी दिख जाते हैं। इस व्याख्या में न भी जाएँ तो वहाँ दूरदर्शन की उपस्थिति तो है ही, और उन पर आती फ़िल्में कौन देखता है।

शिक्षा को इकतरफा रूप से प्राप्त की जाने वाली वस्तु की जगह इसमें दोतरफा संवाद बनाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। जहाँ शिक्षाशास्त्र मात्र एक तकनीक या प्रविधियों का सेट न रह कर, शिक्षक के लिए ऐसी स्थितियों की संभावना पैदा कर पायेगा, जहां शिक्षार्थी कक्षा के सिद्धांतों को उसके बाहर की परिधि में ले जाने में सफल होता है। इसके लिए एक संसाधन के रूप में स्कूल के समय को लचीले ढंग से नियोजित किए जाने की जरूरत है। जहाँ हम सिनेमा का उपयोग उसकी सम्पूर्णता के साथ एक सशक्त शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में कर पाएंगे।

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