फ़रवरी 05, 2013

बदलने जाने की बीती दरमियानी

इधर सब कह रहे हैं मैं कुछ बदला हूँ। पहले जैसा नहीं रहा। जिनसे मुलाक़ात नयी हो पुरानी हो, सब। क्या यह कुछ-कुछ वैसा ही है के हमारे सामने हमारी शक्ल बचपन से लगातार बदलती रहती है और हम देख भी नहीं पाते। शीशा रोज़ देख रहे हैं फिर भी नहीं। और जो बदला है वो कभी भी सामने नहीं आ पाता। भले वह वहीँ हमारे दायें बाएं घूम रहा हो। हमारे साथ हो। फिर भी नहीं। यह भी पूरी पूरी संभावना है के जो हमारे आस पास को बदलता दिख रहा हो उसे वैसे ही हो जाना था। पर बदलना तो बदलना ही है।

समझ नहीं पा रहा हूँ के कैसा सा होता जा रहा हूँ। इसे वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम माना जाये या कई-कई दिनों तक एक जैसी स्थितियों में रहने की जुगुप्सा के बाद उत्पन्न कोई प्रतिक्रिया। प्रतिक्रिया इस रूप में कि वहां से भाग कर ऐसी जगह आ जाना जहाँ खुद को भी पहचानने में थोडा वक़्त लगे। जान पहचान खुद से भी बहुत ज़रूरी है। क्यों तुम्हे नहीं लगता..नहीं लगता तो लगने लगेगा!

फिर वही उन घिसे पिटे दिनों को नहीं लिखना चाहता जहाँ से चल कर यहाँ तक पहुचे हैं पर मुझे बनाने में कहीं न कहीं उनकी भूमिका ज़रूर है। अपने उस मित्र का नाम नहीं लिखूंगा जिसने कहा था के तुम लिख इसीलिए पा रहे हो क्योंकि तुम बोलते कम हो। न तुम्हारा नाम किसी को बताऊंगा कि तुमने कल मुझे कहा के मेरी सारी बातों का शिकार मेरी डायरी सबसे पहले बनती है। और न राकेश का नाम कहकर लिखूंगा के उसी ने मुझे पहली बार लिखा कि तुम्हारी जटा जूट और वस्त्रों के साथ प्रयोग उदासीनता की नहीं प्रतिक्रियात्मक का सा बोध कराता है प्रतिक्रिया चीजों को तोडती ज़रूर है, परन्तु संरचना के आभाव में गैर ज़िम्मेदाराना हो जाती है।

लगता है धीरे धीरे अपने आस पड़ोस को देखकर वहां बनते दबावों से बच निकलने के लिए हम सब कभी न कभी कहीं एक अदद चोर दरवाज़े को तलाश ही लेते हैं। मेरी खोज पूरी हुई मेरी कलम के साथ और कुछ हद तक इस ब्लॉग पर पहली पोस्ट जाने के बाद। मेरी डायरी के पन्ने उन दिनों के साथी हैं जब एक एक कर दोस्त छिटक रहे थे। बिन बताये। अकेले पड़ जाना उन दिनों की सबसे बड़ी त्रासदी जैसे दिन थे। कोई भी मेरी बात सुनने वाला नहीं था। अकेला बैठा गुमसुम सा इंतज़ार करता। पर कोई आता नहीं।

यह बिलकुल उन दिनों की बात है जब हमारी ग्रेजुएशन के दिन ख़तम हो रहे थे और मैं अजीब सा होता जा रहा था। किसी से अपने दिल की बात नहीं कहना। छिपाए रखना। छिपाना दबाने जैसी पीड़ा के साथ दिल की किसी ब्लैक होल में दबाये रखने की टीस जैसा होता गया। उम्र बिलकुल उस तरफ झुक रही थी जहाँ एक अदद लड़की के लिए दिल के किसी कोने में कई-कई नरम कोने एक साथ उग आते हैं। रातों को जागना था। जगा। कहना था। कह न सका। कैसे कहूँ इसके कई सारे मजमून तय्यार करता पर एक भी न जंचता..

सोच रहा था इनको नहीं लिखूंगा। पर क्या करूँ। फिर क्या हुआ? वही जो होता है। न कहने। कह पाने के बाद दिन बड़ी जल्दी उड़ते नहीं जाते अटका देते हैं। अटक गया। उलझ गया। और तब शुरू हुआ मोहभंग का सिलसिला। ऐसा वैसा नहीं वैचारिक लबादे में ओढ़ा हुआ। उसकी पैकिंग नए सिरे से की गयी कि कथनी और करनी में कोई फांक न रह जाए। 'प्रैक्सिस' से तो तीन साल हुए मुलाक़ात हुई। और न किसी को इस सबकी पूर्वपीठिका की सेंध भी लग सके। कि 'वन साइडेड लवर्स एसोसिएशन' के मनोनित सदस्य हैं।

ऐसा नहीं था कि मैंने छद्म आवरण ओढ़ लिया था, पर मुझे मालुम था इस विलासिता को ज़यादा दिनों तक उपभोग करते रहना संभव नहीं होगा। इसलिए भी जितना हो सका उतना उन सको ताक़ पर रखकर चलता। किसी को भी कुछ नहीं समझता। समझता तो आज भी नहीं हूँ, पर उसकी धार को थोड़ी देर के लिए विलंबित कर मिलता हूँ। फिर एक-एक कर उन्ही प्रचलित औजारों में घुसपैठ..अरे! तुमसे ये सब क्यों कह रहा हूँ, तुमने थोड़े विचारधारा में बीए-फीए किया है..!! वो तो..चलो छोड़ो..

तो ऊपर हम थे डायरी के पास। यही पन्ने तो थे जिनसे कुछ देर बोल लिया करता था। अभी भी करता हूँ। इनको खूब डांटता भी था के मेरे सब बातों को जान लेने के बाद भी मुझसे उस पर बात नहीं करते थे। एक शब्द भी इनसे नहीं बोल जाता था। आज भी मेरे हिस्से की कई बातें सिर्फ इनके हिस्से हैं। उन निपट अकेले क्षणों में जब सबसे अकेला होता मेरे पास यही डायरी होती। कहीं भाग भी तो नहीं सकती थी न। इसे सब कुछ पता है। अभी भी कई बातें हैं जो नहीं कह रहा हूँ। आगे के लिए बचाकर रख ली हैं।

शायद यह मेरा ही विस्तार हैं, जिन्हें ऐसे ही होना था। एक विस्तार इधर तुम बनती दिख रही हो। तुमसे भी बिन किसी परदे दारी के सब कह देना चाहता हूँ। कुछ भी छिपाना नहीं चाहता। और जो तुमने कहा न के मैं बदल रहा हूँ। तो मोहतरमा उसमे आपकी भागेदारी भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी मेरी। हमेशा से चाहता था के एक हांड माँस के जिन्दा व्यक्ति से अपने दिल की सब बातें कहूँ। अगर यकीन नहीं होता तो मेरी डायरी से पूछ लेना। मैं नहीं बता पाया तो वो तो ज़रूर ही बता देगी..पर क्या करूँ ये जो फोन का बिल है न कभी-कभी रोक देता है..इतना तो आप समझ ही सकती हैं न..!!

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