फ़रवरी 07, 2013

विज्ञापनों में छिपी देह राजनीति

अभी बहुत दिन नहीं बीतें हैं जब दूरदर्शन पर वह विज्ञापन प्रसारित होता था जिसमे एक बड़ी सी हवेलीनुमा इमारत के सामने विस्मय से भरे कुछ लोग उतरते दिखाए जाते हैं। शायद रिश्ता लेकर आये थे। लड़की उनकी, लड़का हवेली वालों का। पर कुछ ही सेकेण्ड बीतते हैं और उनका विस्मय पहले आश्चर्य फिर जुगुप्सा जैसे किसी भाव में तब्दील हो जाता है। क्योंकि उन सेकेंडों में इत्ती बड़ी इमारत से कुछ महिलायें झुण्ड बना कर 'शौच' को जाती दिख जाती हैं। गाड़ी जैसे ही पलटती है वहां चारदिवारी के भीतर एक दिवार से चिपकी फोटो की मूंछे नीची हो जाती हैं। यह अलग पूछे जाने वाला सवाल है के जिनके मूंछे नहीं होती उनके साथ शरीर के किस अंग में ऐसी कोई प्रतिक्रिया होती है और साथ में यह भी के क्या उनके पास इतनी बड़ी इमारत होती भी है या नहीं।

खैर, 'मेरी शादी हो उस घर में शौचालय हो जिस घर में' का यह 'दृश्य काव्य' है जिसको विखंडित कर कुछ और बातें साफ़ दिख रही हैं उनका लिखा जाना ज़रूरी है। उसमे पहली यह के क्या इतनी बड़ी हवेली का रुतबा गाँव खेड़े में अब जाता रहा है, जिस भय की व्याप्ति इन इमारतों के इर्दगिर्द पहले किसी जमाने की ठसक लिए होती थीं उनमे अब कोई दम नहीं बचा है (इस संदर्भ में तिग्मांशु धूलिया की साहिब बीबी और गैंगस्टर ज़रूर एक पाठ मुहैया कराती है पर उसपर फिर कभी)। ऐसा इसलिए के वहाँ बाहर जाती एक महिला नहीं पूरा का पूरा झुण्ड है। मतलब कहीं खेत-ताल-तलइये के आसपास कहीं कोई ऊँच नीच हो जाती है तो उसका ज़िक्र वह स्त्री घर में नहीं करेगी। इसलिए पहले से ही सुरक्षा के इंतजाम कर लिए गए हैं।

यहीं वह बिंदु है जहाँ एक साथ कई-कई संदर्भ याद आ रहे हैं। इधर विद्या बालन वाले 'निर्मल भारत अभियान' के जिन जनहित विज्ञापनों में दिखाई दे रही हैं वही देह की राजनीति को सिरे से फिर मजबूत ही कर रहा हैं। पुरुषसत्ता के लिए दोबारा गढ़ रही है। एक-एक कर उठाते हैं। सबसे पहले प्रियंका भारती। डाकघर में चिट्ठी पोस्ट कने से पहले प्रेषक का नाम लिख रही थी के विद्या की नज़र पड़ी और शुरू हो गयी गाथा। अपनी 'इज्ज़त' और 'स्वच्छता' की खातिर अपने लगन (गौने) के दूसरे ही दिन अपना ससुराल छोड़ने की हिम्मत दिखाई। अपने मरद से शौचालय बनवाने की मांग की। सुना उसने? एक महिला बोली। जब सोच और इरादा नेक हो तो सब सुनते हैं जैसे इसके मरद ने सुना। आप भी अपने घर में शौचालय बनवाये और इस्तेमाल करें। जहाँ सोच वहां शौचालय।

यह स्त्री की देह ही तो है जिसके इर्दगिर्द यह विज्ञापन गढ़े जा रहे हैं। कई बातें गड्ड-मड्ड करके कोई और ही पाठ बनाया जा रहा है। 'स्वच्छता' को 'इज्जत' के साथ जोड़ देना ऐसी ही बौद्धिक चालाकी है जहाँ चुपके से उनको देह के घेरे में कैद कर देने में समाज का स्थायित्व निहित है। जब तक देह ढकी है तभी तक इज्ज़त बची है। उसका निर्धारण पुरुष ही कर रहा है। कितना कहाँ दिखाना है, कहाँ छिपाना है सब 'पब्लिक' और 'प्राइवेट' स्फीयर का मसला है। हम शहरों में स्त्री शौचालय नहीं बनाते इसलिए निर्मल भारत अभियान सिर्फ ग्रामीण इलाकों का कायाकल्प करने में जुटा है। या शहरों में 'जनसुविधा' की परिभाषा में औरतें अटती नहीं हैं। या यहाँ 'देह की राजनीति' दूसरे तरीके से हमें अपना शिकार बनाती है।

सारा डर किसी परपुरुष द्वारा उनके लिए नामित- इसे पढ़े गढ़ी- स्त्री के उपभोग का है। यही तो विद्या का दूसरा विज्ञापन कहता है। दृश्य शुरू होता है पप्पू बैंड के वाद्य यंत्रों से। कि तभी एक बुज़ुर्ग उन्हें डपटते हुए बाजा बजाना बंद करने को कहते हैं। अरे बंद करो ये, निपट गया ब्याह..!! और मूंछों पर ताव। ध्यान देने लायक है मूंछें। अब नयी नवेली बहू बिना घूँघट उठाये पानी कैसे पिए इस कौशल के लिए सास ज़रूरी बातें भी नहीं कह पायी है। के ससुर इशारा करता है। इशारा सास तक पहुचता है फिर दूल्हे तक। दुल्हन तत्काल घूँघट नीचे कर लेती है। घूँघट नीचे सरका, मूंछे ताव की अँगुलियों के साथ ऊपर।

तभी बहू विद्या के कान में कुछ कहती है। ध्यान देने लायक है 'यह' 'कहना'। जहाँ ऐसी बातों की साझेदार दूसरी स्त्री ही हो सकती है, कोई पुरुष नहीं। भले पति बगल में बैठा प्लेट चाट रहा हो या उड़ा रहा हो। काकी घर में शौचालय कहाँ है, बहू को..बात पूरी भी नहीं होती कि काकी उवाची, घर में कहाँ खुले में ही जाना पड़ेगा। अब बारी कन्या पक्ष की थी। बहू फिर तो तुम घूँघट भी खोल ही दो। पीछे बैठे ससुर के चहरे पर आते जाते भाव पढ़े जाने लायक है। के कैसे उन्हें साँप सूंघ जाता है। एक तरफ तो आपको बहू का घूँघट भी सरकाना गँवारा नहीं है और दूसरी तरफ उसे खुले में..?!

यह बात अलग है के कहाँ वधु पक्ष ऐसी किसी गैर ज़रूरी सवाल को उन क्षणों में उठा पाता होगा जहाँ दहेज़ पर ही हायतौबा पहले से मची हो। ख़ैर, देखने लायक बात तो यह भी है के यहाँ सारा दृश्य रच गया है, वर के आंगन में। ध्यान दें। कि काकी मारे शर्म के कह नहीं पाती के बहु को तो अब खुले में ही जाना होगा। यह उस विज्ञापन निर्माता की सांस्कृतिक कमजोरी ही है जहाँ शादी का इच्छुक वर अपने लाव लश्कर के साथ लड़की के यहाँ जाता है। जिसे बरात कहने का रिवाज़ है। पर यहाँ क्या हो रहा है। दुबारा देखें कि शादी हो चुकी है इसका संकेत ससुर दे रहा है और काकी से यह पूछे जाने पर के कन्या अब कहाँ जाए वाले सवाल पर दुल्हे की माँ शर्मिंदा होती हैं और ससुर की मूंछ नीचे आ जाती हैं। खैर, वापस..

पिछले पैरा का अंतिम वाक्य बार-बार पढ़ा जाना चाहिए जिसमें एक फाँक तो पकड़ी जाती है पर तुरंत उसे ढक दिया जाता है। क्या यह विरोधाभास हमारे समाज की पहचान नहीं बनता जा रहा है। इन्हें बनाये रखना शायद इस समाज को बनाये रखने जैसा है। तभी युनिसेफ ऐसी योजनाओं के लिए तो वित्त/ऋण देता रहा है पर उन देशों की आमूलचूल संरचनाओं को छूता भी नहीं है। वरना ऐसा क्योंकर हुआ के इन विज्ञापनों की खेप में सिर्फ मूंछों पर ताव तो है, दाढ़ियों पर हाथ फिराते चहरे नहीं। और जो तीसरा विज्ञापन बचा रह गया है उसे खुद ही देख जानिये कि कैसे हमारे ग्राम्य समाजों में किसानों के घर खिसक कर घरों की ज़द तक आ गए हैं। उनपर मौका लगे फिर कभी।

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