फ़रवरी 09, 2013

पानी की देशज व्याख्या

उस दिन जबसे पानी वाली पोस्ट की है तभी से कुछ-कुछ छूटा सा लग रहा है। और यह छूटन उस 'मॉडर्निटी' के साथ आई। जहाँ से हम अपने आपको कुछ ज़यादा ही आधुनिक चेतस मानने लग जाते हैं और वहीँ गच्चा खाने की सबसे अधिक संभावना होती है। मुझे लिखते वक़्त बिलकुल भी एहसास नहीं था के अचानक प्रेमचंद की कहानी याद आ जाएगी और मेरी आधुनिकता मुँह के बल धड़ाम जा गिरेगी। फिर तो एक-एक कर कई सारी बेतरतीब बातें जिन्हें जोड़ने उधेड़ने का मन करता रहा। पानी पानी न हुआ अमलतास का पेड़ हुआ जा रहा था। कुछ कुछ समझने की कोशिश के साथ लिखने जा रहा हूँ।

शुरू करते हैं। 'ठाकुर का कुआँ' कहानी से। इसका कालखंड ठीक-ठीक नहीं पता। पर जहाँ यह घटित होती है उसी उत्तर भारत के एक धार्मिक शहर..नहीं नहीं, नगरी कहिये जनाब..वहाँ इनदिनों कुम्भ मेला चल रहा है!!

इस मेले पर भी बात करेंगे पर थोड़ी देर बाद। जो बात कहानी से गुज़रते वक़्त सबसे ज़यादा अपनी तरफ खींचती है वह है उस गाँव में कुओं की संख्या। और उन पर अधिकार के जातीय अधिकार के समीकरण। दो कुँए हैं। एक ठाकुर के पास। एक साहू के पास। उन बेगार करने खटने वालों के लिए दोनों जगह स्थिति शोषणकारी और दमनकारी ही है। पर 'गंगी' जाती है 'ठाकुर के कुएँ' पर। इसे सवाल की तरह ही पूछा जाना चाहिए। क्यों? प्रेमचंद कुओं पर जाने के बाद के परिणामों में से दो का ज़िक्र करते हैं। ठाकुर के कुएं पर जाने से 'ठाकुर लाठी मारेगें' और 'साहूजी एक के पाँच लेंगे'। मतलब एक अर्थ में हड्डी की टूट-फूट हो जाने पर बेगार में खटने वालों की संख्या कम हो जाने खतरा है इसलिए इलाज करवाने में वे एक हद तक आगे आ सकते हैं। पर साहू के महाजनी पाठ में रेहन पर गिरवी रखने के लिए छत भी न बचेगी। दूसरे अर्थ में कहानीकार दोनों शोषणकारियों में से एक को चुनता है। यह चुनाव उन दमितों का भी है। ऐसा लगने लगता है।

और जिस कुएँ में जानवर गिरकर मर गया है वह उन्ही की झोपड़ी की तरह गाँव के बाहर स्थित है। जहाँ अँधेरे में जाने के खतरे हैं। स्त्रियों के लिए। क्योंकि जोखू तो बीमार पड़ा है। वह जा नहीं सकता। यहाँ जोखू की घरवाली का नाम भी बहुत बारीकी से पढ़े जाने की मांग करता है। उसके माता पिता ने उसका नाम 'गंगी' रखा है। और उसमे 'पवित्रता' की जो ध्वनियाँ हमारे कान तक पहुँचती हैं उसमे से एक दो तो यही कहती हैं के जिस नदी के 'अपभ्रंश' रूप पर उसका नाम रखा गया है उस प्रवाहिनी के जल में डुबकी लगाकर धर्म विशेष के लोग सदियों से अपने पापों का कथित 'सफाई अभियान' चलाते आये हैं। कितने धुले-पुछे हैं इसका लेखा-जोखा चित्रगुप्त से कभी पूछा नहीं इसलिए बता नहीं सकता। पर इसी नाम की एक दलित स्त्री के वहां स्थित कुँए से पानी निकालने से पानी अशुद्ध हो जाने की शत प्रतिशत सम्भावना है। सिर्फ कुआँ चढ़ने भर से।

पर यहीं याद आती है 'हृदयेश ' की कहानी 'मनु '। जिस जातिगत समाज में कुँए के पानी का छू जाना उसे अशुद्ध अपवित्र जैसे 'सांस्कृतिक' मूल्यों से भर देता है वहीँ एक ब्राह्मण अपने कुएं को उलीचने के लिए नीची जाति के हुनरसाज़ को बुलाता है। शायद इसे ही 'सामजिक गतिशीलता' कहते हैं जहाँ जातियों के बंधन कुछ तो ढीले पड़े है या होंगे। उनमे संस्कृतीकरण की प्रक्रिया भी कुछ हद तक अबाध गति से चलती ही रही है पर अचानक हमारे भारतीय इतिहास में एक क्षण आता है जो मंडल आयोग के बाद हमारे समाज की गतिकी को हमेशा हमेशा के लिए बदलकर रख देने वाला साबित हुआ। कहानी का कालखंड यही समय है जहाँ कुआँ साफ़ करने की दर अचानक बढ़ जाती है और उन ब्राह्मण वर्ग से एक नीची जाति वाला व्यक्ति अब सीधे मुँह बात नहीं करता। बल्कि अबतो तू-तड़ाक पर अमादा हो गया है।

यह तो हमें कई दिनों बाद मालुम चला के जहाँ हम पढ़ रहे हैं वो वही देशबंधु कॉलेज है जिसे मेन गेट पर राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली थी। बिलकुल इस कहानी का मुख्य चरित्र भी अंत तक आते-आते खुद को उन परिस्थितियों से घिरा पाता है जहाँ से निकलना उसके लिए उस वक़्त संभव नहीं लगता। वे पुरोहित भी आत्मदाह करने की कोशिश करते हैं। कई साल पहले पढ़ी थी, इसलिए कह नहीं सकता के बचे या नहीं। पर इतना इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि जातियाँ यहाँ कई चोर दरवाजों के साथ मौज़ूद हैं। उनके हमारे समाज में कई-कई संस्करण है। सह-अस्तित्व तो बड़ा सकरात्मक सा शब्द है, इसकी जगह कहना चाहिए 'छद्म' का पैबंद। के सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला ' का 'बिल्लेसुर ' पुरी मंदिर जगन्नाथ में अपने मालिक के साथ एक ही पत्तल में भोजन इसलिए भी कर सका क्योंकि वहाँ की मान्यता के अनुसार वहाँ कुछ भी जूठा नहीं कहा जाता। कुछ भी अशुद्ध नहीं है। सब की भली करेंगे राम!

और ऐसा ही एक अवसर इन दिनों इलाहाबाद में चल रहा है जहाँ आने वाली मौनी अमावस्या पर साथ-साथ डुबकी लगाने वाले अगल-बगल जाति पूछ कर डुबकी नहीं लगाते हैं। इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए समझ नहीं पा रहा हूँ..या यहीं दिल्ली बैठा मैं यह कह तो रहा हूँ पर वहाँ जाने पर पता चले घाटों का जातिवार वर्गीकरण किया गया है..क्या इन डेढ़-दो महीनो के लिए जातियां टूट जाती हैं या उन्हें स्थगित कर दिया जाता है..?..पता नहीं..कई सवाल अभी भी सवाल की तरह ही खड़े हैं उन्हें समझने की कोशिशें लगातार करनी होंगी वरना हमारे पंचकुय्या रोड पर एक महापुरुष की मूर्ति लगी है और उनकी उठी हुई अंगुली को देख लोगों से यही सुनाई देता रहेगा कि वे कह रहे हैं, 'ठेका उधर है..!!'

{जिस पोस्ट का ज़िक्र सबसे शुरवाती पंक्तियों में आया है, उसका नाम है 'पानी पर कुछ फुटनोट '. पढ़ने के लिए उसपर क्लिक करें }

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