मार्च 11, 2013

विवाह योग्य लड़के

यह टुकड़ा दरगाह मेले के प्रसंग के साथ ही लिखा था। पर तब का बातचीत के क्रम को थोड़ा सुस्त कर देता इसलिए भी वहां से हटा लिया था। तब हम साढ़े सात बजे रात के आसपास मेला जाने की तय्यारी कर रहे थे, साथ ही वहाँ आई भाभी की बहिन को भी लेजाने के दबावों को महसूस कर रहे थे। और फिर जैसा होता ही है कुछ आवाजें ऊपर नीचे होने के बाद हम गए सात लोग ही। चार सायकिलों पर। एक सायकिल कमज़ोर भी थी। किसी से माँगी हुई।

खैर दो हज़ार आठ का एक और पुर्ज़ा..पिछली कड़ी {दरगाह मेले के बहाने से } के साथ बीच में कहीं भी लगाकर इसे पढ़ा जा सकता है।

हममे जो बड़के भईया हैं उनकी पत्नी माने हमरी भाभी की छोटी बहन भी पहले से प्रकट थीं और हमारी चाची के दामाद के यहाँ उनकी दूसरे नंबर की बेटी सैर सपाटे पर थी। दोनों अपनी अपनी बड़ी ब्याहता बहनों के यहाँ किसी शादी मुंडन को देखने हाजिरी लगाने के उद्देश्य से वहां नहीं थी। अब इन छोटी बहनों का अपनी विवाहिता बहनों के यहाँ बेमियादी प्रवास क्या संकेत कर रहा है कुछ कुछ समझ आ रहा है। 'नमक का दरोगा' में पिताजी के कलयुगी प्रवचन में यह उक्ति भी थी कि लडकियाँ घास फूस की तरह निरंतर बढती जा रही हैं। एक मतलब यह भी कि इन्हें खरपतवार की तरह उखाड़ कर 'अपने घर' भेज दिया जाना ताकि एक बोझ तो कम हो।

यह भी समझ आया कि माता पिता लड़की जल्दी बड़ी होती क्यों आँखों में खटकती रहती है। शायद इसलिए कि वे लड़कों के मुकाबले इन भौगोलिक परिस्थितियों में जल्दी शारीरिक परिपक्वता प्राप्त कर लेती हैं। और नित्त कुछ समय पश्चात उनके कपडे छोटे होने लगते हैं। यहीं उनके खगोलविद पिता माता समेत यह गणना करने लगते हैं कि उनकी बिरादरी, पटीदारी, रिश्तेदारी, जाति में कितने विवाह योग्य लड़के हैं और आगे आने वाले समय में होने वाले हैं- विवाह योग्य!

और इसी उधेड़बुन में वे अपने दामाद को 'आधी घरवाली' की कुछ दिन तक पहरेदारी करने का जिम्मा सौंपते हैं। ताकि तुम भी हमें इस बला से छुटकारा दिलाने में हमारी मदद करो। हम तो दिमाग खपा खपाकर सूख कर काँटा होते जा रहे हैं।..जबकि लड़कों की स्थिति में यह सारे तर्क कसौटियाँ बेमानी प्रतीत होती हैं और वे तब तक इंतज़ार करने में विशवास रखते हैं जब तक कोई मोटी आसामी उनके जाल में न फँस जाए ताकि बाकी बेटियाँ भी उस 'वैतरणी' को पकड़ कर पार हो सकें..

इनके साथ वह स्थितियाँ भी आती हैं जब हर माता अपने यहाँ आये हुए लड़के को देखते ही उसे अपने भावी दामाद के रूप में देखने लगती है और खुद को उसकी भावी सास मान बैठती है। फिर शुरू होता है अपनी सुयोग्य कन्या की प्रसंशा में चार चाँद लगाता वर्णन। कि उस के दिमाग में कोई छवि तो उभरे। साथ ही अपनी घास फूस की तरह बढ़ती बेटी को यह निर्देश देते हुए नहीं चूकती कि आगे से उस अमुक लड़के को 'भईया' पुकारने कहने की कोई ज़रूरत नहीं है, बात करो तो बिना इस संबोधन के! ..

जहाँ बैठा यह सब सोच रहा था वहां ऐसी ही एक सास अपनी पुत्रवधु को हिदायत दे रही थी की यह दवाई जो मैं तुम्हारे लिए लायी हूँ और चूँकि इसका दाम मैंने बीस रुपया अदा किया है इसलिए भी तुम्हारा ठीक होना अनिवार्य है। इस कथन के बाद उनके चहरे पर ऐसी मुस्कान आ जाती है मानो वे उसे समझा रही हों कि देखो मैं तुम्हारे सामने हट्टी कट्टी खड़ी हूँ और इस साम्राज्य को संभाले हुए हूँ तब तुम किस खेत की मूली हो ..मेरी सास तो मुझे इतना भी नहीं देखती भालती थी। ..लगता है औरत जात अभी भी बिना दवाईयों के ठीक हो जाती हैं जैसा रेणु 'मैला आँचल' में लिख चुके हैं।

आवाज़ें..

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