मार्च 12, 2013

'शोभा सम्राट थियेटर' का उत्तर आधुनिक पाठ

बिलकुल भी एहसास नहीं था के चार पाँच साल पहले दरगाह मेले में देखे शोभा सम्राट थियटर के बारे में दिल्ली आकर उस दरमियानी में लिखी कुछ पंक्तियाँ को लिखने के बाद उन्हें कोई अनाम अज्ञात व्यक्ति इस कला रूप को तलाशता गूगल सर्च कर उस पोस्ट तक जा पहुँचेगा। डैशबोर्ड में इस खोज को देखा तो लगा इसपर कुछ देर और रुकने की ज़रूरत है। इस रूप में इसकी कई और व्याख्याएँ होंगी..उन्ही में से कुछ को पकड़ने की जद्दोजहद में बैठ रहा हूँ..

अचानक मन में आया तो खुद भी गूगल कर देखा तो सबसे ऊपर पन्द्रह मार्च दो हज़ार बारह के दो वीडियो दिखे। किसी सिंघेश्वर मेले के हैं। हिंदी में टाइप करके सर्च करता रहता तो कुछ भी पता नहीं चल पाता। इस माध्यम में अंग्रेजी के अपने फ़ायदे हैं। जैसे ही अंग्रेज़ी में 'सिंघेश्वर मेला' लिखा, एक लाख से ज़यादा एंट्री दिखी। और यहाँ भी पहले यह नहीं पता चला के यह मेला मधेपुरा से आठ नौ किलोमीटर दूर सिंघेश्वर मंदिर पर लगता है। और सिंघेश्वरी भवानी कहाती हैं और सिंघेश्वर शिव हैं। यहाँ इस स्थान की पहचान को ढक लिया है शोभा सम्राट थियटर ने।

जो लोग इसे -इन्टरनेट को - आधुनिक माध्यम समझते हैं उन्हें फिर से दिमागी ओवर हॉलिंग की ज़रूरत है। क्योंकि खुद में आधुनिक लगता मीडियम उतना ही रूढीवादी है जितना हमारे समाज का ढाँचा। तकनीक के रूप में यह आधुनिक हो सकता है पर उपयोग के स्तर पर नहीं। क्योंकि माध्यम का स्वरुप उसके प्रयोक्ता ही निर्मित करते हैं। बनाते बिगाड़ते हैं। फिर यह पूछा जा सकता है इस समाज का ढाँचा कैसा है? हमारी अपनी सहूलियत के हिसाब से इसके कई उत्तर हो सकते हैं। और जहाँ से मैं इसे देखता हूँ वहाँ से यह मुझे अधिनायकवादी, पितृसत्तात्मक, निरंकुश, यथास्थितिवादी, प्रतिगामी होने के अलावा कुछ और नहीं लगता। इतनी थियरी इसलिए भी बघार रहा हूँ क्योंकि जो बाते आगे हैं उनके लिए कुछ ठोस आधार चाहिए।मजबूत पाये। इसलिए भी अगर आप अभी से असहज महसूस कर रहे हैं तो आप आगे न पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई बाध्यता नहीं है।

पर सबसे पहले इस शोभा सम्राट थियटर से पहले जो छवियाँ मौजूद थी।हैं। उन्हें एक एककर लेना ज़रूरी है। शुरू करते हैं 'वीसीआर' के साथ आई उन बरातों की जब पूरे गाँव के लोग खुले आसमान के नीचे धर्मेन्द्र जितेन्द्र मिथुन की फ़िल्में देखते थे या साथ आई 'नौटंकी'। कम ही बरातें होती जिनमे यह दोनों साथ आते। यहीं कहीं 'लौंडा नाच' भी रहा होगा और नसीबन के लिए बदनाम होते लौंडे। 'लिल्ली घोड़ी' को नाचते देखना कठपुतली के तमाशे जैसा। यह मनोरंजन की ग्राम्य व्याख्याएँ थीं जिनके बीच विशाल भारद्वाज बिल्लो चमनबहार एंड ऑर्केस्ट्रा, निशांतगंज, बिलावल को रचते हैं और उसके चार साल बाद अभिनव कश्यप मुन्नी को। भले वहाँ आधुनिकता के चिह्न न पाए जाते हो पर सिनेमाई गानों की भौंडी नकलों के सस्ते लुगदी संस्करणों की तरह शास्त्रीय के बिलकुल उलट उनके अपने रंग ढंग उत्तर आधुनिक मनों का निर्माण कर रहे थे। बैंड वाले 'ये देश है वीर जवानों' के साथ रेडियो पर नए सुने गाने की धुन बजाने की कोशिश ज़रूर करते। भले गाल गले नसों को फुला फुला कर दम निकाले दे रहे हों। वहां उमराव जान अदा नहीं थी तो क्या वहाँ मिस मीरा, चाँदनी, लक्की, सिमरन जैसे झूठे नामों के साथ स्त्री सॉफ्ट पॉर्न के रूप में तब भी वहां मौजूद थीं। हैं।

जैसे दिल्ली के लाल किले पर हर साल धार्मिक रामलीला कमेटियाँ अपने प्रवेश द्वारों को भव्य बनाने में खूब पैसा और कारीगर लगाकर किसी प्रसिद्द ईमारत की नक़ल करती हैं वैसे ही इस थियटर का मुख्य आकर्षण उनका यूएसपी होता है। जब भी लगता भीड़ कुछ कम होती तो परदे को कुछ देर के लिए उठा देते और अजीबो गरीब परिधानों मेकप में लिपी पुती देहों को देखने का कोई मौका वहाँ से गुज़रता शख्स नहीं छोड़ता। के उसका मन ललचाया और अस्सी सौ रुपये की टिकट खरीद कर अन्दर। कोई हिरामन हो और तीसरी कसम खा चुका हो तो बात अलग है।

इसका मूल चरित्र हमारे संविधान की तरह धर्मनिरपेक्ष ही है। भले वह बहराइच का दरगाह मेला हो या बिहार के मधेपुरा में लगने वाला सिंघेश्वर मेला। बिना भेद किये यह दोनों जगह सम्मिलित होता है। फिर यह भी के हमारे समाज के पुरुष भी धर्म के सापेक्ष अपने व्यवहार को बदलते नहीं हैं। वहाँ दर्शक दीर्घा में सबकी मौजूदगी इसे सत्यापित करती है। इससे धार्मिक सत्ता भी अपने समाज के ढाँचे के लिए किसी भी तरह का खतरा महसूस नहीं करती। मूलतः धर्म का ढाँचा भी तो यथा स्थितिवादी ही है। बस वे तो यही सोचते मंद मंद मुस्काते होंगे के उनके क्षेत्र में कोई देवदासी नहीं है। है भी तो किसी अज्ञात स्थान पर। उन्हें बस अपनी ज़मीन के किराए से मतलब है।

यह उत्तर आधुनिक इस रूप में भी हैं कि यह अपने साथ एक विशिष्ठ जीवनशैली और चिंतन को भी अपने साथ संप्रेषित करती हैं। ब्लाउज हैं पर उसके दर्जी कूचा रहमान के पुश्तैनी दर्जी नहीं बल्कि वे हैं जो करीना कट और प्रियंका जैसे उभारों को संभालने वाले वस्त्र बना सकें। पेटीकोट को कपड़े की तरह लिखना जितना अश्लील लग रहा है उतना ही उस स्टेज की लड़कियाँ इससे दूर भाग रही हैं। वहाँ जींस टॉप से भी आगे की श्रृंखलाएं मौजूद हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे इधर भोजपुरी फ़िल्में और उनमे डाले गए गानों का पिक्चरायजेशन। जो लोकल से ग्लोबल हो जाना चाहता है। भले उस रूप में गाने भारतीय फिल्मों के अभिन्न अंग हों, उन्हें परिधान हॉलीवुड से आयातित ही चाहिए। यह शोध का मौजू विषय हो सकता है के समानुपातिक रूप से किस माध्यम में किसे और किस रूप में कितना परिवर्तित किया। खैर। जिन वस्त्रों जिन प्रसाधनों का उपयोग वहां मंच पर इतराती इठलाती महिलायें करती हैं उनकी खरीदारी में मेले में आई दुकानें विशेष ध्यान रखती हैं। लाली लिपस्टिक से लेकर अपनी औरत के कहने पर उनकी छाती के नाप के अंतःवस्त्रों को वे वहाँ खरीदते पाए जाते हैं। और वहां से लौट कर उसके मन में रह गए उन अंतर द्वंदों पर कोई मनोचिकित्सक उसे सलाह देने के लिए मौजूद नहीं है। बस उन अपेक्षाओं से अब जूझने की बारी उसकी ब्याहता के हिस्से आती है और वहां की दीवारें किसी हाकिम एम शाकिब से हर जुमेरात मिलने को कहती हैं।

जिन किन्ही चिंतकों को यह अपरिष्कृत अतृप्त कुंठाओं का मनोरंजन जैसा कस्बाई पाठ लगता रहा है या लगने वाला है उनके लिए एक छोटी सी सेंध इसी तकनीक ने लगायी है। जहाँ अब यह शोभा सम्राट थियेटर जैसे स्थानीय संस्करण यू ट्यूब जैसी वीडियो साइट्स के ज़रिये किसी भी परिधि में सीमित होकर नहीं ग्लोबल पाठ का निर्माण कर रहे हैं और बकौल वहाँ प्रकाशित एक कमेंट एक विशुद्ध पुरुष आग्रह करते हुए कह रहा है, 'गुरूजी प्रणाम..थोड़ा हॉट वीडियो डालो ना..मज़ा आ जाए..छोट छोट कपड़ा वाली लौंडिया..दिल खुश हो जाता है आपका वीडियो देख के..'

5 टिप्‍पणियां:

  1. "भले वहाँ आधुनिकता के चिह्न न पाए जाते हो पर सिनेमाई गानों की भौंडी नकलों के सस्ते लुगदी संस्करणों की तरह शास्त्रीय के बिलकुल उलट उनके अपने रंग ढंग उत्तर आधुनिक मनों का निर्माण कर रहे थे। बैंड वाले 'ये देश है वीर जवानों' के साथ रेडियो पर नए सुने गाने की धुन बजाने की कोशिश ज़रूर करते। भले गाल गले नसों को फुला फुला कर दम निकाले दे रहे हों। वहां उमराव जान अदा नहीं थी तो क्या वहाँ मिस मीरा, चाँदनी, लक्की, सिमरन जैसे झूठे नामों के साथ स्त्री सॉफ्ट पॉर्न के रूप में तब भी वहां मौजूद थीं। हैं।"

    बेहतरीन विश्लेषण किया है आपने ! अब पता चला है कि ऐसे थियेटर सचमुच धर्मनिरपेक्ष होते हैं।

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    1. मनीष जी, इसका एक संस्कारण अभी इस साल दो हज़ार पंद्रह में, लाल किले पर उपलब्ध मिला। रामलीला के दौरान लगने वाले मेले में। 'सांस्कृतिक नृत्य कला मंच' के नाम से। उन्ही औजारों के साथ । वही परदा थोड़ी देर के लिए खुला और बंद हो गया। वक़्त मिला तो जल्द लिखने का मन है।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. ye sare ahsaas 1975 ya iske aas pass janme hum jaise shaher aur gaon ke beech jhulte amfibiano(ubhay charo) ke hai, pata nahi q mujhe laga ki shabd aapke par bhav mere hai....... shukria dost...

    8:29 pm, फ़रवरी 03, 2014

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    1. यह हम अभी सात आठ साल पहले तक महसूस करते रहे हैं। अब सुनने में आया है कि दो तीन सालों से 'शोभा सम्राट थियटर' बहराइच के दरगाह मेले में नहीं आ रहा। उसे अनुमति नहीं मिल रही। पर इधर लाल किले पर होती रामलीला में देखा, उस पर कभी मन किया तो लिखेंगे।

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