मार्च 13, 2013

अलसाता बिखराता मौसम और अंगड़ाई लेती देह

जैसे सर्दियाँ गुलाबी गुलाबी होती हैं वैसे आती गर्मियाँ इसी रंग की क्यों नहीं होती। ठण्ड में दिमाग ठंडा रहता है और हरारत बढ़ते ही दिमाग का पारा देखने लायक होता है। अभी शनिवार पटेल नगर से लौट रहे थे। बस में। बस तप रही थी। तारकोल की सड़क की तरह। उस पर दौड़ते हुए। अजीब तरह का रंग होता है। सड़क का उसपर पसरते मौसम का। जिसे देखने का मन नहीं करता। उसमे ज़रा रंग होता भी कम है। अमलतास का पीलापन नहीं। सरसों की बालियाँ भी नहीं। सिर्फ लाल। सेमर के पेड़ पर पत्ते नहीं होते। बस होते हैं लाल लाल फूल जैसे। हमारे यहाँ मतलब इस दिल्ली शहर में बसंत केदारनाथ सिंह के बनारस की तरह भी नहीं उतरता। इस शहर की जीभ किरकिराती है उसके बिलकुल बाद आये पतझड़ के समय।

रातें अब थोड़ी कम ठंडी है। उस वक़्त तो बिलकुल नहीं जब सोने के लिए लेटते हैं। एक पैर रजाई में। दूसरा बाहर। बचपन से इन दिनों की यही आदत आज भी साथ है। दो दिन हुए रजाई नीचे धर आया हूँ। अगली ठण्ड के लिए। खिड़की खुलने लगी है। हफ्ता भर पहले जब पहली बार खिड़की खोली थी तब उस पर पर्दा लगा रखा था। अब वो भी नहीं। पर मच्छर इतनी जल्दी आ धमकेंगे सोचा न था। नींद कभी टूटी तो राग मल्हार नहीं उनके बेने जैसे पंख वो सबके सब झल रहे होते हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे किसी नुक्कड़ पर आती गर्मियों में कोई बूढ़ा बैठा मुफ़्त में पानी पिलाता दिख जायेगा।

दिल्ली चंडीगढ़ नहीं है। न अब हो सकता है। वर्ना यहाँ भी सड़क किनारे बोगनवेलिया के लाल नीले फूल खिलते। यहाँ फूलों का खिलना सरकारी बागों में ही होता है। या किसी की बालकनी में लगे गमलों में। सुबह सड़कों पर सायकिल के पीछे झउये में छोटे छोटे रंग बिरंगे पौधे लिए किसी नर्सरी का माली आवाज़ लगता घूमता फिरता है। पर आज तक सिर्फ इन लोगों को देखता ही आ रहा हूँ। कभी रोक कर पूछा नहीं के गुलाबी सफ़ेद पंखुड़ियों वाले फूल को क्या कहते हैं। मैं क्या कहूँ। इसलिए आज तक कोई नाम उसे नहीं दे पाया हूँ। जो मेरे दिल के करीब है उसका नाम मुझे मालुम है। फिरंगी पानी

दिन धीरे धीरे बड़े होते जा रहे हैं और करने को जो भी काम हैं उन्हें बराबर बाँट नहीं पा रहा हूँ। उधर लिखने की जो आदत अँधेरा होने के साथ बन गयी थी उसे फिर से देखना होगा। वक़्त बढ़ गया लगता है। पर साथ आई है उबासी। अलसाई सी शामें। आँखों की नींद। आसमान में एक भी रुई का फाहे जैसा बादल नहीं। उसका नीलापन अपने विस्तार को बता रहा है। पर मेरा रोज़ाना खाली करता जा रहा है। मेरे पास भरने के लिए जो भी चीजें हैं उन्हें जब तक जेब से कोनो अंतरों से निकालता हूँ वो अपना रंग ही बदल लेता है। तब होते हैं तारे और एक चमकता इठलाता चाँद। उसे अपनी कहूँ, पर कैसे। मिल ही नहीं पा रहे हैं। हम दोनों।

हवा शाम होते ही ठंडी हो जाती है और थर्मोकोट को अभी निकाल नहीं है। पर शाम की सैर में तीन चार दिन से कटौती होती जा रही है। चाहता नहीं हूँ फिर भी। वो सर झुकाए, गर्दन उठाये धीरे-धीरे अपनी खोह में उतरना डूबना अब नहीं हो पा रहा है। शामें शाम कुछ ज़यादा देर तक रह रही हैं पर उसमे अपने हिस्से इधर दुबारा से बनाने पड़ेंगे। किताबें न पढ़ने का बहाना ठण्ड के साथ ही विदा हो लिया है। किताबें अब उठाई जा सकती हैं। अब तो हाथ भी ठन्डे नहीं होंगे। पर मन भी तो होना चाहिए। अपने आस पास कुछ भी दिखाई दे उसमें सूरज की तपिश देखने नहीं देती।

खिड़की से देखता हूँ बिन बताये आम के पेड़ पर बौर आ गयी हैं। मतलब इस साल आम आयेंगे। एक एक साल के अंतराल पर आम आने का उसका खुद का बनाया तंत्र है। और एक तरीके से उस कंक्रीट की ज़मीन से उसके संघर्ष की गाथा भी। जड़ें कैसे चारो तरफ से घिर चुकी पत्थर बन चुकी जमीन से पानी और आवश्यक तत्व ले रही हैं सिर्फ उसे पता है। अभी सिर्फ यही पेड़ खिला है। उसका पड़ोसी पकड़िया बीते साल कटते कटते किसी तरह बचा है। पत्ते अभी नहीं छोड़ें हैं। अशोक भी वैसा है। बस सड़क किनारे आती होली के इंतज़ार में पीपल के पत्ते सबसे पहले विदा हो गए हैं। हमारी तरफ सड़क के दोनों तरफ सिर्फ़ पीपल हैं। जो अमलतास के पौधे बरसात के वक़्त अगस्त में लगाये थे उन्हें किसी बड़ी कंपनी की ऑपटिकल फाइबर तारों को बिछाते वक़्त रातरानी के पौधे के साथ अनदेखा कर मजदूरों के पैरों ने कुचल दिया है।

सुबह दूध लाते वक़्त पीपल के पत्ते पैर के नीचे पड़ते हैं। उससे पहले उजाला खिड़की से कमरे के अन्दर आ जाता है। तड़के कभी चार वार बजे आंखों के साथ कान भी खुल जाते हैं तब पीछे रिज़ की तरफ से मोरों की बतकहियाँ सुनाई दे जाती हैं। जैसे अभी बरसात वाले बादल आने हो वाले हों। पर नहीं। ऐसा कुछ नहीं होता। और फिर दोबारा लेट जाता हूँ। जैसे दिन होते जा रहे हैं उनमे देह टूटती सी लगती है। जैसे-जैसे दुपहरी लम्बी, उबाऊ, थकी-थकी दरवाज़े के पीछे लगी कील से फुदक फुदक भागेगी, उतनी ही रातें उसे सीमाओं से परे ले जाना चाहेंगी। सात बजे के बाद भी उठने का मन नहीं करता। पता नहीं क्यों। सुबहें सुबह की तरह पिछले कई सालों से नहीं रहीं। उनका ताज़ापन कहीं गुम है। हम भी पीले पत्तों की तरह मुरझाये से चेहरों के साथ रोज़ उठते हैं। उठाना पड़ता है। पर अभी भी कबूतरों की उस जोड़ी का इंतज़ार कर रहा हूँ जो हर सुबह छज्जे से होते हुए कमरे में दाखिल होते थे। इधर अभी तक वह भी गायब हैं।

{ग्यारह अप्रैल, बिफ़य। आज जनसत्ता में यह पोस्ट पीले पत्तों की तरह नाम से आई है। अखबारी कतरन पढ़ने के लिए इस लिंक पर घूमा जा सकता है।}

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