मार्च 02, 2013

दरगाह मेले के बहाने से..

आज भी हमारे चाचा लोग लम्बे सफ़र पर सायकिल से ही निकलते हैं। चाहे नानपारा जाना हो या भिन्गा। बहराइच तो हफ्ते में दो तीन बार सौदा लेने तो जाते ही हैं। हम भी इसी सायकिल की शरण में जा पहुचते हैं। कौन उन बढ़ते किरायों पर डीज़ल के दामों का पैबंद लगाये। जब मन किया जहाँ मन किया रुके छाँव में सुस्ता लिए बिस्कुट खा कर पानी पी रपट लिए। वहीँ अगर गाडी बस से जाओ तो पहले घंटा भर इंतज़ार करो। कब आएगी, कब चढ़ेंगे।

कभी गिलौला जाना भी होता है तो नहर नहर लेंगड़ी गूलर होकर ही जाते हैं। अब वहां न तो शहरों जैसी सड़कें ही हैं न उनके किनारे किनारे खम्बों पर टंगे लट्टू। स्ट्रीट लाइट गाँवों को बिजली पहुँचाते खम्बे भी नहीं होती। इसलिए भी वहां सायकिल सवारों को उन रात में निकलने के लिए वो रातें चुननी पड़ती हैं जब आसमान में चाँद चमक रहा हो। वरना पिछली बार दूसरी तरफ से आती सायकिल कब हमारी लें में घुस गयी और हमारी सायकिल से टकरा गयी थी।

इस बार भी पिछले सालों के अनुभवों को संज्ञान में लेकर इस बार भी दरगाह माला रात में घूमने की बात तय हुई। साढ़े नौ वाला शो देखेंगे फिर मेला घूमेंगे।..खाना खा चुकने के बाद करीब सवा आठ बजे पैर-गाड़ियों की सेटिंग देख हम लोग रवाना हुए। चिचड़ी चौराहे से आसाम रोड़। आसाम रोड़ से बायपास लेकर नयी बख्शीपुरा बस्ती से होते हुए रेलवे क्रॉसिंग पार करते कराते अस्पताल मोड़ पहुँचे। और वहां से 'कुमार पिक्चर पैलेस'।

फिल्म लगी थी 'जन्नत'. हॉल में फिल्म देखने हम घुसे तो सात लोग थे पर बीच में देखा तो पाया कि चार तो मधुर निद्रा में लीन हैं। बार बार जगाने पर भी उनकी तपस्या में कोई व्यवधान पड़ा हो ऐसा नहीं लगता क्योंकि हर बार जगाने के बाद भी वह आँख मूंदे परदे पर देख रहे होते। फिल्म का मेन किरदार इमरान हाशमी मैच फिक्सिंग का शातिर खिलाड़ी है। पर क्रिकेट कितना जानता है इसकी बानगी एक डायलॉग में साफ़ दिख जाती है जहाँ यह विशेषज्ञ एक खिलाड़ी को प्रलोभन देते हुए कहता है, "यहाँ तो आपको लॉन्ग लेग दिख रहे हैं (पीछे एक लड़की नंगी टांगो के साथ खड़ी है, उसे देखते हुए) हम आपको उस जगह ले चलते हैं जहाँ शॉर्ट लेग के साथ साथ स्लिप भी होगी।" और वे दोनों एक डांस बार में दाखिल होते हैं जहाँ विचित्र काया युक्त स्त्रियाँ अपने नृत्य का दैहिक प्रदर्शन कर रही थीं।..यदि महिला आयोग स्त्री छवि के प्रति इतना ही सजग होम चाहता है और कड़े कदम उठाने की सोच रहा है तो क्या वह ऐसे दृश्यों को फ्लिमों में सिर्फ दर्शकों के साथ देखता रहेगा या कुछ चिल्ल पौं भी करेगा; यह संघर्ष देखने वाला होगा।

खैर, शो करीब बारह बजे ख़तम हुआ और हमें लगा अभी इतना ही बजा है। सिनेमा हॉल से सायकिल उठा हम दरगाह की तरफ चल पड़े। पैदल नहीं उसपर बैठ कर। दरगाह मेल हर साल जेठ में लगता है। हर इतवार बरात आती है। महिने भर वह जगह गुलज़ार रहती है। जंजीरी दरवाज़े को लोग चूमते, हलवा परांठा खाते मेले की दुकानों का लुत्फ़ उठाते हैं।

पर दरगाह के अलावा भी खूब मेला रहता है और कईयों के लिए तो यही मेला है जहाँ 'शोभा सम्राट' जैसे महलनुमा थियेटर मौजूद थे। जहाँ पता नहीं कहाँ कहाँ से लायी गयी लडकियां नृत्य प्रदर्शन करती हैं और दर्शकों का एक ही ध्येय होता है उन (पतुरियों) की अदाओं, अंग प्रत्यंगों पर मर मिटना। इसका एक सहचर भी है पर यह पूरी रात हाथ पर थियेटर की मुहर लग जाने के बाद बराबर अन्दर बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं देता। यह वाला संस्करण उससे थोड़ा सस्ता और उन लोगों के लिये रहता है जो पूरी रात वहीँ नहीं गुज़ार सकते। इसमें पाँच गानों की श्रृंखला होती है। पर ध्यान रहे जितना भाषा के स्तर पर मैं संस्कृत निष्ठ होता जा रहा हूँ अपने मूल स्वरुप में यह उतने ही आदिम होते हैं।

मौत का कुआँ देखने वालों की भी कोई कम तादाद नहीं होती। कुछ जो अपनी पत्नी, बच्चों और छोटी सालियों के साथ उन मेले में आते हैं उनके लिए 'शोभा सम्राट' जैसे कार्यक्रम जले पर तेज़ाब छिड़कते हैं। वहां विवाहिता की उपस्थिति में जाने के अपने खतरे हैं इसलिए भी वे बेचारे अपने स्वर्णिम 'कुँवारे युग' की वीथियों में घूम घूम मातम मन रहे होते हैं। वे मुँह लटकाए चुपचाप पी सी सरकार की तर्ज़ पर आये किसी जादूगर के जादू को देखने पहुँचते हैं। या सर्कस वाले खुद को महानतम बताते हुए बड़ी सी जगह छिकाये मिल जाते हैं। इस बार का सर्कस था 'ग्रेट पद्मा सर्कस'..

जब इन सबसे मन ऊब जाये तो चाट पकौड़ी की दुकाने दूधिया रौशनी में आपका स्वागत ही नहीं करती बल्कि स्वयं को भारत की सबसे 'पवित्र' और सर्वाधिक प्रसिद्ध देशी घी से युक्त दूकान बतलाते हुए प्रचार करते बोर्ड लगाये रखती हैं। साफ़ सफाई का आलम यह के भिनभीनाती मक्खियों के साथ कुर्सी टेबल की मूक लड़ाई देखते हुए आप खुद चल कर आप विराजे। कुछ ऑर्डर करें। फिर जब जीभ भी खा खाकर उकता जावे तब मन बहलाने के लिए झूले किस मर्ज़ की दवा नहीं हैं। बचपन में बचपन सहता बच्चा भी झूलों को उतना इंजॉय कर सकता है जितना कि उसके माता पिता उसे सहते हुए।

बात बात में हम सात तो कहीं गम ही हो गए इन्सबके बीच। हम सातों में हम पांच भाई (दो हम तीन दादा के लड़के) एक फूफ़ा और एक चाचा। सात में से तीन का ब्याह हो चुका है और इस जुलाई में हमारे सबसे छोटे चाचा को देखने उनके घर का मुआयना करने लड़की वाले पधार रहे हैं। इसलिए इस बार उनके चहरे पर एक असहज सी चिंता की रेखा तो थी ही कि कहीं रिजेक्ट न कर दें; इसी उधेड़बुन में उन्होंने अपने यहाँ पीछे की तरफ छप्पर छवाया है। वह भी इस शर्त के साथ कि बिफय को नाय छावा जात हय..!!

तो इन्ही सब के दरमियान दरगाह मेले से लौटते लौटते डेढ़ तो बज ही गए थे। चन्द्रदेवता आकाशमग्न होकर चिर अन्धकार को हर रहे थे। पर जब हम आसाम रोड़ पहुँचते उससे पहले संदीप की पैरगाड़ी बार बार चेन का साथ छोड़ रही थी। शायद कह रही थी कि जैसी तन्मयता से तुम मुझे बहराइच लाये थे वैसा आनंद अनुभव अब क्यों नहीं हो रहा। ..तुम्हे यह नहीं पता के जल्दबाज़ी में वह कोमलता गायब हो जाती है। जब भी चेन उतरती और हम सबको रुक जाना पड़ता तब तब दिल कुछ और बैठ जाता। क्योंकि जिस सड़क से हमें वापस लौटना था उसके कई कई किस्से हम सबने कुछ ज़यादा कुछ कम सुन रक्खे थे।

{यह वाला टुकड़ा उन आगे आने वाली तीन चार किश्तों में से पहला है। इसकी तारीख है अट्ठाईस जून दो हज़ार आठ। एक दो पीछे भी लिखी हैं उनके लिंक यह रहे : सिनेमाघर वाया शहर दिल्ली जिला बहराइचश्रावस्ती की सैरदिल्ली का सूरज पता नही इतनी दूर क्यों है..। }

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